शनिवार, 27 जून 2020

रे नारीवादी, एन्ने बाटे तोहार प्रतिवादी...


मैं पहले ही बता देना चाहता हूँ, कि यह आर्टिकल पश्चिमी सभ्यता के हिमायती कहलाने वाले प्रो-फ़ेमिनिज़्मों के लिए नही है। यदि आप पूरा आर्टिकल पढ़ते हैं तो सम्भव है आप विचलित हो जाएँ और आपको मुझ पर क्रोध आए। यह भी सम्भव है, कि आप मुझे छोटे, वाहियात और गंदी मानसिकता का इंसान समझें। पर यकीन मानिए, मेरे मना करने के बावजूद, अगर आप यह आर्टिकल पढ़ते हैं तो मुझ पर की गयी आपकी कोई भी टिप्पणी मेरे किरदार के साथ न्याय नहीं करेगी। ना अच्छी, ना बुरी टिप्पणी। ख़ैर। आपकी मर्जी। पढ़ियेगा तो अपने रिस्क पर। क्योंकि मुझे जो बात कहनी थी, मैंने कह दी। पीछे कहिएगा मत, कि आगाह नहीं किये।


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आजादी कई मायनों में अच्छी चीज़ है। कई मायनों में बुरी। अच्छी आजादी जो होती है, वो स्वभाविक होती है। लोग उसे स्वयं महसूस करते हैं। सेलीब्रेट करते हैं। जैसे- गुलामी से आजादी। कर्ज़ से आजादी। कष्ट से आजादी। विकार से आजादी। बुरे लोगों से आजादी। डर से आजादी। दुश्मनों से आजादी। मुसीबत से आजादी। एण्ड ब्लाः ब्लाः से आजादी। बुरी आजादी जो होती है, उसकी मांग की जाती है। आप सोच रहे होंगे, कि आजादी भी कहीं बुरी चीज होती है? आप सही सोच रहे हैं। आजादी कभी बुरी नही होती। पर यह आजादी बुरी तब हो जाती है, जब उसे पाने वाले लोग गलत तरीके से उसका इस्तेमाल करने लगते हैं। 
यह वो आजादी है, जिसकी मांग की जाती है। कच्ची उम्र की लड़कियों द्वारा। या सीधे-सीधे कहूँ तो नाबालिगों द्वारा। नहीं, ऐसा नहीं है, कि मैं लड़कियों की आजादी के खिलाफ हूँ। पर जिन चीजों के लिए आजादी की मांग की जाती है, मैं उसके खिलाफ हूँ।

फैशन की आजादी। ठीक है, आप एक हद तक फैशन करें। पर यहाँ जरा रुक कर आपसे पूछना चाहता हूँ, कि फैशन के नाम पर फटी हुई जिन्स पहनना, हाफ पैंट पहनना, स्लीवलेस, नॉवललेस टॉप पहनना, ये क्यों? फटी हुई जिन्स आपके जांघों की, आपके कुल्हे की सरेआम नुमाईश के अलावे और क्या करती हैं? स्लीवलेस, नॉवेललेस टॉप, ये भी आपकी पीठ, नाभी का खुलेआम प्रदर्शन के अलावे और क्या कराती है? ये सब आजादी क्यों ही और आपके टाइट जिन्स पहनने से या आपके उभारों की सही-सही पुष्टी करते टॉप पहनने से आपकी आजादी का क्या कनेक्शन? या, ये केवल इसीलिए, कि आप और आपका जिस्म कितना खूबसूरत है इसकी प्रदर्शनी हो सके? माफ कीजिएगा, खूबसूरती सलवार-सूट या साड़ी में जितनी खिलती है, जिन्स-टॉप में उतनी ही भद्दी हो जाती है। जिन्स-टॉप पहनना आपकी आजादी तो नही, पर यह लड़कों की कामुकता को जरूर प्रचण्ड कर सकती है। 

पश्चिमी सभ्यता को गले लगाने की आजादी। अच्छा, ये क्यों? क्या आपके भारत की संस्कृति आपको अच्छी नहीं लगती? या दोस्त को सर में चुन्नी डाल कर दूर से प्रणाम करने की परम्परा अच्छी नहीं लगती? या दोस्तों के संग कायदे के साथ एक निश्चित दूरी बनाकर चलें, आपको ये अच्छा नहीं लगता? आपसे ये किसने कह दिया, कि लड़कों से हाथ मिलाना या सीधे गले लग पड़ना आपकी आजादी से जुड़ी है? क्या हमारे पूर्वज़ बेवकूफ़ थे, जो जनाना घर के सामने बगैर अनुमति किसी परपुरुष को खड़े रहने तक की इज़ाज़त नही देते थे? माफ़ कीजियेगा, यहाँ भी आपकी आजादी बेकार और मनगढ़ंत है। इससे आपको फायदा तो नहीं, वरन नुकसान जरुर होता है। जैसे- एक नारी के जिस्म को स्पर्ष करने का सुख़ लड़कों को यूँ ही दे देना। 

अर्धनग्न बदन लिए गलियों में घूमने की आजादी। क्यों देवी जी? अब ये किसलिए? नुमाईश? क्योंकि और कोई कारण कम से कम मुझे तो नही दिखता। पर मेरा यकीन मानिए, बदन आप नुमाईश करती हैं और बलात्कार किसी और लड़की के साथ हो जाता है। वो, जो सबसे आसान शिकार होती है। फिर वो कोई पाँच माह या पाँच साल की बच्ची ही क्यों न हो। क्योंकि कामुकता वो ज्वालामुखी है, जो तब तक शान्त नही होता, जब तक लावा फूट कर बाहर ना निकल जाए। यहाँ मैं रुक कर कहना चाहूँगा, कि आप रेप को बढ़ावा दे रही हैं और कुछ नहीं। क्योंकि अधिकतर लड़कों को रेप करने के बाद होश आता है, कि उसने कितना भयानक गुनाह किया है। दिल्ली। निर्भया रेप काण्ड याद ही होगा। रेप के बाद एक आरोपी रामसिंह ने फांसी लगा ली थी न? जी हाँ! पीछे पछतावा होता है। तब, जब ज्वालामुखी फट कर शान्त हो जाता है। और तब तक लावे के कारण हो चुकी तबाहियाँ नज़र आती है। पर, तब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत। यहाँ भी आपकी आजादी ख़तरनाक और फ़र्जी है। 

घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने के इरादों के साथ लड़कों से मिलने की आजादी। क्या कहा? सिर्फ दोस्त हो तुम लोग? अगर इज़ाज़त हो तो जरा हँस लूँ? मैडम! एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नही हो सकते। बाकी सबकुछ हो सकते हैं। क्या कहा? मैं गलत हूँ? परहैप्स...! पर यकीन मानिए, आप कितनी कामुक हैं, इस बात का उसने बिस्तर पर पड़े-पड़े अंदाज़ा जरुर लगाया होगा। नहीं लगाया तो कभी न कभी लगाएगा जरुर। यही सच है, मान लीजिए। क्योंकि इंसान खुद को कंट्रोल करने की कोशिश तो कर सकता है, पर मन में स्वयं के बनाये नियम को लागू करने की गारण्टी नही दे सकता। और यदि आप जरा-सी चुकीं, तो आपकी एकमात्र पूँजी, जिस पर एक पिता, एक भाई और आपके भावी पति को नाज़ हो रहा होगा, वो लुट जाएगी। फिर आपके पास सिवाए घिसे-पिटे बहानों के और कुछ न होगा। और गलती से अगर आपने इसे "मौज़-मस्ती के दिन" मान लिया तो यह आपकी आजादी की नहीं बल्कि आपके पतन होने की कहानी है। 

घर से भाग जाना। विवाह पूर्व सम्बन्ध बनाना।.ये सब कौन-से आजादी के कैटेगरी में आता है? माँ-बाप जानेंगे तो उनका क्या रिएक्शन होगा? वे क्यों न बेटियों को कोख़ में ही मार देना पसन्द करेंगे? फिर आप चिल्लाएँगी, कि लड़कियाँ कोख़ में भी सुरक्षित नहीं है। कहाँ से रहेगी सुरक्षित? आप रहने दो तब ना? बेटी के मुँह काला कर लेने के बाद माँ-बाप क्या ही करें? ज़हर खा लें? फांसी पर झूल जाएँ? मैं इसे मुँह काला करना क्यों कह रहा हूँ? अच्छा सवाल है। पर माफ़ कीजिएगा मैडम! यह भारत है। यहाँ माँ-बाप कितने भी मॉडर्न हो जाएँ, लेकिन विवाह से पहले सम्बन्ध बनाने को मुँह काला करना ही कहेंगे। और वे इसकी इज़ाज़त कभी नहीं दे सकते। आपके पिता को आप पर नाज़ होगा। आपके भाई को भी आप पर गर्व होगा। पर विश्वास कीजिए, अगर वो जान गये, कि आप अवैध सम्बन्ध से माँ बनने वाली हैं तो आपकी जान लेने से वे नही चूकेंगे। आपका भाई, जिन्होंने राखी पर आपको रक्षा का वचन दिया था, वो खुद आपका गला दबायेगा। आपकी साँसों के घुट जाने तक। जानती हैं क्यों? क्योंकि आपने उनके विश्वास को तोड़ दिया। भले आपने अपनी नज़र में सबकुछ सही किया हो पर उनके द्वारा दी गयी आजादी का आपने गलत इस्तेमाल किया। उसे गलत तरीके से लिया। यही नहीं, भारत की संस्कृति को आपने दागदार किया। आने वाली पीढ़ी को गलत मैसेज दिया। साथ ही, भविष्य में पैदा होने वाली बेटियों के सर, आपने नंगी तलवार टांग दी। अब जो भ्रूण हत्या होगी, वो आपके कारण होगी। भले इसमें आपकी रत्ती भर गलती ना हो, पर दोष लोग आपके मत्थे ही मढ़ेंगे। वे कहेंगे- बड़ी होकर मुँह में कालिख़ पोते, उससे पहले ही....यू नो.. व्हाट आई मीन... और खुदा ना खास्ता, कोई और लड़की इसी राह पर चल पड़ी तो आपके माता-पिता और आपके भाई को सुनना पड़ेगा, कि आपकी बेटी, आपकी बहन ने इसे भी गलत राह दिखा दी। खुद तो बर्बाद हुई कलमुँही, हमें भी ले डूबी। आप सोच रही होंगी, इसमें बर्बाद होने वाली कौन-सी बात है? मैडम, यह भारत है। यहाँ जर, जोरु, जमीन को आन समझा जाता है और इसके लिए नैतिकता को भी ठेंगे पर रख दिया जाता है। और तो और इन तीनों में सर्वोपरि यहाँ जोरु यानी लड़की की इज्जत ही होती है। सोचिये जरा... कैसी नारकीय स्थिति होगी वो, जब आपकी गलतियों की सजा आपके पिता और आपके भाई भुगतेंगे? सह सकेंगे वे? शायद नहीं। 

अब कौन-सी आजादी चाहिए आपको? लड़कों से बराबरी की आजादी? वो आप कभी नही कर पाएँगी। यकीनन! क्योंकि एक स्त्री का प्रसव और प्रसाधन रहित होने की कल्पना सपने में भी नहीं की जा सकती। आप बराबरी तभी कर पाएँगी, जब माँ बनने की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएँ। और ऐसा हुआ तो दुनिया स्वतः समाप्त हो जाएगी।

यह भारत है। मर्यादा पुरुषोत्तम की धरती। यहाँ लोग राम नहीं बनना चाहते। पर सभी को सीता जैसी पत्नी चाहिए। सो इंसानियत की भलाई इसी में है, कि आप अपने संस्कार ना भूलें। स्वयं अच्छे-बुरे का ख्याल करें। अपने परिवार की अहमियत समझें। उन्हीं को सर्वोपरि मान कर चलें। ना कि आजादी के नाम पर नंगई माँगें। जिसे दे दी जाए तो इंसानियत को शर्मसार होते देर न लगे। 

