मैं पहले ही बता देना चाहता हूँ, कि यह आर्टिकल पश्चिमी सभ्यता के हिमायती कहलाने वाले प्रो-फ़ेमिनिज़्मों के लिए नही है। यदि आप पूरा आर्टिकल पढ़ते हैं तो सम्भव है आप विचलित हो जाएँ और आपको मुझ पर क्रोध आए। यह भी सम्भव है, कि आप मुझे छोटे, वाहियात और गंदी मानसिकता का इंसान समझें। पर यकीन मानिए, मेरे मना करने के बावजूद, अगर आप यह आर्टिकल पढ़ते हैं तो मुझ पर की गयी आपकी कोई भी टिप्पणी मेरे किरदार के साथ न्याय नहीं करेगी। ना अच्छी, ना बुरी टिप्पणी। ख़ैर। आपकी मर्जी। पढ़ियेगा तो अपने रिस्क पर। क्योंकि मुझे जो बात कहनी थी, मैंने कह दी। पीछे कहिएगा मत, कि आगाह नहीं किये।
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आजादी कई मायनों में अच्छी चीज़ है। कई मायनों में बुरी। अच्छी आजादी जो होती है, वो स्वभाविक होती है। लोग उसे स्वयं महसूस करते हैं। सेलीब्रेट करते हैं। जैसे- गुलामी से आजादी। कर्ज़ से आजादी। कष्ट से आजादी। विकार से आजादी। बुरे लोगों से आजादी। डर से आजादी। दुश्मनों से आजादी। मुसीबत से आजादी। एण्ड ब्लाः ब्लाः से आजादी। बुरी आजादी जो होती है, उसकी मांग की जाती है। आप सोच रहे होंगे, कि आजादी भी कहीं बुरी चीज होती है? आप सही सोच रहे हैं। आजादी कभी बुरी नही होती। पर यह आजादी बुरी तब हो जाती है, जब उसे पाने वाले लोग गलत तरीके से उसका इस्तेमाल करने लगते हैं।
यह वो आजादी है, जिसकी मांग की जाती है। कच्ची उम्र की लड़कियों द्वारा। या सीधे-सीधे कहूँ तो नाबालिगों द्वारा। नहीं, ऐसा नहीं है, कि मैं लड़कियों की आजादी के खिलाफ हूँ। पर जिन चीजों के लिए आजादी की मांग की जाती है, मैं उसके खिलाफ हूँ।
फैशन की आजादी। ठीक है, आप एक हद तक फैशन करें। पर यहाँ जरा रुक कर आपसे पूछना चाहता हूँ, कि फैशन के नाम पर फटी हुई जिन्स पहनना, हाफ पैंट पहनना, स्लीवलेस, नॉवललेस टॉप पहनना, ये क्यों? फटी हुई जिन्स आपके जांघों की, आपके कुल्हे की सरेआम नुमाईश के अलावे और क्या करती हैं? स्लीवलेस, नॉवेललेस टॉप, ये भी आपकी पीठ, नाभी का खुलेआम प्रदर्शन के अलावे और क्या कराती है? ये सब आजादी क्यों ही और आपके टाइट जिन्स पहनने से या आपके उभारों की सही-सही पुष्टी करते टॉप पहनने से आपकी आजादी का क्या कनेक्शन? या, ये केवल इसीलिए, कि आप और आपका जिस्म कितना खूबसूरत है इसकी प्रदर्शनी हो सके? माफ कीजिएगा, खूबसूरती सलवार-सूट या साड़ी में जितनी खिलती है, जिन्स-टॉप में उतनी ही भद्दी हो जाती है। जिन्स-टॉप पहनना आपकी आजादी तो नही, पर यह लड़कों की कामुकता को जरूर प्रचण्ड कर सकती है।
