सोमवार, 13 जुलाई 2020

और... मैं पागल ना हो जाऊँ।


पिछले कुछ महीनों से मैं एंग़्ज़ाइटी, मोशन सिकनेस, डिप्रेशन और स्लीप डिसऑर्डर से जूझ हूँ। डॉक्टर ने पढ़ाई-लिखायी सम्बन्धी क्रियाकलापों से दूर रहने की हिदायत दी थी पर चाह कर भी इन क्रियाकलापों से खुद को दूर नहीं रख पा रहा। जिसका नतीजा यह हुआ, कि इसके कारण जनरालाइज़्ड डिसऑर्डर के साथ ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर भी पड़ने लगे। मने एक अंजाना भय। बिना बात के ही। सुनने में यह थोड़ा अटपटा लगे, परन्तु पागलपन के शुरुआती लक्षण यहीं से शुरू होते हैं। जिसे बता पाना कम से कम आसान तो नहीं ही है।

यही नहीं, एंग़्ज़ाइटी के साथ मोशन सिकनेस भी हावी होता जा रहा है। जो पहले थोड़ा कम था। मोशन सिकनेस दरअसल गाड़ी, पानी के जहाज या हवाई यात्रा के दौरान ही असर नहीं दिखाते। बल्कि हर उस जगह असर दिखाते हैं, जहाँ दिमाग के संतुलन में नासमझी पैदा हो जाती है या दिमाग अस्थायी गड़बड़ी करने लगता है। तब, जब वो इंद्रियों के बेहूदे संघर्ष को कंट्रोल नहीं कर पाता। बेहूदे संघर्ष। वाहियात।

जब आपकी इंद्रियाँ एक-दूसरे के मेसेजेस को बिना समझे संघर्ष करती है तो उसे मोशन सिकनेस कहा जाता है। उदाहरणार्थ:- आपकी आँखे एक चीज देखती है। मांसपेशियां दूसरी चीज महसूस करती है और कान के भीतरी हिस्से इन दोनों को ही नकार रहे होते हैं। मस्तिष्क इन मिश्रित संकेतों को समझ नहीं पाता और माथा चकराने से लेकर पेट में मरोड़, उल्टियाँ करने जैसी स्थिति पैदा कर देता है। इसी अप्रिय स्थिति को मोशन सिकनेस कहा जाता है।

मुझ पर ऐसे सिकनेस का हावी हो जाना मेरे लिए खतरे की घण्टी जरूर बजा गया है। सम्भव है, कुछ दिन अस्पताल में काटने पड़ें। या सीधी भाषा में कहूँ तो शायद किसी पागलों के डॉक्टर के डिस्पैंशरी में।

शायद अलविदा कहने का समय आ गया है।

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