अंततः मुझ पर कोई भी राय थोपने से पहले यह आर्टिकल आप अपने पिता या अपने भाई को पढ़ने के लिए दें। अगर उन्होंने भी मुझ पर वही राय कायम रखी, जो आपने सोची थी तो मान लीजिएगा, मैं गलत हूँ। 

गुरुवार, 25 जून 2020

बाल कविता


टिप-टिप करती बरसा आयी
साथ में कोल्ड फ्लू भी लायी
कोल्ड फ्लू से डरते हम सब
सावधान भी रहते हम सब
मम्मी करती सेवा हर दम
पापा डांट पिलाते भरदम
डांट से डरकर हम छिप जाते
दादा जी हम को खूब बचाते
एक रोज़ जब बदरी छायी
बरसा की साइत बन आयी
बरसा रानी बड़ी चतुर थीं
वाणी में भी बड़ी मधुर थीं
हम सब ना थे चतुर सुजान
ना था हममें अल्प भी ज्ञान
लुका-लुका हम छत पर आये
उछल-कूद कर खूब नहाये
रात बदन पर आयी फीवर
सरदी से जीना हुआ दूभर
दादा जी डाक्टर बुलवाये
सुबह-शाम टीके लगवाये
डाक्टर ने दी नीली गोली
एक लाल एक पीली गोली
डाक्टर को आते हैं जादू-मंतर
जिससे फीवर हो जाते हैं छू-मंतर

मंगलवार, 23 जून 2020

कहीं दूर एक मज़दूर मरता है, तब जाकर हमारी बिल्डिंगों की नीवें मज़बूत होती हैं।


हम मज़दूर लड़के, मज़दूर नहीं थे। मज़दूर हमें हमारी गरीबी ने बनाया था। वो गरीबी, जिससे हम दुखी थे। दुःख हमें श्राप में मिला था। श्राप हमें हमारी फूटी किस्मत ने दी थी। फूटी किस्मत हमें जन्म से मिला था। जन्म हमें बाबा ने दिया था। बाबा जो दुनिया के सबसे मज़बूर व्यक्ति थे। मज़बूरी जो गरीबी का दूसरा नाम था। यानी बाबा दुनिया के सबसे गरीब व्यक्ति थे।

अगर कहूँ, कि हमारे जन्म से लेकर फूटी किस्मत, फूटी किस्मत का श्राप, श्राप का दुःख, दुःख की गरीबी और गरीबी के कारण मज़दूरी हमें हमारी विरासत में मिली थी तो गलत नहीं होगा। हम मज़दूर लड़के छैनी-हथौड़ी लेकर पैदा नहीं हुए थे। हम आसमान से भी नहीं टपके थे। ना हमारा दुःख ही आसमानी था। हम यहीं पैदा हुए थे। दुख़ों की गठरी भी हमें यहीं सौंपी गयी थी। जिसे ढोते-ढोते हम मरने लगे। मरने के बाद हमारा दूसरा जन्म हुआ। और इस जन्म में हम मज़दूर कहलाये। 

हम खबरें बनते थे। बारहवीं मंज़िल से भर-भरा कर गिरते हुए। गिर कर मर जाते हुए। सड़कों पर चलते हुए। चल-चल कर मर जाते हुए। क्योंकि, बारहवीं मंज़िल से गिर कर मरते हुए और सड़क पर चल-चल कर मर जाते हुए मज़दूरों की खबरें सुनने की हमारी हैसियत नहीं थी। ना ही हमारी औकात थी, मज़दूर रह कर मरते मज़दूरों की ख़बरें सुन पाने की। 

खबरें, जो नफ़रत से भरी होती थीं। खबरें, जो हमारी नहीं होती थीं। खबरें, जो हमारे लिए नहीं होतीं थीं। पर हम खबरों के लिए होते थे। हम, खबरों में होते थे। खबरें, जो जीते-जी हमारी नहीं होती थीं। वो होती थीं, किसी पैसे वाले बिल्डर्स की। खबरें, जो हमारी होती थीं, वो हमारी ही मौत की खबरें होती थीं। खबरें हमारे लिए नहीं होती थीं, हम खबरों के लिए होते थे। 

रविवार, 21 जून 2020

इस शहर से इक़ शिक़ायत है मुझको, कि तिरे चेहरे से चेहरे हैं हर ओर।


कॉलेज पहूँचते ही उसने शुरुआत की थी मुहब्बत की। बड़े जोरों-शोरों से। इतना, कि पूरे कॉलेज में उन दोनों का प्रेम फुरक़तिया चर्चा का विषय था। जूनियर्स मुहब्बत की मिसालें देते तो लैला-मज़नूँ के साथ उन दोनों के प्रेम और तिश्नगी को भी तवज्जो देते। वे कहते-"प्यार हो तो ऐसे हो। वरना ना हो।" 
मगर ख़याल के नाम पर वो कब अपनी पसंद उस पर थोपने लगी; उसे पता ही न चला। लड़के को कब कौन-सी शर्ट या टी-शर्ट पहननी है; कौन से रंग की पहननी है; यहाँ तक कि उसने मैचिंग़ कलर की जुराबें पहनी है या नहीं; इस बात का भी ख़याल वो रखने लगी। लड़के ने एक-दो बार समझाने की कोशिश की। कहा-"यार, मैं कैजुअल नहीं हूँ। परंतु लड़की ने प्रेम का हवाला देकर उसकी बातें अनसुनी कर दी। लड़का प्रेम समझ कर सबकुछ सहता गया। सहता ही गया। 
लेकिन हर अति का अंत होता है। जब मुहब्बत पकने लगती है। धीरे-धीरे उसे यह सब जबरदस्ती लादे गये एक बोझ की तरह लगने लगा। फिर भी उसकी हिम्मत नही हुई, कि वो लड़की को खुल कर बोल सके। बोल सके, कि- "यार मेरी ज़िन्दगी है, तो मैं क्या पहनूँ, क्या नहीं; यह पसंद भी मेरी होनी चाहिए। क्या मुहब्बत का मतलब यही होता है, कि मैं दुनिया तुम्हारी नज़रों से देखूँ? अगर यही मुहब्बत है तो भाड़ में जाए। मुझे नहीं करनी मुहब्बत। लेकिन उसने ऐसा नहीं कहा। वो डरता था, कि लड़की इस बात से नाराज़ होकर उससे किनारा ना कर ले। उससे रिश्ते न तोड़ ले। 
लड़के में प्रेम की बहती नदी दिनोंदिन सूखती जा रही थी। इस बात से पूरी तरह अंजान लड़की जब भी उसके सामने आती, उसका उदास चेहरा जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश करता। फिर दोनों साथ बैठते और अपने भविष्य के सपने बुनते। भविष्य अपनी मुट्ठी में क्या छिपाये बैठा है, इससे अनभिज्ञ दोनों भविष्य के घोंसले में अपनी गंध तलाशते कॉलेज़ के अंतिम दिनों तक आ पहूँचे थे। 
विदाई की बेला में स्वर्ग की अप्सरा जैसी सजी-धजी लड़की की आँख़ें लड़के को पूरे कॉलेज़ परिसर में  तलाश रही थी। लड़का शायद अंतिम दिन कॉलेज आया ही नहीं था। वो उसे उसके दोस्तों के ग्रुप में तलाशती बेचैन इधर-उधर भाग रही थी। क्योंकि पीठ उसकी ओर किये हर लड़का उसे वही नजर आता था। पर सामने जाने पर वह न होता था। दूसरी ओर उसकी सख़ियाँ उसे अंतिम विदाई दे रही थीं। लेकिन हताश-निराश उसका मन कहीं और रम ही नहीं रहा था। लिहाज़ा वो कॉलेज से अपने कमरे में लौट आयीं और तकिये में मुँह छिपाये रोती रही। बस रोती ही रही। शहर छोड़ने से पहले उसने तय किया, कि वह उसके हॉस्टल में जाकर पता करेगी। पता करेगी, कि वह विदा कहने कॉलेज क्यों नहीं आया। 
दूसरे दिन जब वह लड़के के हॉस्टल पहूँची तो उसे पता चला, कि लड़का विदाई से एक दिन पहले ही शहर छोड़ चुका था। बिना किसी को बताये। यह सुनकर उसका दिल बैठ गया। रुआँसी होकर वह अपने रूम पहूँची और शहर छोड़ने से पहले कमरे की चाबी मकान मालकिन को सौंपती उसके गले से लिपटकर रो पड़ी। उसकी बिख़री हुई मुहब्बत से अंजान मकान मालकिन सोच रही थी, कि लड़की को कमरे से मोह हो आया है। शहर से मोह हो आया है। इसीलिए वह रो रही है। लिहाजा उन्होंने सांत्वना भरे शब्दों के साथ कहा-"दिल छोटा मत करो बेटी! एक न एक दिन शहर तुम्हें विदा करता ही। क्यूँकि शहर को तुमने अपनाया ही इतने दिनों के लिए था। जाओ! खुशी-खुशी अपनी नयी ज़िन्दगी की शुरुआत करो। 
वह सिसकते हुए मन-ही-मन सोच रही थी, कि आंटी सच कह रही है। मैंने ‘शहर' को अपनाया ही इतने दिनों के लिए था। मकान मालकिन के लिए शहर महज़ शहर था। लेकिन लड़की के लिए शहर का मतलब ही नहीं बल्कि शहर के मायने भी बदल गये थे। उसके लिए शहर अब वो लड़का था। ओस की बूँदों की तरह गुम चुका उसका प्रेम ही अब शहर था। शहर या कि 'सहर।'  
वह अपने घर लौट तो आयी लेकिन उसका मन वहीं-कहीं, उसी शहर में छूट गया। थोड़ा-थोड़ा बंटकर। कुछ हिस्सा कॉलेज के दोस्तों के पास रहा। कुछ शहर वाले कमरे के पास। और बाकी जो बचा; वो उस लड़के को दे आयी। आज जब वह उस शहर में जाती है तो चारों तरफ़ उस लड़के को तलाशती उसकी नज़रें एक आह भरकर कहती है-
इस शहर से इक़ शिक़ायत है मुझको
कि तिरे चेहरे से चेहरे हैं हर ओर।

शनिवार, 20 जून 2020

मुखौटों के संसार में झूठ का पुतला हूँ 'जानिब'