पश्चिमी सभ्यता को गले लगाने की आजादी। अच्छा, ये क्यों? क्या आपके भारत की संस्कृति आपको अच्छी नहीं लगती? या दोस्त को सर में चुन्नी डाल कर दूर से प्रणाम करने की परम्परा अच्छी नहीं लगती? या दोस्तों के संग कायदे के साथ एक निश्चित दूरी बनाकर चलें, आपको ये अच्छा नहीं लगता? आपसे ये किसने कह दिया, कि लड़कों से हाथ मिलाना या सीधे गले लग पड़ना आपकी आजादी से जुड़ी है? क्या हमारे पूर्वज़ बेवकूफ़ थे, जो जनाना घर के सामने बगैर अनुमति किसी परपुरुष को खड़े रहने तक की इज़ाज़त नही देते थे? माफ़ कीजियेगा, यहाँ भी आपकी आजादी बेकार और मनगढ़ंत है। इससे आपको फायदा तो नहीं, वरन नुकसान जरुर होता है। जैसे- एक नारी के जिस्म को स्पर्ष करने का सुख़ लड़कों को यूँ ही दे देना।
अर्धनग्न बदन लिए गलियों में घूमने की आजादी। क्यों देवी जी? अब ये किसलिए? नुमाईश? क्योंकि और कोई कारण कम से कम मुझे तो नही दिखता। पर मेरा यकीन मानिए, बदन आप नुमाईश करती हैं और बलात्कार किसी और लड़की के साथ हो जाता है। वो, जो सबसे आसान शिकार होती है। फिर वो कोई पाँच माह या पाँच साल की बच्ची ही क्यों न हो। क्योंकि कामुकता वो ज्वालामुखी है, जो तब तक शान्त नही होता, जब तक लावा फूट कर बाहर ना निकल जाए। यहाँ मैं रुक कर कहना चाहूँगा, कि आप रेप को बढ़ावा दे रही हैं और कुछ नहीं। क्योंकि अधिकतर लड़कों को रेप करने के बाद होश आता है, कि उसने कितना भयानक गुनाह किया है। दिल्ली। निर्भया रेप काण्ड याद ही होगा। रेप के बाद एक आरोपी रामसिंह ने फांसी लगा ली थी न? जी हाँ! पीछे पछतावा होता है। तब, जब ज्वालामुखी फट कर शान्त हो जाता है। और तब तक लावे के कारण हो चुकी तबाहियाँ नज़र आती है। पर, तब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत। यहाँ भी आपकी आजादी ख़तरनाक और फ़र्जी है।
घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने के इरादों के साथ लड़कों से मिलने की आजादी। क्या कहा? सिर्फ दोस्त हो तुम लोग? अगर इज़ाज़त हो तो जरा हँस लूँ? मैडम! एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नही हो सकते। बाकी सबकुछ हो सकते हैं। क्या कहा? मैं गलत हूँ? परहैप्स...! पर यकीन मानिए, आप कितनी कामुक हैं, इस बात का उसने बिस्तर पर पड़े-पड़े अंदाज़ा जरुर लगाया होगा। नहीं लगाया तो कभी न कभी लगाएगा जरुर। यही सच है, मान लीजिए। क्योंकि इंसान खुद को कंट्रोल करने की कोशिश तो कर सकता है, पर मन में स्वयं के बनाये नियम को लागू करने की गारण्टी नही दे सकता। और यदि आप जरा-सी चुकीं, तो आपकी एकमात्र पूँजी, जिस पर एक पिता, एक भाई और आपके भावी पति को नाज़ हो रहा होगा, वो लुट जाएगी। फिर आपके पास सिवाए घिसे-पिटे बहानों के और कुछ न होगा। और गलती से अगर आपने इसे "मौज़-मस्ती के दिन" मान लिया तो यह आपकी आजादी की नहीं बल्कि आपके पतन होने की कहानी है।