मैंने अक़्सर लोगों से सुना है, कि समय सारे ज़ख़्मों की दवा है। सभी घावों का इलाज़ है। उसका भी, जो लाइलाज़ है। लोग ऐसा क्यों कहते हैं, कभी जो सोचा तो पाया- साँसें नहीं टूटा करती। दिल टूट जाते हैं। आस टूट जाती है। उस व्यक्ति से, उस चीज से जिससे हमारा सम्बन्ध जुड़ा होता है। जिससे हमारा लगाव होता है। बात कुछ-कुछ सही भी है। किंकर्तव्यविमूढ़ करने जैसी। मगर मैं नहीं मानता। मैं नहीं मानता, कि साँसें नहीं टूटती या दिल टूट कर कुछ समय बाद वापस ठीक हो जाते हैं। नहीं। ऐसा कदापि नहीं होता। अगर ऐसा होता, तो लोग आत्महत्या जैसी जघन्य कृत्य कभी न करते। आत्महत्या दरअसल तब की जाती है, जब आदमी की साँसें बहुत पहले टूट चुकी हो और वो अपने मृत देह को ढोते-ढोते थक चुका हो। 
साँसें नहीं टूटती, महज एक जुमला सरीखा वाक्य है। ज़िन्दगी की पथरीली और विषम परिस्थितियों में इस वाक्य का कोई जमीनी अर्थ नहीं। ना ही सच्चाई से इसका कोई वास्ता है। और समय, समय सभी घावों का इलाज़ नहीं कर पाता। कुछ घाव ता-उम्र हरे रहते हैं। जिसके सिलसिलेवार टीस से लोग टूट जाते हैं। उनकी साँसें बिखर जाती है। किसी रेत की मानिन्द। ज़र्रा-ज़र्रा। फिर रेत की ही तरह ज़िन्दगी की बाकी बची साँसें जीवन में वापस नहीं जुड़ पाती। न पटरी पर ही लौट पाती है। और न ही ज़िन्दगी में सबकुछ पहले जैसा हो पाता है। बल्कि होता ये है, कि समय के साथ-साथ हम ज़िन्दगी से समझौता करना सीख लेते हैं। हालात के अनुरूप ढल कर पुनः जीना सीख लेते हैं। उस पुराने किरदार को कहीं दूर छोड़ कर एक नये किरदार में जीने लगते हैं। जिसका कलेवर और फ्लेवर दोनों नया होता है। लेकिन दुर्भाग्य से, नया कलेवर सबको रास नहीं आता। कुछ टूटकर टूटे ही रह जाते हैं। कुछ आत्महत्या कर लेते हैं। कुछ उसी कलेवर में ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं। और बाकी जो बचते हैं, उसके लिए यह कलेवर कुछ ही समय के लिए कारगर सिद्ध होता है। क्योंकि जैसे ही वो कुछ देर के लिए अकेले पड़ता है; पुराना किरदार उससे सवाल करने लगता है। उससे पूछने लगता है-"तुम वाकई में ठीक हो? या ठीक होने का महज़ ढोंग रचा रहे हो? क्यों कर रहे हो यह दिखावा? लोगों को भरमाये रख सको इसीलिए? बाकी ये तो तुम भी जानते हो, कि तुम्हारी यह नाकाम कोशिश कितनी सफल है? तब उसे लगता है, कि जिस दुख़ को भूलने के लिए वो बरसों से परिश्रम कर रहा है। उसपर पानी फिरता जा रहा है। उसे लगता है, कि खुश रहने के लिए जो तपस्या की जा रही है, उसकी वो तपस्या भंग हो रही है। फिर उस दुख को भूला कर ज़िन्दगी में आगे बढ़ने की उसकी सारी योजनाएँ धरी रह जाती है। तब उसे अहसास होता है, कि उसके भूलने की सारी कोशिशें अब बेकार है। झूठ है। खुद से छलावा, एक धोखा है। क्योंकि भूलाने की तमाम कोशिशों से किसी दुख को भूला पाना सहज़ तो बिलकुल भी नहीं है। 

साँसें नहीं टूटती; लोग ऐसा क्यों कहते हैं? सोचने पर पाया, कि साँसें पानी की तरह होती हैं। और पानी कभी नहीं टूटती। टूट भी जाए तो वापस जुड़ जाती है। यह एकदम सच है। मगर पानी नहीं टूटती, सरासर झूठ। क्योंकि टूटना तो छोड़िए, मैंने पानी को अक़्सर चोट खाये आशिक़ की तरह चूर-चूर होते देखा है। आप भी देख सकते हैं। जब बारिश हो, अपनी हथेलियों को खिड़की से बाहर निकाल दीजिए। फिर देखिए; बारिश की नन्हीं बूँदें आपकी हथेलियों से टकरा कर कैसे खील-खील बिखरती हैं। 

क्या लगता है? समझदार लोग सबसे एक निश्चित दूरी बनाकर क्यों रखते हैं? बस इन्हीं कारणों से। क्योंकि कोई सच नहीं बोलता। बोलने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाता। वरना कौन है ऐसा, जिसके खाते में दो-चार दुखों की कहानियाँ न हो? पर सब हँस रहे हैं। एक-दूसरे से अपना दुख छिपा रहे हैं। और फिर अचानक... एक दिन आत्महत्या कर ले रहे हैं।

मुखौटों के संसार में झूठ का पुतला हूँ 'जानिब'
आँखों में लहू है बेशक़, मगर होठों पर हँसी है। 

बुधवार, 17 जून 2020

Father's Day.


पिता के नाम पर हासिल केवल वैमनस्यताएँ हैं। हम दो भाई और एक बहन थे, जब हमारी माँ गुज़र गयीं। ब्लड कैंसर था उन्हें। मुझे नहीं मालूम, किन्तु लोग कहते हैं- उन्हे बचाने के नाम पर केवल खानापूर्ति की गयी थी। माँ को गुजरे तीन वर्ष भी न बीते थे, कि बड़े भाई भी एक हादसे में चल बसे। पिता का स्नेह उन्ही से मिलता था मुझे। वह स्नेह भी जाता रहा। बड़ी बहन ब्याह दी गयी। मैं नयी माँ का नौकर हो गया। और उनकी जुबानी साँड़। गलती से कोई बात टाल देता तो भरपूर पिटायी होती। इसमें बाबूजी भी साथ देते। नयी माँ से मुझे तीन बहनें और एक छोटा भाई मिला। बाबूजी के अनुसार वो छोटा भाई नहीं, राजकुमार था। मुझे लगता था, राजकुमार का मतलब खूब अच्छा-सा नाम होता होगा। इसीलिए मैंने उसे राजकुमार ही पुकारना शुरू कर दिया। वो मुझे बहुत प्यारा लगता था। मासूम। तोतला। लेकिन जब वो बड़ा हो गया तो कहने लगा- तुम कुत्ते हो। मेरे छोड़े बिस्किट्स, चॉकलेट्स खाये हैं तुमने। सुनकर मुझे बुरा लगा। लेकिन अब मैं समझ चुका हूँ, कि राजकुमार खा-अघा कर जूठन छोड़ देने वाले को कहते हैं। 
जब मैं लोगों को फादर्स डे की खुशियाँ मनाते देखता हूँ तो मन करता है; उनकी आस्तीनें नोच लूँ और कहूँ- तुम खुशनसीब हो, कि तुम्हारी माँ ज़िन्दा है। इस खुशी में तुम्हारे साथ है। जी करता है भर आये मन लिए उन पर बरसूँ और चीख-चीख कर कहूँ- सभी पिता अपने बच्चों की ऊँगलियाँ नहीं पकड़ते। कुछ बेरहमी से गला भी पकड़ते हैं। मुझे नफरत है आपसे पापा! आई हेट यू।" 

लेखक के कहने पर नाम छिपाया गया है। अगर आप उनसे बातें करना चाहते हैं या उन्हें कोई सलाह देना चाहते हैं तो मेरे ई-मेल isanjeevgodda@gmail.com पर अपना संदेश छोड़ सकते हैं। संदेश उन्हें फॉरवर्ड कर दिया जायेगा। 

Not all Father's are diamonds. My mom passed away when I was too little and left me with the worst abusive father.

मंगलवार, 16 जून 2020

मुम्बई को इस्तीफ़ा सौंपना था मेरे बच्चे, ज़िन्दगी को नहीं।

आपने बहुतेरे पढ़ा/सुना होगा, कि आत्महत्या न तो कायरता है और न ही बहादुरी। यह डिप्रेशन का नतीजा है। ऐसा कौन होगा, जिसे अपनी ज़िन्दगी से प्यार न हो। यहाँ इस बात को मैं गलत तो बिलकुल भी नहीं ठहराऊँगा। बल्कि हामी भरूँगा। लेकिन बात यहाँ न तो साहस की है और न ही कायरता की। न फायदे की है न नुकसान की। बात है तो ज़िन्दगी से थक जाने की। हार जाने की। आत्महत्या, यानि वह अदम्य साहसिक कार्य; जिसे अक्सर हम अपनी ज़िन्दगी को ख़तम करने के लिए करते हैं। आत्महत्या, यानि मजबूरन अपनी मौत का कारण आप ही बन जाना। आत्महत्या, यानि दुनियावी रीतियों से खिन्न होकर बिना अफसोस बरास्ते-नर्क चल पड़ना। आत्महत्या, यानि अपनी ज़िन्दगी से इस्तीफा दे देना। यानी सभी कष्टों से मुक्ति पाने का सबसे सरल तरीका। 
आत्महत्या को खुद से खुद की आजादी के पहल के रूप में देखा जा सकता है। जो जैसी ज़िन्दगी जीता है, उसकी सोच भी कमोबेश वैसी ही होती है। आत्महत्या करने वाले लोग भी कहीं न कहीं अपने जीवन से ऐसे अनुभव पाते हैं, जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। और उस अनुभव के बाद उनके पास कोई और रास्ता नहीं होता। होता भी है तो उस कड़वे अनुभव के कड़वाहट में खो जाता है। आप सोच रहे होंगे; आत्महत्या ही क्यों? क्या उन्हें दूसरा रास्ता नहीं सूझता? शायद ऐसा इसलिए क्योंकि यह 'चट दवाई, पट राहत' जैसी है। अपने सभी कष्टों से हमेशा के लिए मुक्ति पाने का सबसे कारगर तरीका है।
लोग कहते हैं कि यह एक अवसाद है। ऐसे लोगों को फौरन डॉक्टर के पास जाना चाहिए। उनसे मैं कहना चाहूँगा, कि भाईसाहब; कुछ चीजों की दवाईयाँ नहीं होती। होती भी है तो वह दवाईयों से ठीक नहीं होती। कुछ चीजों की दवाईयाँ खुशियों के खिलखिलाहटों से भरी ओवरडोज होती है। और ऐसे लोग जिन्हें यह पता हो, कि इन हालतों में उसे क्या करना है तो वह आत्महत्या करेगा ही क्यों? यानि मैं सीधे-सीधे यह कहना चाहता हूँ, कि जो इतने होश में हो, कि डॉक्टर के पास चला जाए; वो आत्महत्या क्यों करेगा? 
ज़िन्दगी से सबको प्यार होता है। सब हँसना चाहते हैं। मुस्कुराना चाहते हैं। उड़ना चाहते हैं। दौड़ना चाहते हैं। प्रेम करना चाहते हैं। ज़िन्दगी को खुशी-खुशी जीना चाहते हैं। कोई मरना नहीं चाहता। लेकिन कभी-कभी लोगों को खुद से नफ़रत हो जाती है। हमें दूसरी चीजों से नफ़रत हो तो हम उबर जाते हैं। लेकिन खुद से नफ़रत हो जाए, तो कोई रास्ता नहीं सूझता, सिवाय इसके कि अपनी इहलीला समाप्त कर लें। मुझे नहीं पता कि आत्महत्या करने वाले लोग कायर होते हैं या साहसी। लेकिन इतना जरूर कहूँगा कि ज़िन्दगी को जीने का उन्हें हुनर नहीं आया। वो थक गये। हार गये। और हार कर दुनिया छोड़ गये। 

मुझे तुमसे हमदर्दी है डियर! मैं तुम्हे जितना जानता था, उससे तुम कायर कभी नहीं लगे। तुम लड़ते थे। जूझते थे। एक सामान्य व्यक्ति से अधिक जुझारूपन था तुममें। फिर भी तुमने यह कदम उठाकर साबित कर दिया, कि लोग थकते हैं। हारते हैं। कभी-कभी अपनी ज़िन्दगी से भी। मैं कभी नहीं जान पाया, न भविष्य में जान पाऊँगा, कि तुमने इतना बड़ा कदम कैसे उठा लिया। हम सब तुम्हारे इस तरह जाने से दुखी हैं। न केवल दुखी हैं, बल्कि हतप्रभ, सन्न हैं। और यह प्रार्थना करते हैं, कि तुम्हारी आत्मा को शांति मिले। 

ए-रस्सी! झूलने वाले से इतना तो पूछती 
ज़िन्दगी से क्यों तुझे आसान मर जाना लगा? 

रविवार, 14 जून 2020

ये प्रेम भी ना जानाँ, उफ्फ...

                                                    Pic credit: subir banarjee

याद नहीं, कि मुझे तुमसे इश्क़ कब हुआ था। याद नहीं, कि मुझे पहली बार इश्क़ कब हुआ था। प्रेम-व्रेम, इश्क़-विश्क़ उन दिनों इतने प्रचलित नहीं थे। या यूँ कहूँ, कि मुहब्बत की बातें लोग बेझिझक कह नहीं पाते थे। तो हो सकता है, मेरा तुम्हें मुस्कुराते हुए देखकर खो जाना ही इश्क़ रहा हो। चाहता तो एक अरसे से था, कि तुम्हारे माथे पर बोसा करुँ। हो सकता है, वही मेरी मुहब्बत रही हो। मुझे याद है, उन दिनों जब तुम एक दिन भी नहीं मिलती थी, तो मैं अपने रेंजर साईकिल से पैडल मारता तुम्हारे गलियों तक घूम आया करता था। तुम्हारी एक झलक देखता था, तब जाकर मुझे चैन पड़ता था। हो सकता है, तुमसे मिलना ही मेरा सुख-चैन रहा हो। 
कहते हैं; एक प्रेमी के ख़्वाब में कभी कुछ पूरा नही पड़ता। जाने ही क्यूँ। परन्तु मुझे लगता है, शायद यही अधूरापन आगे चल कर उत्कृष्ट रचनाओं में तब्दील होती हैं। ये प्रेम भी ना जानाँ, उफ्फ...

शनिवार, 13 जून 2020

जिमी-कन्द



करीब चार या पाँच साल पहले महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले से महिलाओं के शनि मंदिर में प्रवेश को लेकर आँदोलन के कार्रवाइयों की सूचना मिली। स्त्री विमर्श के तमाम पैरोकार, लेखक, बुद्धिजीवी, कानूनविद, शिक्षाविद इस घटना को अपने-अपने नज़रिये से देख रहे थे। यह अपने आप में कोई अकेला केस नहीं था। केरल, जो भारत का सबसे प्रगतिशील राज्य है और जहाँ की महिलाएँ समूचे भारत की महिलाओं की तुलना में सबसे अधिक पढ़ी-लिखी हैं। वहाँ तकरीबन बीस वर्षों से ऐसा ही एक आँदोलन चल रहा है। जी हाँ! महिलाओं को मंदिर में प्रवेश को लेकर आँदोलन। इन मामलों पर क्या ही कहा जा सकता है। सिवाए इसके, कि परम्पराओं का हवाला देकर हम स्त्रियों को कलंकित कर रहे हैं? इस मामले में मुझे सबसे बड़ा मज़ाक तो यह लगता है, कि कुछ लोग इसे केवल मंदिर प्रवेश, रजोधर्म और पवित्रता का ही मामला समझते हैं। समर्थन के अभाव में ऐसे मामले सीमित होकर सिमट जाते हैं और अंततोगत्वा दम तोड़ देते हैं। संविधान पर यकीन रखने वाले लोग इसे कट्टर पुरूषवादी मानसिकता कह सकते हैं। जो कि लैंगिक पूर्वाग्रह से ग्रसित है। 

लैंगिक पूर्वाग्रह। जहाँ महिलाएँ हर तरफ़ पिछड़ी है। सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी सोच के अनुसार इन्हें आज भी इज्जत नामक एक वस्तु मात्र माना जाता है। इसीलिए, किसी पुरुष को नीचा दिखाना हो या उसकी आन में बट्टा लगानी हो तो उसे गाली दे दो। गाली, जो पुरुषसूचक शब्दों से नहीं बनती। स्त्रीसूचक शब्दों से बनती है। गाली, जो पुरुषों का चीरहर नहीं करती। बल्कि स्त्रियों का चीरहर करती है। मौखिक चीरहर। गलती पुरुष करे तो भी चीरहर महिलाओं का किया जाता है। क्योंकि एक पुरुष से बदला लेने का सबसे आसान तरीका है, उसकी इज्जत को तार-तार कर देना। एक पुरुष की इज्जत। यानी एक स्त्री। और सदियों से आज तक सबसे आसान शिकार अगर कोई मिला है तो वह एक स्त्री रही है। वो अपनी ख़ूबसूरती पर नाज करती किसी कामुग्ध चित्त पुरुष के प्रेम को ठुकरा देती है तो बदले में पुरुष उसके नाज को ही जला कर राख कर देते हैं। तेज़ाब से। स्त्री दमन, स्त्री उत्पीड़न, स्त्री शोषण आज से नहीं सदियों से चली आ रही एक परम्परा जैसी है। जो इस बात की ओर इशारा करती है, कि स्त्रियाँ सदियों से पुरुषों के अधीन ही रही हैं। कहते हैं- 
चाँद-सितारों में भी गुले गुलाब लिखता है 
लहू जब खौलता है, इन्कलाब लिखता है 

स्त्रियों का लहू अब खौल रहा है। एक विचारधारा ससक्त रूप से जन्म ले रही है। नारीवाद। नारीवाद दरअसल राजनैतिक आँदोलनों विचारधाराओं, सामाजिक आँदोलनों की एक ऐसी श्रेणी है, जो राजनीतिक, आर्थिक, लैंगिक और व्यक्तिगत समानता को परिभाषित करने के लक्ष्य को लेकर चलती है। महिलाओं को पुरुषों के बराबर शैक्षिक और पेशेवर अवसर उपलब्ध कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने वाली विचारधारा का नाम है- नारीवादी विचारधारा। नारीवादी सिद्धांतों के उद्देश्य अनेक हैं। जबकि मूल कथ्य एक। कि अधिकारों का आधार लिंग तो कतई ना बने। 

वैसे तो नारीवाद के कई रूप और कई प्रकार हैं। लेकिन जो सबसे प्रचलित है, वो है- नारीवाद और नारीवादी समर्थक। नारीवाद और नारीवादी समर्थक में फ़र्क है। बहुत बड़ा फ़र्क। वो ये, कि नारीवादी विचारधारा समानता के लिए सड़कों पर उतर आते हैं। जबकि नारीवाद के समर्थक दूर से समर्थन कर देते हैं। उसके सदस्य नहीं बनते। नारीवाद के प्रकार- सांस्कृतिक नारीवाद। पर्यावरणीय नारीवाद। समतामूलक नारीवाद। समलैंगिक नारीवाद। उदारवादी नारीवाद। वैयक्तिक नारीवाद। मार्क्सवादी/समाजवादी नारीवाद। भौतिक नारीवाद। विखंडनवादी नारीवाद। आध्यात्मिक नारीवाद। इत्यादि। ख़ैर। इनके कितने भी प्रकार क्यों ना हों, इनका सिद्धांत एक होता है। भेदभाव, रूढ़िवादिता, वस्तुनिष्ठता, उत्पीड़न, यौन हिंसा और पितृसत्ता के खिलाफ पुरजोर विरोध करना। 

ये तो थी नारीवाद पर बातचीत। अब आते हैं मुद्दे पर। यानी स्फोटवाद की ओर। जिसके रचयिता हैं- महर्षि पतंजलि। 

कुछ समय पहले मैंने एक कहानी लिखी थी। आस्तित्व की तलाश । कुछ लोगों ने इस कहानी को आध्यात्मिक स्फोटवाद का नाम दिया तो कुछ ने कहा- मैं स्फोटवादी हूँ। स्फोटवाद के समर्थक यानी नित्य या नित्यवाद के समर्थक। हो सकता है, मैं नित्यवाद का समर्थक रहा होऊँ और मुझे मालूम ना हो? पर मैं स्वयं को जितना जानता हूँ, उतना किसी और को नहीं जानता। स्फोटवाद को भी नहीं। मैं जानता हूँ, कि मैं नास्तिक हूँ। और अगर कोई नास्तिक है तो वह स्फोटवाद का समर्थक कैसे हो सकता है? और अगर कोई स्फोटवाद का समर्थक है तो वह नास्तिक कैसे हो सकता है? ख़ैर। मेरी कहानी का सार आध्यात्मिक स्फोटवाद थी ही नहीं। जैसा, कि लोगों ने समझा। 
पर मैं कैसे समझाता? किस-किस को समझाता? और सबसे बड़ी बात, क्यों ही समझाता? फिर मुझे लगा, कि इस पर कुछ लिखूँ। लिखूँ, कि मैं स्फोटवादी नहीं हूँ। और आध्यात्मिक स्फोटवादी तो कतई नहीं हूँ। मैं लिखता गया। लिखता ही गया। 363 पन्ने लगे। यह समझाने में, कि मैं स्फोटवादी नहीं हूँ। मैंने लिखा- क्या हो, जब अपने बच्चे से खूब सारा प्यार करने वाली माँ को पता चले, कि वो अब तक प्रेम के रूप में अपने बच्चे को जहर परोसती आयी है? क्या वो स्फोटवाद का समर्थन करेगी? या फिर नारीवाद का समर्थन करेगी? आप कहेंगे- निःसंदेह वो स्फोटवाद का समर्थन करेगी। लेकिन यह यकीन करना कठिन है, कि एक माँ अपने बच्चे को प्रेम के रूप में ज़हर परोसेगी। 
यकीन कीजिए, एक माँ ऐसा कर सकती है। प्रेम की थाली पर ज़हर परोस सकती है। कैसे? जानने के लिए जिमी-कन्द पढ़िए।

गुरुवार, 11 जून 2020

इश्क़ का रंग साँवला।


“दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत रंग कौन-सा होता है?"
“नीला!" 
“नीला? जैसे?" 
“जैसे समन्दर। जैसे आकाश। जैसे स्याही। और... 
 और जैसे तुम्हारी आँख़ें।" 
“एक बात पूछूँ?" 
“हाँ, पूछो?" 
“ये ‘इश्क़' का रंग कैसा होता होगा?" 
“साँवला!" 
“साँवला? वो कैसे?" 
“मुझे तुमसे ‘इश्क़' है। और तुम्हारा रंग है साँवला। तो हुआ ना; इश्क़ का रंग साँवला?"