घर से भाग जाना। विवाह पूर्व सम्बन्ध बनाना।.ये सब कौन-से आजादी के कैटेगरी में आता है? माँ-बाप जानेंगे तो उनका क्या रिएक्शन होगा? वे क्यों न बेटियों को कोख़ में ही मार देना पसन्द करेंगे? फिर आप चिल्लाएँगी, कि लड़कियाँ कोख़ में भी सुरक्षित नहीं है। कहाँ से रहेगी सुरक्षित? आप रहने दो तब ना? बेटी के मुँह काला कर लेने के बाद माँ-बाप क्या ही करें? ज़हर खा लें? फांसी पर झूल जाएँ? मैं इसे मुँह काला करना क्यों कह रहा हूँ? अच्छा सवाल है। पर माफ़ कीजिएगा मैडम! यह भारत है। यहाँ माँ-बाप कितने भी मॉडर्न हो जाएँ, लेकिन विवाह से पहले सम्बन्ध बनाने को मुँह काला करना ही कहेंगे। और वे इसकी इज़ाज़त कभी नहीं दे सकते। आपके पिता को आप पर नाज़ होगा। आपके भाई को भी आप पर गर्व होगा। पर विश्वास कीजिए, अगर वो जान गये, कि आप अवैध सम्बन्ध से माँ बनने वाली हैं तो आपकी जान लेने से वे नही चूकेंगे। आपका भाई, जिन्होंने राखी पर आपको रक्षा का वचन दिया था, वो खुद आपका गला दबायेगा। आपकी साँसों के घुट जाने तक। जानती हैं क्यों? क्योंकि आपने उनके विश्वास को तोड़ दिया। भले आपने अपनी नज़र में सबकुछ सही किया हो पर उनके द्वारा दी गयी आजादी का आपने गलत इस्तेमाल किया। उसे गलत तरीके से लिया। यही नहीं, भारत की संस्कृति को आपने दागदार किया। आने वाली पीढ़ी को गलत मैसेज दिया। साथ ही, भविष्य में पैदा होने वाली बेटियों के सर, आपने नंगी तलवार टांग दी। अब जो भ्रूण हत्या होगी, वो आपके कारण होगी। भले इसमें आपकी रत्ती भर गलती ना हो, पर दोष लोग आपके मत्थे ही मढ़ेंगे। वे कहेंगे- बड़ी होकर मुँह में कालिख़ पोते, उससे पहले ही....यू नो.. व्हाट आई मीन... और खुदा ना खास्ता, कोई और लड़की इसी राह पर चल पड़ी तो आपके माता-पिता और आपके भाई को सुनना पड़ेगा, कि आपकी बेटी, आपकी बहन ने इसे भी गलत राह दिखा दी। खुद तो बर्बाद हुई कलमुँही, हमें भी ले डूबी। आप सोच रही होंगी, इसमें बर्बाद होने वाली कौन-सी बात है? मैडम, यह भारत है। यहाँ जर, जोरु, जमीन को आन समझा जाता है और इसके लिए नैतिकता को भी ठेंगे पर रख दिया जाता है। और तो और इन तीनों में सर्वोपरि यहाँ जोरु यानी लड़की की इज्जत ही होती है। सोचिये जरा... कैसी नारकीय स्थिति होगी वो, जब आपकी गलतियों की सजा आपके पिता और आपके भाई भुगतेंगे? सह सकेंगे वे? शायद नहीं।
अब कौन-सी आजादी चाहिए आपको? लड़कों से बराबरी की आजादी? वो आप कभी नही कर पाएँगी। यकीनन! क्योंकि एक स्त्री का प्रसव और प्रसाधन रहित होने की कल्पना सपने में भी नहीं की जा सकती। आप बराबरी तभी कर पाएँगी, जब माँ बनने की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएँ। और ऐसा हुआ तो दुनिया स्वतः समाप्त हो जाएगी।
यह भारत है। मर्यादा पुरुषोत्तम की धरती। यहाँ लोग राम नहीं बनना चाहते। पर सभी को सीता जैसी पत्नी चाहिए। सो इंसानियत की भलाई इसी में है, कि आप अपने संस्कार ना भूलें। स्वयं अच्छे-बुरे का ख्याल करें। अपने परिवार की अहमियत समझें। उन्हीं को सर्वोपरि मान कर चलें। ना कि आजादी के नाम पर नंगई माँगें। जिसे दे दी जाए तो इंसानियत को शर्मसार होते देर न लगे।
अंततः मुझ पर कोई भी राय थोपने से पहले यह आर्टिकल आप अपने पिता या अपने भाई को पढ़ने के लिए दें। अगर उन्होंने भी मुझ पर वही राय कायम रखी, जो आपने सोची थी तो मान लीजिएगा, मैं गलत हूँ।





