ह से हिन्दीऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ

इन दिनों मेरी हिन्दी के दो-दो धुरन्धर प्रकाशकों से ठनी पड़ी है। दोनों प्रकाशक बन्धु हिन्दी भाषा के बड़े ही प्रचलित और नामी प्रकाशक हैं। एक तो बकायदा बीस-बीस पुस्तकें एक साथ प्री-ऑर्डर में डाल देते हैं। दूसरा भी कुछ कम नहीं। उन्होंने तो हिन्दी को बचाने का तथाकथित बेड़ा ही उठा रखा है। इनके उपरी खोल को देखकर एकबारगी तो आप इनके चरणों में नतमस्तक़ भी हो लें। लेकिन बन्धु! गलती से आप लेखक-वेखक हैं तो आपको इनमें साक्षात खून चूसने वाले जोंक या पिस्सू ही नजर आयेंगे। 

हिन्दी को बचाने का दम्भ भरने वाले ये तथाकथित प्रकाशक, प्रकाशन के आड़ में लेखकों से व्यापार करते हैं। मेरी पुस्तक छप रही है; के एक्साटमेंट में कई नवांकुरों को तो पता तक नहीं होता है कि उन्हे रॉयल्टी में कितने प्रतिशत की हिस्सेदारी मिलेगी। उनसे ली जाने वाली सहयोग राशि इतनी बड़ी क्यों है। और तो और मार्केटिंग-डिस्ट्रीब्युटिंग वगैरह में उनकी पकड़ कैसी है। कहानी एप्रूव होते ही नवांकुर बिना ढंग से नियम-शर्तें पढ़े ही आनन-फानन में दिये गये बैंक अकाउंट में रुपये जमा करा देते हैं। इस बात से पूरी तरह अंजान कि उनकी राशि का उपयोग कहाँ-कहाँ और कैसे होगा। दूसरी ओर प्रकाशक महोदय गद्दीदार आरामकुर्सी पर बैठे दाँत कुरेदते हुए सोच रहा होता है, कि फेमस होने की चाह में आ गया एक और मुर्गा। वैसे सच कहूँ तो सभी मुर्गे साबित नही होते। मैं कई लेखकों से परिचित हूँ। जो बेस्ट सेलर्स की सूची में हैं। कुछ तो निजी मित्र और कुछ व्यवसायिक रुप से जुड़े हुए हैं। उन्हे फर्क नही पड़ा कि उनसे प्रकाशन के नाम पर बड़ी रकम ऐंठी गयी। कह सकते हैं पाठकों ने उन्हे भरपूर प्रेम दिया और न केवल उनकी लागत वसूल करवा दी, बल्कि फायदा, नाम, फेम सबकुछ दिया। उन्होने पाठक़ों के मन को ताड़ा और नयी हिन्दी बोलकर रीड एन थ्रो टाइप पुस्तकें लिख दी। जिसे कम से कम मुझ जैसा पाठक साहित्य का दर्जा तो नही ही देगा। इससे इतर, ऐसे कई लेखक हैं जो फर्स्ट एडीशन में प्रकाशित (महज छः सौ प्रति या बारह सौ प्रति) पुस्तकों का स्टॉक खतम होने की बाट जोह रहे हैं। 

फटाफट मजा लो और निकलो; के दौर में पाठक पुस्तकें भी ज्ञानहीन और क्षण में भरपूर मनोरंजन परोसने वाली पुस्तकों को ही तरजीह देते हैं। लेकिन अश्लीलता और गाली-गलौज युक्त बेबाक संवाद से भरे पुस्तकों को हम साहित्य का दर्जा दे भी कैसे सकते हैं। खैर। सबके अपने-अपने पाठक वर्ग हैं। कहना न होगा कि वे मुझे गाहे-बगाहे कहते रहते हैं, कि मैंने गलत प्रकाशक को अपनी मेहनत सौंप दी। अब बीस-बीस पुस्तकें एक साथ प्री-ऑर्डर में लगाने वाले प्रकाशक (मैं यहाँ नाम नहीं लूँगा।) आपके सालों के मेहनत को कहाँ आँक पायेंगे? उन्होने प्री-ऑर्डर लगा दी और प्रकाशन सम्बन्धी अपनी घोषणा भी कर दी। बिके न बिके। सही पाठकों तक पहूँचे न पहूँचे। उससे उन्हे क्या मतलब। आप उन्हे मोटी रकम तो दे ही चुके हैं, जिससे वो स्वीफ्ट डिजायर खरीद कर बाजू में “बड़े प्रकाशक" का तमगा लगाये बड़ी-बड़ी फंक्शनों में बतौर अतिथि मंच सज्जा करते फिरते हैं। चाहे लेखक उसके बाद लिखना छोड़कर प्राइवेट सिक्योरिटी गॉर्ड की नौकरी ही क्यों न करने लगे। मैं तो उस दिन की कल्पना में रोमाँचित हो उठता हूँ, जिस दिन प्रकाशक बन्धु किसी फंक्शन में जायें और उन्हे पता चले कि स्वागत द्वार पर खड़ा गार्ड और कोई नहीं बल्कि उनके प्रकाशन से प्रकाशित अमुक पुस्तक का लेखक है। क्या होगा उस समय? प्रकाशक बन्धु नजरें चुरायेंगे या गॉर्ड रुपी उस लेखक से नजरें मिलाकर हँसते हुए गुजर जायेंगे? मुझे लगता है दूसरा ऑप्शन ही अपनायेंगे। क्यूँकि शर्म बोलकर उनमें कुछ होती भी कहाँ है। एक बात तो मैं बताना भूल ही गया। वो ये, कि आपने सम्पादक शब्द को खूब मिस किया होगा। आपको लग होगा, कि शायद मैं सम्पादक शब्द लिखना भूल गया होऊँ। जी नहीं! मैंने सम्पादक शब्द इसीलिए नहीं लिखा, क्योंकि मैं इन्हें सम्पादक नहीं मानता।


तो भईया ये हालत है सेल्फ पब्लिकेशन का। ऐसा नहीं है कि सिर्फ यही हिन्दी लेखकों के साथ अन्याय करते हैं। बड़े-बड़े अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशक भी इससे अछूते नहीं रह गये हैं। आज हिन्दी के लेखकों की दशा ऐसी है कि वो सड़क चलते दिख जायेंगे. फिर भी आप उन्हे पहचान नही पायेंगे।
अभी पिछले ही दिनों एक धुरन्धर लेखिका (पेंग्विन पेपरबुक्स से प्रकाशित) ने मुझसे बातें की। तमाम चर्चाओं के बीच प्रकाशन का मुद्दा भी छिड़ा। उन्हे जानकर बेहद तकलीफ हुई कि मैंने दो-दो प्रकाशकों से पहले कहानी एप्रूव करवायी। फिर उनके द्वारा ऑफर किये गये पैकेज (सहयोग राशि सहित नियम और शर्तें) को ठुकरा दिया। उन्होने स्पष्ट किया कि बड़े प्रकाशक (राजकमल, पेंग्विन आदी) अमूमन देर से जवाब देते हैं। या तो इंतजार करो या इन्ही प्रकाशकों से प्रकाशित करवा लो। मैंने स्पष्ट कर दिया कि चाहे जो हो। इन ठगों के चंगुल में नहीं फँसना मुझे। पुस्तक से रोजी कमाने की इच्छा नही है। न रोजी-रोटी की चिंता है। इसीलिए अब करुँगा तो बड़ा ही। ढिबरी तले घात लगाये इन प्रकाशकों के हाथों विलुप्त लेखकों की बिरादरी में मुझे शामिल नही होना। उन्होने मुझे शाबाशी दी और भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ भी।  

अंत में! सावधान हो जाइये। हिन्दी को बचाने की आपकी यह कोशिश कहीं हिन्दी का गला ही न घोंट दे। 



बुधवार, 10 जून 2020

एक ख़त तुम्हारे नाम





मैं रोज सोचता हूँ, कि तुम्हे एक ख़त लिखूँ। वही ख़त, जिसे मैं अपने इश्क़ के पहले दिन से लिखना चाहता था। परन्तु कभी लिख नहीं पाया। सोच रहा हूँ, कि अब वो ख़त लिख ही दूँ। 
लेकिन लिख देने के बाद, क्या वो खत मैं तुम तक पहूँचा पाऊँगा? यदि नहीं; तो फिर लिखने का फ़ायदा क्या होगा? और चलो, कि मान लिया; किसी तरह तुम तक पहूँचा भी दूँ; तो क्या तुम पढ़ोगी उसे? तुम्हे याद होगी मेरी स्मृतियाँ? मेरा प्यार, मेरा समर्पण इत्यादी? पागल समझ कर हँसना मत, किन्तु कभी-कभी मन इन्हीं ख़यालों में डूबा जाने किस दुनिया के किस-किस 'सहर' भटकने लगता है। जिसका सार यही होता है, कि मानव मस्तिष्क एक निश्चित समय के बाद सहेजी गयी स्मृतियों को धुँधली कर देती है। ताकि वह घटने वाली लाइव घटनाओं को ठीक-ठीक ऑब्जर्व कर सके।
चलो मान लिया, कि मैं तुम्हें अब तक याद रहा होऊँगा; जिसका ठीक-ठीक कारण भी गिना दो तुम। कि तुम्हारा प्रेम भूल न सकी। भूलना आसान न था। और माना, कि तुम ख़त भी पढ़ोगी। लेकिन पढ़ने के बाद क्या महसूस सकोगी मेरे वर्षों के प्यासे मन को? महसूस सकोगी, कि कितना अकेला हो गया हूँ मैं इन दिनों? अगर मेरी इस लाईन को महसूस सकोगी; तो मुझे कहना न होगा, कि तुम्हारे बिना कितना ज्यादा अकेला हो गया हूँ मैं। 
जब जीवन लगने लगे अर्थविहीन 
एक शाम तुम मेरे नाम हो जाना। 
क्या कहा था तुमने, कि तुम्हारी तलाश सिर्फ मैं हूँ; इसे एक शायरी में समेट देने के बाद वो लाइन कैसी लगेगी, लिखकर बताना जरा? लो लिख दिया। बताओ; कैसी लगी? शायद तुम कह रही हो, हमेशा की तरह उम्दा। लेकिन मुझे सन्नाटों के अलावे और कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है। कतई यही फ़र्क हो सामान्य मौत और प्रेमियों के मौत में? बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ; लेकिन शब्द हैं, कि आँख-मिचौलियाँ खेलते-खेलते कहीं गुम से गये हैं। जिन्हें ढूंढने की ताब अब नहीं मुझमें। तुम जो गुमी; मेरे सारे हौसले गुम गये। दिन है, कि उदासियाँ लपेटे पड़ी रहती है। स्याह यामिनी चीखती हैं। जोरों से क्रंदन करती हैं। जिसके भय से इन दिनों जुग़नू तक नहीं टिमटिमाते। और इस साजिश में निशाचरी की मदद झींगुरों की टोलियाँ भी बराबर की भागीदारी निभाकर करती है। ऐसे में मुंडेर मेरा प्रिय मित्र बन गया है। कभी-कभी पूरी रात उसके साथ ही बैठा गुजार देता हूँ। पीने के लिए पानी नहीं रखता। उसकी जगह ब्लू लेबल स्कॉच व्हिस्की ने ले ली है। साँसें भी ऑक्सीजन की नहीं लेता; बल्कि ऑक्सीजन मार्लबोरो के धुएं में तलाशता हूँ। मुंडेर पर बैठे जब नज़र शहर के स्ट्रीट लाईटों पर पड़ती है, तो गुस्सा जोरों से आता है। मन करता है; उठाकर एक पत्थर फोड़ दूँ इन रौशनदानों को। कि अँधेरा कायम रहे। जी करता है, कि चीखूँ जोर से। इतने जोर से कि कुत्तों में अफरा-तफरी मच जाए। और शहर-शहर कोहराम। कभी-कभी मन करता है, सभी मुसाफ़िरों से बतियाता चलूँ। पूछूं उनसे हाल-ए-दिल। सुनाऊँ एक बढ़िया-सी शायरी। जिन्हें सुनकर वो करें वाहवाही। ठोकें पीठ पर शाबाशी के हाथ। और इसकी अनुभूति मुझमें यह अहसास जगाये, कि अभी ज़िन्दा हूँ मैं। फिर अचानक लगता है, कि खामोश हो जाऊँ। इतनी कि मुझे मेरी साँसें तक न सुनायी दे। ताकि उस सन्नाटे में सुन सकूँ नल से रिसती बूँदें। टप्प...! टप्प्प....! टप्प्प्पाक .........! घड़ी की टिक-टिक। मुंडेर पर बैठे कबूतरों के जोड़ों की किलोलें। उसके पंख फड़फड़ा कर एक-दूसरे के प्यार जताने के अंदाज़। और सुन सकूँ उस गूटर-गूँ में छिपी उनके प्रेम की हरेक आशनायी। 
लड़के नहीं रोते। क्या सचमुच? रुको हँसने दो। हा-हा-हा। कि लड़के नहीं रोते, के टैबू से आज़ाद होकर इन दिनों रो भी लेता हूँ मैं। सुना था कहीं, कि रोने से दिल हल्का हो जाता है। भक्क। वाहियात। एकदम झूठी ख़बर है। कोरी अफ़वाह उड़ा दी है किसी ने। आज तक दिल हलका न हुआ। अलबत्ता, सर जरुर भारी हो जाता है। आज-कल अकेलापन सारी हदें पार कर ब्लेड के तीखे धार को ताकता रहता है। जाने क्या ही इरादा है इस नासपीटे का। कि अब कौन-सा दिन है, जो देखना बाकी रह गया है? ईश्वर जाने। या अल्लाह! रहम। अलहमदुलिल्लाह! रहम। 
लिखने को तो बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ। लेकिन कलम है, कि अब साथ नहीं दे रही। मुझे मालूम है, तुम कभी नहीं लौट सकोगी। परन्तु एक आस, एक उम्मीद के साथ कहना चाहता हूँ; यदि संभव हो तो तुम लौट आओ। मैं ये तो नहीं कहता, कि तुम्हें दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार दूँगा। लेकिन ये वादा जरूर करता हूँ, कि मेरी दुनिया के सारे प्यार पर केवल और केवल तुम्हारा हक होगा। 
तुम्हारे इंतजार में-
तुम्हारा~संजीव 

मंगलवार, 9 जून 2020

मुकम्मल चाँद





कभी-कभी लगता है
तुम्हें मुकम्मल चाँद होना था
भले तुम पर कविताएँ लिखता
पर तुम्हें पाने का ख्वाब न देखता 
-निर्मोहिया

सच्चाई की आत्महत्या


मैंने एक शख़्स का क़त्ल किया है। बड़े मुहब्बत और क्या ही साफ़गोई से। यों कि मरते समय वह छटपटा तक न सका। उसने मेरी हड्डियाँ नहीं तोड़ी थी। ना ही मेरी चमड़ी ही उधेड़ी थी। उसने मेरे किसी अपने को भी नहीं छीना था। ना मेरे किसी अज़ीज़ का दिल ही दुखाया था। फिर भी मैंने उसके सीने में एक ज़हर बुझे ख़न्ज़र को पैवस्त कर दिया। और उसे तड़पता छोड़ आया। 
उस शख़्स ने मुझे ज़िन्दगी दी थी। रहने के लिए एक पिंज़रा दिया था। वो नीला पिंज़रा आसमान जितना बड़ा था। पैरों में बाँधकर नैतिकता की ज़ंज़ीरें, उसने खुले में रख छोड़ा था मुझे। अनन्त आकाश में उड़ने के लिए। एकदम आज़ाद। 
अपनी प्रेम भरी बातों से वो मेरे आँसुओं को पोंछता था। पोंछ कर आँसुओं को, वो मेरी आँखों में सत्य और अहिंसा के सूरमे लगाता था। जो चुभती थी मुझे। विष बुझे तीर की तरह। वो हज़ारोॆ मर्तबा मेरे ह्रदय को छेदता था। फिर सम्हालता भी वही था। किसी नुकीले क़ैक़्टस की तरह। ज़िस्म को छलनी-छलनी करके। 
उसने मुझे रास्ता दिखलाया था। एक नये नरक़ का। सच बोलने का नरक़। जो नरक़ों में सबसे ख़राब नरक़ था। सड़ा हुआ। घिनौना। बदबूदार। उससे मुझे नफ़रत नहीं थी। उसकी आँखों में छल-क़पट, मक़्क़ारी का कतरा अंश भी नहीं था। वो बहुत ही अच्छा इंसान था। फिर भी मैंने उसका क़त्ल कर दिया। कई कैरेट शुद्ध विष बुझे ख़न्ज़र से। यही कुछ देर पहले ही। यक़ीन न आये तो जाकर देख लीजिए उसकी लाश। उसकी लाश के सामने ही मैंने छोड़ दिया है उसके पिंज़रे को। उस ज़ंज़ीर को। उन बेड़ियों को। हथक़ड़ियों को। ज़हर की शीशी भी मैंने वहीं छोड़ दी है। ख़न्ज़र भी। 
वो मुझसे प्यार करता था। पर नहीं झेला गया वो क़ैक़्टस। मार दिया मैंने उसे। बेरहमी से।

औरत का दुख


कहना था उसे कि 
मुझे भी सुख चाहिए 
दम भर नहीं 
थोड़ा सही 

हे प्रभु... बस! 
थोड़ा ही सुख चाहिए... 
मुझे भी 
पर... नहीं कह पायी 
कहते हैं कि जो नहीं कह पाते-
वो वंचित रह जाते हैं पाने से 

वो भी वंचित रह गयीं 
ईश्वर ने उसे दिया 
वो जो किसी काम का नहीं था 
प्रेम, ममत्व, वात्सल्य और...
दुखों में डूबे ढेर सारे नमकीन आँसू

सोमवार, 8 जून 2020

गिरगिट की अदमियत


1- अदमियत

मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ 
ताल ठोकी है मैंने 
और चोर दरवाजे से 
पलायन की भी तैयारी है। 


2- सभ्यता

मुझे नफ़रत है ऊँचे माथों से 
ख़बरदार! सर झुका कर चलो
यह प्रेम किस चिड़िया का नाम है 
डाल दो पिंजरे में, मुसीबत पार करायेगी 


3- ठेकेदार 

और सुनो; छोटी जाति के अछूत शूद्रों 
ज़िन्दा चुनवा दूंगा 'हकूक' की बातें की तो 
भाग्य ऊपर लिखाता है, तुम मूर्ख क्या जानो
मंदिर अपवित्र किये तो खाल उधेड़ दूंगा। 


4- गिरगिट 

ए-ठकुराईन! हमारे कपड़े कहाँ रखी हो 
अरे वही, जो गिरगिटिया गुणों से लैस है 
दरअसल हम एक बड़े जलसे में जा रहे हैं 
जहाँ भाँति-भाँति के गिरगिट आने वाले हैं।

रविवार, 7 जून 2020

लड़के... जो फूँक दे सिगरेट तो आसमान में गुलाबी रुई तैर जाएँ।




“सुनो!" 
“हाँ! कहो?" 
“मुझे आज तक कोई लड़का पसंद नहीं आया? तुम बता सकते हो क्यों?" 
“क्योंकि तुम्हे किसी में वो जादू नहीं दिखा; जो तुम्हारी रुह को झकझोर सके।" 
“क्या मतलब? तुम्हे लगता है, कि मैं ख़ुद के लिए जादूगर ढूँढ़ रही हूँ?" 
“नहीं! मेरा वो मतलब नहीं था। तुम्हारी आँखें उस जादूगर को तलाश रही हैं; जो तुम्हारी कलाकारी में तुमको न केवल मात कर दे; बल्कि हैरान कर दे।" 
“तुम कहना क्या चाहते हो? मुझे ऐसी कोई भी कलाकारी कहाँ आती है?" 
“आती है। तुम जब सिगरेट पीती हो तो धुओं का छल्ला बेहद खूबसूरती से बनाती हो। तुम्हे पसंद आयेगा वो बिंदास लड़का... जो फूँक दे सिगरेट, तो आसमान में गुलाबी रुई तैर जाएँ।" 
“ओह! अब मुझे सारी बातें समझ आ गयीं। ये भी; कि मुझे आज तक कोई लड़का पसंद क्यों नहीं आया। ये भी, कि तुम जब फूँकते हो सिगरेट तो आकाश में रुई से बादल क्यों उमड़ पड़ते हैं। और ये भी, कि...
मैं तुम्हे खोने से इतनी डरती क्यों हूँ।" 

शनिवार, 6 जून 2020

कहो मेरी जान, तुम चुप क्यों हो?




तुमने कहा-"मैं तुमसे बेहद मुहब्बत करती हूँ।' क्या सचमुच? आह्! मैं तुम्हें बता नहीं सकता, कि यह सुन कर मुझे कितनी खुशी हुई थी। क्योंकि मेरी माँ के अलावे मुझसे किसी ने 'बेहद मुहब्बत' नहीं की। मुहब्बत यूँ तो बहुतों ने की; मगर सब आये, फायदे की झोली उठायी और चलते बने। जाहिर है, उनके जाते ही उनकी मुहब्बत भी उनके साथ ही चली गयी। फिर तुम आयी। एक भरोसा जगाया। तुम से मुहब्बत करने के बाद मैंने ये कभी नहीं सोचा था, कि एक दिन तुम भी अपनी मुहब्बत समेट कर चल दोगी। कितना आसान होता है ना, किसी की ज़िन्दगी से निकल कर जाना? बस; एक ऐसा बहाना चाहिए होता है, जिसे सुनकर सामने वाला कुछ-कुछ किंकर्तव्यविमूढ़ सा होकर रह जाए। ना कुछ बोल पाए। ना जाते को रोक पाये। 

मैंने गुलाब कभी नहीं सूंघे थे। वो भी फुरसत में। तसल्ली से। कभी कॉफी नहीं पी थी। देसी ब्वॉयज़ की तरह बीयर पीता था। रेड लेबल वाइन पीता था। सड़ी गरमी में पसीने से तर होने के बावजूद चाय और सिगरेट को प्राथमिकता देता था। कड़ी धूप में छाँव देने वाले मेरे कुछ दोस्त भी थे। जो मुझे भाई कहते थे। तुम्हें क्या हक था, इन सारी चीजों को छुड़वाने का? कौन थी तुम; जो कहती थी-'प्लीज! मेरे खातिर तुम इन चीजों को नहीं छोड़ सकते? जवाब दो मेरी जान? तुम चुप क्यों हो?

तुमने सम्पर्क तोड़ा। मैं चुप रहा। तुमने बातचीत छोड़ी। मैं चुप रहा। तुमने गली छोड़ी। मैं चुप रहा। तुमने चैटअप छोड़ा। मैं चुप रहा। तुमने नम्बर बदले। मैं चुप रहा। तुमने फेसबुक छोड़ा। मैं चुप रहा। यहाँ तक कि तुम शहर भी छोड़ गयी। मगर मैं फिर भी चुप रहा। लेकिन अब चुप नहीं रह सकता मेरी जान। नहीं रह सकता अब चुप। क्योंकि भीतर कुछ दुख रहा है अब। बहुत दुख रहा है। दुख तो पहले भी रहा था, मगर सहन कर सकूँ; उस हद तक ही दुखता था। इन दिनों दिल में फोड़े उठ रहे हैं। दिल रह-रहकर हूकता है। कि तुम कितनी अदायगी से, कितनी बेहतरीन झूठ बोल लिया करती थी। यह याद कर-करके दिल खुद को कोसता है इन दिनों। कहो! तुमसे नफ़रत क्यों न किया जाए जाना? तुम्हें बेवफा, संगदिल क्यों न कहा जाए? कहो मेरी जान? तुम चुप क्यों हो? 

आज जी भर दारु पी है मैंने। सिगरेट को रह-रह कर सुलगाया है। वो क्या है ना, मुहब्बत की लच्छेदार बातें करने वाली कोई महबूबा पास नहीं है। पास तो तुम भी नहीं हो। जो सिगरेट बुझा देती थी। दारु छुड़ा देती थी। 
अब हर आतिश पर आवारगी का नाम होगा जाना। अब हर रात गजल में डूबी होगी। अब सुबह का सूरज दिन ढलने के बाद निकलेगा। और रात की शुरुआत होगी दो पैग हलक़ से उतरने के बाद। क्योंकि मुझे मुहब्बत है! मुझे मुहब्बत है जाना, मुझे तुमसे मुहब्बत है। कुछ कहती क्यों नहीं? कहो मेरी जान, तुम चुप क्यों हो?

शुक्रवार, 5 जून 2020

चीड़ के सपने



एक सपना; जो मैं बार-बार देखता हूँ। देखता हूँ, कि मैं स्टेशन पर हूँ और मेरी ट्रेन छूट गयी है। स्टेशन कहाँ का है, ट्रेन कौन-सी है, कहाँ छोड़ती है, छूट कैसे गयी, इसके बारे में कुछ पता नहीं होता। मैं खुद को ऐसी जगह पाता हूँ, जहाँ चारों तरफ ट्रेनें दौड़ रही है। फुल स्पीड से। लग्ज़री बसों जैसी बोगियाँ। बड़ी-बड़ी। मगर यात्रियों से खचाखच भरी हुई। और मैं उन ट्रेनों से घिरा हुआ। ना तो मुझे भागने की जगह मिलती है और ना निकलने की। मैं इस दौरान बदहवास और बेहद डरा हुआ होता हूँ। मैं उस जगह से निकल कैसे पाता हूँ, नहीं जानता। लेकिन दिमाग में जोर डालने पर याद आता है, कि कोई तंग गली है। अंधेरों से भरी। उसी पर चलते हुए मैं बाहर निकलता हूँ। वो तंग गली शुरू कहाँ से होती है और ख़तम कहाँ, मैं यह भी नहीं जान पाता। मगर हाँ! उसके बाद का दृश्य एकदम बदल जाता है और मैं खुद को किसी पहाड़ियों वाले इलाके में पाता हूँ। वो इलाका, जो कभी हरी -भरी और संपन्न रही हो। परन्तु मानवों ने विकास के नाम पर उसे उजाड़ डाला हो। मैं बार बार देखता हूँ, कि पहाड़ियों के नीचे एक मैदान है। मरजीत्ता मैदान। कहीं-कही आम के पेड़ लगे हैं। कटहल के पेड़ लगे हैं। बाँस लगे हैं। और कभी-कभी अमलतास के दर्शन भी होते हैं। लेकिन अमलतास हर सपने में नहीं दिखते। मानों वो भूलने की सजा भूलने से दे रही हो। ख़ैर जैसे-तैसे मैं पहाड़ पर चढ़ता हूँ। कभी-कभी उतरता भी हूँ। लेकिन चढ़ने के मुकाबले उतरना कम होता है। पहाड़ के उस पार मुझे एक जंगल दिखता है। जंगली जानवरों और पक्षियों से रहित जंगल। उस जंगल के सूनेपन पर मैं रोना चाहता हूँ लेकिन रो नहीं पाता। मैं बदहवास-सा फिर भागने लगता हूँ और अचानक जंगल के बीचों-बीच चार-पाँच लोगों द्वारा घेर लिया जाता हूँ। वे मुझे पकड़ने की कोशिश करते हैं। उनके पास बंदूकें होती हैं। सपना टूटने पर मैं सोचता हूँ, कि वे जान लेना चाहते तो झट ले सकते थे। पर वे नहीं लेते। वे सभी लड़के देखने में जंगली जानवरों से लगते हैं। उनके बिखरे हुए बाल मुझे और भयभीत करती है। उनकी उम्र बीस से तीस के बीच की होगी। बड़े भद्दे दिखते हैं वे। पतले-दुबले। उनकी आंखों से क्रूरता टपकती है। 

उसके बाद मैं बेहोश होने का नाटक करता हूँ। और चालाकी से उनके चंगुल से भाग खड़ा होता हूँ। इस दौरान मेरी सांसें फूली हुई होती है। और आश्चर्य इस बात पर होती है, कि जिस तेजी से मैं रियल लाईफ में दौड़ता हूँ, सपने में स्पीड उसकी आधी भी नहीं होती। मैं इतना घबराया हुआ होता हूँ, कि मेरी सांसें अब-तब में ठहर जाएगी; मुझे ऐसा लगता है। मैं और कितना दूर भागता हूँ पता नहीं। क्योंकि उसके बाद के दृश्य में मैं ख़ुद को ऐसी जगह पाता हूँ, जहाँ एक पेड़ के नीचे पंद्रह-बीस लोग ताश खेल रहे होते हैं। मैं उनके पैरों पर गिर पड़ता हूँ। उनसे मदद मांगता हूँ। वे कुछ नहीं होने देने का भरोसा देते हैं। और वे लड़के, जो मुझे ढूंढ रहे होते हैं, भीड़ को देख कर वहीं के बने मकानों में जा घुसते हैं। मकान, जो थोड़ी देर पहले तक वहाँ नहीं होते। और उन लड़कों को देखकर लगता है, कि वो घर उन्हीं के हों। मैं फिर भागता हूँ। वहाँ से उठ कर नहीं। बल्कि मुझे याद भी नहीं रहता, कि मैं वहाँ से कैसे भागता हूँ। पर भागता हूँ। लगातार। और भागते-भागते अपने आप को एक पहाड़ की चोटी पर पाता हूँ। पहाड़ की वो चोटी जानी-पहचानी-सी लगती है। लगता है, वो मेरे गांव के पास वाला पहाड़ है। सालगाह पहाड़। मैं पहाड़ की चोटी पर बैठ ही रहा होता हूँ, कि वे लड़के फिर आ जाते हैं। अचानक। और एका-एक मुझ पर गोलियां बरसाने लगते हैं। कुल सात गोलियां लगती है मुझे। हर-बार। केवल सात गोलियां। और सपना ख़तम हो जाता है।

गुरुवार, 4 जून 2020

मुझसे पहले इस खिड़की पर जो लड़की रहती थी...



“कहाँ हो बे.?" 
“बेड पर! तुम्हे ही सोच रहे हैं। यहाँ का मौसम बड़ा खराब है। ठण्ड से हथेलियाँ काँप रही है। हाथ से गिर कर अभी-अभी काँच का गिलास टूटा है मुझसे।" 
“काँच के ग़्लास को कत्तई मेरा दिल बना रहे हो बेट्टा। ढंग से थाम ही नहीं रहे। देख लेना। टूटे तो चुभ जायेंगे। गहरे।" 
“जख़्म खाये वो आशिक़ क्या कराहे, उम्र भर जो शीशों पर चले। वैसे भी मुझे स्पोर्ट्स शूउज़ की पुरानी लत है।" 
“वा बेट्टा! कि घाव लगने से बचने को इंतज़ामात अच्छे हैं। मगर हम भी वो शीशे हैं जो पैरहन को चूम कर घायल कर देते हैं। कहो, लगी बाजी?" 
“इश्क़ की बाज़ियाँ हम नहीं खेलते। सौदा मौत से जो करे, शैशव बाज़ियाँ उन्हें कहाँ भाये।" 
“प्रेम का रोग भी सौदा कम नहीं मौत से बाबू। कभी हो यदि प्रेम तो बताना, मरना आसान क्यों है।" 
“बउरा गयी हो। हाँ। और का कहें। इश्क़ में मरना? रुको हँसने दो। हाऽहाऽहाऽहाऽ.. कहीं डूब मरो। कह रहे हैं। बड़े आये प्रेम-रोगी।" 
“डूब मरेंगे बे! डूब मरेंगे। तुम जरा समंदर तो हो जाओ।" 

बुधवार, 3 जून 2020

इश्क़ रूहानी भली। न तो कल्ले होना भला।

"यार! मुझे किसी से प्यार हो गया है।"
"वो भी तुमसे मुहब्बत करती है?"
"हाँ यार! करती तो है। बहुत ही अधिक।" 
"तुमने अपनी प्रेमिका की आँखों में वात्सल्य उमड़ते देखा है?"
"वात्सल्य? ये क्या है?"
"तुम्हे कभी लगा, कि उसकी आँखों में तुम्हारे प्रति ममता उमड़ रही हो? जैसे एक माँ की आँखों में कभी-कभी सहज़ ही उमड़ पड़ती है?" 
"नहीं यार! ऐसा तो बिलकुल भी नहीं लगा।" 
"तो मेरे दोस्त! तुम्हे प्यार नहीं हुआ। बल्कि तुम उसके रुप और यौवन के मायाजाल में फँसे हुए हो। जो जल्दी ही शीश महल के सपने की भाँति चूर हो जायेगा।"
"लेकिन वो तो मुझसे प्रेम करती है?" 
"नहीं दोस्त! वो प्रेम करती नहीं; बल्कि प्रेम करती हूँ, यह कहती है। एक लड़की झूठ बोल कर प्रेम जता तो सकती है; मगर उसकी आँखें सब बयाँ कर देती है।" 
"तुम लेखकों की बातें अजीबोगरीब होती है। कैसे साबित करोगे इस बात को?" 
"प्रेम को साबित करने के लिए सच्चे प्रेमी की जरूरत पड़ती है। जैसे माँ, उसकी आँखों में झाँकना तुम। जब मुसीबत में पड़ोगे। देखना एक वात्सल्य। कैसे उमड़ रहा होगा। उसे साबित नहीं किया जा सकता। सिर्फ महसूसा जा सकता है। वैसे ही तुम्हारी प्रेमिका जब तुमसे सच्ची मुहब्बत करने लगेगी; तो तुम्हे महसूस होगा, कि प्रेमिका की आँखों में माँ की एक परछाई उमड़ रही है। वही वात्सल्य। वही ममता लिए। अपने निश्छल भाव में। फिर तुम स्वयं कहोगे, सच्ची मुहब्बत बयाँ नहीं की जा सकती। महसूसी जा सकती है। फिर उसे स्वयं भी भूलना चाहो, तो आसान नहीं होगा। उसे कभी नहीं भूल पाओगे। न धोखा जैसे शब्द ही होंगे तुम्हारी ज़िन्दगी में। जिओगे उसी के लिए, मरोगे उसी के साथ।" 
"तुमने महसूसा है?" 
"मैंने? उसके साथ भर होने से मैं अपनी माँ को भूल जाता था।" 
"सचमुच यार! कितनी रूहानी होगी तुम्हारी प्रेम-कथा।" 
"रूह से मुहब्बत करो। इश्क़ रूहानी ही होती है।" 
"मतलब कल ही ब्रेकअप करवाओगे।"
"इश्क़ रूहानी भली। न तो कल्ले होना भला।" 

मंगलवार, 2 जून 2020

लप्रेक

डीईओ ऑफ़िस में मेरी इन्टरव्यू चल रही थी। तीन अनुभवी और उम्रदराज़ अधेड़ों के बगल में वो अकेली और चौथी इन्टरव्यूवर थीं। चूँकि मैं उससे तकरीबन पाँच मीटर की दूरी पर बैठा था; फिर भी मेरे सिक्स्थ सेंस ने यह भाँप लिया, कि इसकी उम्र अधिक से अधिक पैंतीस होगी। मैं सत्ताईश वर्षीय गेहुँवन मुखारविन्द नवयुवक; और वो प्रातः काल की लता-वल्लरी। मुखड़े पर स्वर्णिक आभा का तेज। सन सिल्की केशों की उस मल्लिका के होंठों पर शबनम की लाली खूब शोभा पा रही थी। जिसके बीच सफेद मोतियों की लड़ियाँ रह-रहकर झिलमिला रही थीं। उसकी एक झलक पड़ते ही मेरे आँखों ने कहीं और देखने से इन्कार कर दिया। सम्मोहन क्या होता है; मुझे उसी दिन पता चला। 
मुझे मालूम था; यदि आज इससे नाम पता न पूछ सका; तो शायद जीवन में कभी न जान सकूँगा, कि यह आयी कहाँ से है। और मेरे पास केवल इन्टव्यू के दरम्यान भर का समय था। दिमाग में तैर रहे इन्टरव्यू से संबंधित सभी नियम-कायदे एकाएक कहीं गुम चुके थे। ख़याल था; तो बस एक ही! मुझे इसका नाम पता चाहिए। कैसे? यह मैं भी न जानता था। मतलब कैसे भी। 
मेरा नाम और शैक्षणिक योग्यता के मामूली सवालों के बाद इन्टरव्यू आगे चल पड़ी।
इन्टरव्यू के बीच में ही मैंने पूछा-“Can I ask you something? 
उसने ऊँगली अपने वक्षस्थल पर रखकर कहा-“Me? 
“Yeah...." मैंने झिझक कर कहा। 
वो मुस्कुराईं, और बोली-“Sure..." आप हिन्दी बहुत अच्छी बोलते हैं; तो मुझसे भी हिंदी में बातें कर सकते हैं। 
उसकी बातें, जैसे पुकार-पुकार कर कह रही थीं; मुद्दे पर आ जाओ। समय कम है। मुद्दे पर आ जाओ। 
मैं मुस्कुरा पड़ा। जमीन की ओर ताकने के बाद मैंने उसकी आँखों में अपनी नजरें गड़ा दी। और बोला-“आमतौर पर हिन्दी को सौतेली माई कहा जाता है। अतः नफरत व्यवहारिक हो जाती है। और इस समय मैं कतई नहीं चाहता; कि मेरा इंप्रेशन आप पर कुछ कम पड़े। शायद यही वजह है, कि मैंने आपसे हिन्दी में बातें नहीं की। 
“आप कुछ पूछना चाहते थे?" उसने कहा। 
“क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ?" मैंने स्पष्ट पूछ लिया। 
वो आहिस्ते से हँस पड़ी। साथ ही सामने बैठे तीनों इन्टरव्यूवर भी मुस्कुराने लगे। उसमें से एक ने कहा-“शायद आप गलत जगह पर बैठे हैं। ऐसा करते हैं, कि हमारा इन्टरव्यू आप ले लीजिए।"
“आप उपज हैं बीज गणित के; लंगड़ी टाँग मैं जानूँ ना। कैसे लूँ महोदय आपका इन्टरव्यू? मेरा नाम पूछना बुरा लगा हो; तो क्षमाप्रार्थी हूँ।" कह कर मैं चुप हो गया।
“मुस्कान सिंह।" वो धीमे स्वर में बोली। 
मेरे दिमाग ने असंख्य नसों को कलम बना कर उसमें रक्त की स्याही चढ़ायी और दिल के नोटबुक पर लिखा- मुस्कान सिंह।
आगे कुछ और पूछ सकूँ; इसकी हिम्मत नहीं पड़ी। और इन्टरव्यू खत्म करके मैं बाहर आ गया। सच कहूँ तो इन्टरव्यू बेहद बुरा गया। मगर जिस वजह से गया; वो मुझे रत्ती भर भी बुरा नहीं लगा। 
बाहर मैंने बहुत देर तक इंतजार किया। शायद वो बाहर निकले और मैं उससे कुछ बातें कर सकूँ। आगे की बातचीत के लिए कोई बहाना ढूंढ कर अपने प्रेम की गाड़ी को थोड़ा और आगे बढ़ा सकूँ। परंतु वो नहीं निकली। मैं मन ही मन निराश होने लगा। अब निकलेगी; तब निकलेगी; करते शाम हो गयी। 
पता चला कि चारों पिछले दरवाजे से वापस जा चुके हैं। मेरा दिल बैठ गया। 
मैंने पूछा-“आये कहाँ से थे?" 
“मैनेजमेंट ने कहा-“राँची से। 
वापस लौटते हुए मेरा अंतर्मन सोच रहा था; इतने बड़े शहर की आबादी में कहाँ-कहाँ खोजूँगा उसे.? 
अंततः मैंने मन को समझाया और कहा-"रे मनवा! चलल जाय। कि इश्क़ तोहार बूता में नईखे। 

धर्म ख़तरे में है।

लोग जिसे ईश्वर का नाम देते हैं, वो कुछ और नहीं बल्कि मानवता है। ईश्वर किसी उड़ती चिड़िया का नाम नहीं। यह सिर्फ और सिर्फ मानवतावाद का नाम है।
 
और ये, जो धर्म नाम के ज़हरीले विचार चहुँओर फैले हुए हैं; ये सच्चे अर्थों में मानवता रुपी पौधे के विकास पर बहुत बड़ा रोड़ा है। क्योंकि ईश्वर के रहते मानवतावाद कभी फल-फूल नहीं सकता। धर्म के रचनाकार, पाखण्डी धर्म गुरू और उनके ढोंगी चेले-चपाटे मानवता को किसी भी सूरते-हाल जीवित नहीं रहने देंगे। क्योंकि मानवतावाद के आस्तित्व में आ जाने से इनकी दुकानें जबरदस्त घाटे में चलने लगेंगी। और ये लोग इस नुकसान को सपने में भी नहीं सह सकेंगे। इसीलिए आये दिन ये चिल्लाते हैं-धर्म ख़तरे में है। ईश्वर ख़तरे में है। दरअसल ख़तरे में धर्म या ईश्वर नहीं, बल्कि इनकी दुकानें हैं। ये पाखण्डी जानते हैं, कि वे सारे अँधे-बहरे लोग, जो भैंस के पूँछ की तरह लहराते समर्थन में उनके पीछे-पीछे चल पड़ते हैं। वो मानवतावाद का असली चेहरा देख कर सुषुप्तावस्था से जाग गये और अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक-ठीक करते हुए मजबूरों की मदद करने लगे तो वे भूखों मरने लगेंगे। 
धर्म के ठेकेदार यूँ ही नहीं अफ़ीम के कारोबारी कहे जाते हैं।

सोमवार, 1 जून 2020

साले जाहिलियत से भरे हुए नंगे लोग।


वोदका मिलेगी कहीं? नहीं? रम? ब्राँण्डी भी नहीं? नहीं भाई साहब; वो बात नहीं है। पीने का आदी होता तो ठेकों का पता नहीं पूछता फिरता। बल्कि दारु के दुकानदारों का फोन नम्बर नोट करके रखता। आप कैसी बातें करते हैं? मैं तो शराब इसीलिए ढूँढ रहा हूँ, कि कई रातों से सोया नहीं। कुछ याद नहीं रहता आजकल। हर वक़्त बस नींद के सपने देखता हूँ। अभी दो महीने पहले ही एक किलो प्याज़ ली थी। पच्चीस रुपये लगे थे। आज रैक में से कोई पत्रिका ढूँढ रहा था। पत्रिका तो नहीं मिली पर रैक में से सड़े हुए प्याज़ की बदबू आ रही थी। अचानक याद आया, मेरे पच्चीस रुपये सड़ गये। आप ही बताइए; रुपये कभी सड़ते हैं? जानता, कि ये रुपये सड़ने वाले हैं तो किसी ज़रूरतमंद को नहीं दे देता? ख़ैर। आपके इस पैग के लिए शुक्रिया। देखिए न, आसमान है, कि घनी सुन्दरता बिखेरते नहीं थकता। और हम भुलक्कड़ इतने बुद्धू हैं, कि साधारण कैमरे से भी इसको कैद नहीं कर पा रहे। नहीं-नहीं! आप घबराइए मत। मैं कहीं का जेलर नहीं हूँ। वो तो तस्वीरों को कैद, मेरा मतलब है, कि कैप्चर करने का आदी रहा हूँ। इसीलिए। कैप्चर तो समझते ही होंगे? टेक? हैव? टेक ऑन? कुछ नहीं? अच्छा छोड़िए। घर में सब ठीक है? अच्छा! ठीक होना भी चाहिए। नहीं तो डॉक्टर फलाने-ढिमकाने क्लिनिकों और जाँच-घरों के दरम्यान ही जीवन खपवा दे। नहीं? हा-हा-हा। क्या कहा? मेरा घर? मेरा कोई घर है ही कहाँ? अच्छा, जहाँ बचपन बीता? पर्मानेंटली वो घर छोड़े क़रीब छः से सात महीने हो गये। जबकि उससे मोह छूटे बारह बरस। हाँ! इस दौरान शहर हमने खूब बदले। नहीं, केवल शहर नहीं; पते भी खूब बदले। अजी साहब बदले क्या, जबरिया बदलवाए गये। अब दिल्ली को ही ले लीजिए। क्या नाम था? पूजा। एक ही बेटा था उसका। पति का पता नहीं। छोड़िए ना, क्या कीजिएगा उसके पति के बारे में जानकार। मैंने बिना जाने ही उसके बेटे से प्रेम करने की ज़ुर्रत की थी। अकेलापन रह-रह कर कचोटता था तो उस बच्चे के साथ पार्क वगैरह घूम आता था। उसे पिता की जरूरत महसूस होती थी शायद और मुझे हमेशा की तरह एक अदद साथी की। हम दोनों ने बड़ी मुश्किल से एक-दूसरे को ढूँढा था। पंद्रह-बीस दिन सब ठीक रहे। एक दिन अचानक उसकी माँ बोली-"लोग शक करते हैं संजीव बाबू! आप मत आइए इधर। नहीं-नहीं! आप ही बताइए, मैं कोई गे हूँ? और लोग शक करते ही क्यों हैं? उसकी बेटी से खुसुर-फुसुर तो नहीं कर रहा? साले जाहिलियत से भरे हुए नंगे लोग। सच कहता हूँ साहब; यही वो नीच सोसायटी वाले हैं, जिन्हें ख़ुद के पाजामे में बत्तीस छेद नहीं दिखते। जब कि पड़ोसन के भारी नितम्ब दिख जाते हैं। मैं तो कहता हूँ इन सोसायटी वालों पर बिना बात केस दर्ज करवा देनी चाहिए। नहीं-नहीं, मैं कोई गे हूँ? बताइए भला? हद नहीं हो गयी शक की? और ये महाराष्ट्र के नाँदेड़ को ही ले लीजिए। सरदारनी साहिबा हाईकोर्ट में वकील थीं और विदेशी पीती थीं। औरतें विदेशी नहीं पी सकतीं या वो औरतें हैं, केवल इसीलिए उन्हें पीनी ही नहीं चाहिए? हैं जी? एक औरत से जलन? वो तो उनके घर में रहना मुझे इसलिए भी भला लगता था, क्योंकि आलसपने के बावजूद घर कभी गंदा नहीं रहता था। धूप में सूख रहे कपड़े उठा देती थीं। अकेलेपन का दर्द समझती थीं वो। इसी की मारी भी थीं। यूँ किसी सरदार से इश्क़ हो गयी थी उसे। मने कहती थी तो मैं सुनता था। कम्बख्त छोड़ कर लंदन चला गया। बस तब से पी रही थीं। कभी-कभी मैं छिन लेता बोतल। हद होती है पीने की? अजी साहब, सोसायटी के लोग भड़दारों को ऐसे घूरते थे, मानों निर्भया के न पकड़े जा सके रेपिस्ट हों सभी। नहीं, आप ही बताइए; नीचता की हद क्या होती होगी इन सोसायटी वालों के लिए? मैं तो कहता हूँ इन सोसायटी वालों पर बिना बात केस दर्ज करवा देनी चाहिए। नीच कहीं के। इन्हीं दिनों की ले लीजिए। तीन मकान बदल चुका हूँ। छः महीने में ही। मगर ये सोसायटी वाले कहीं पीछा ही नहीं छोड़ते? ख़ैर, आपके इस पैग के लिए आपका फिर से शुक्रिया। एक आप हैं और एक ये सोसायटी वाले... साले नीच लोग।  

#TheOldDiaries  

सफ़ेद फूल

सफ़ेद फूल शान्ति के प्रतीक माने जाते हैं। शान्ति के दिनों के प्रतीक माने जाते हैं। किन्तु इन सफ़ेद फूलों को सबसे अधिक दुख़द दिनों में ही याद...