मैंने अक़्सर लोगों से सुना है, कि समय सारे ज़ख़्मों की दवा है। सभी घावों का इलाज़ है। उसका भी, जो लाइलाज़ है। लोग ऐसा क्यों कहते हैं, कभी जो सोचा तो पाया- साँसें नहीं टूटा करती। दिल टूट जाते हैं। आस टूट जाती है। उस व्यक्ति से, उस चीज से जिससे हमारा सम्बन्ध जुड़ा होता है। जिससे हमारा लगाव होता है। बात कुछ-कुछ सही भी है। किंकर्तव्यविमूढ़ करने जैसी। मगर मैं नहीं मानता। मैं नहीं मानता, कि साँसें नहीं टूटती या दिल टूट कर कुछ समय बाद वापस ठीक हो जाते हैं। नहीं। ऐसा कदापि नहीं होता। अगर ऐसा होता, तो लोग आत्महत्या जैसी जघन्य कृत्य कभी न करते। आत्महत्या दरअसल तब की जाती है, जब आदमी की साँसें बहुत पहले टूट चुकी हो और वो अपने मृत देह को ढोते-ढोते थक चुका हो।
साँसें नहीं टूटती, महज एक जुमला सरीखा वाक्य है। ज़िन्दगी की पथरीली और विषम परिस्थितियों में इस वाक्य का कोई जमीनी अर्थ नहीं। ना ही सच्चाई से इसका कोई वास्ता है। और समय, समय सभी घावों का इलाज़ नहीं कर पाता। कुछ घाव ता-उम्र हरे रहते हैं। जिसके सिलसिलेवार टीस से लोग टूट जाते हैं। उनकी साँसें बिखर जाती है। किसी रेत की मानिन्द। ज़र्रा-ज़र्रा। फिर रेत की ही तरह ज़िन्दगी की बाकी बची साँसें जीवन में वापस नहीं जुड़ पाती। न पटरी पर ही लौट पाती है। और न ही ज़िन्दगी में सबकुछ पहले जैसा हो पाता है। बल्कि होता ये है, कि समय के साथ-साथ हम ज़िन्दगी से समझौता करना सीख लेते हैं। हालात के अनुरूप ढल कर पुनः जीना सीख लेते हैं। उस पुराने किरदार को कहीं दूर छोड़ कर एक नये किरदार में जीने लगते हैं। जिसका कलेवर और फ्लेवर दोनों नया होता है। लेकिन दुर्भाग्य से, नया कलेवर सबको रास नहीं आता। कुछ टूटकर टूटे ही रह जाते हैं। कुछ आत्महत्या कर लेते हैं। कुछ उसी कलेवर में ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं। और बाकी जो बचते हैं, उसके लिए यह कलेवर कुछ ही समय के लिए कारगर सिद्ध होता है। क्योंकि जैसे ही वो कुछ देर के लिए अकेले पड़ता है; पुराना किरदार उससे सवाल करने लगता है। उससे पूछने लगता है-"तुम वाकई में ठीक हो? या ठीक होने का महज़ ढोंग रचा रहे हो? क्यों कर रहे हो यह दिखावा? लोगों को भरमाये रख सको इसीलिए? बाकी ये तो तुम भी जानते हो, कि तुम्हारी यह नाकाम कोशिश कितनी सफल है? तब उसे लगता है, कि जिस दुख़ को भूलने के लिए वो बरसों से परिश्रम कर रहा है। उसपर पानी फिरता जा रहा है। उसे लगता है, कि खुश रहने के लिए जो तपस्या की जा रही है, उसकी वो तपस्या भंग हो रही है। फिर उस दुख को भूला कर ज़िन्दगी में आगे बढ़ने की उसकी सारी योजनाएँ धरी रह जाती है। तब उसे अहसास होता है, कि उसके भूलने की सारी कोशिशें अब बेकार है। झूठ है। खुद से छलावा, एक धोखा है। क्योंकि भूलाने की तमाम कोशिशों से किसी दुख को भूला पाना सहज़ तो बिलकुल भी नहीं है।
साँसें नहीं टूटती; लोग ऐसा क्यों कहते हैं? सोचने पर पाया, कि साँसें पानी की तरह होती हैं। और पानी कभी नहीं टूटती। टूट भी जाए तो वापस जुड़ जाती है। यह एकदम सच है। मगर पानी नहीं टूटती, सरासर झूठ। क्योंकि टूटना तो छोड़िए, मैंने पानी को अक़्सर चोट खाये आशिक़ की तरह चूर-चूर होते देखा है। आप भी देख सकते हैं। जब बारिश हो, अपनी हथेलियों को खिड़की से बाहर निकाल दीजिए। फिर देखिए; बारिश की नन्हीं बूँदें आपकी हथेलियों से टकरा कर कैसे खील-खील बिखरती हैं।
क्या लगता है? समझदार लोग सबसे एक निश्चित दूरी बनाकर क्यों रखते हैं? बस इन्हीं कारणों से। क्योंकि कोई सच नहीं बोलता। बोलने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाता। वरना कौन है ऐसा, जिसके खाते में दो-चार दुखों की कहानियाँ न हो? पर सब हँस रहे हैं। एक-दूसरे से अपना दुख छिपा रहे हैं। और फिर अचानक... एक दिन आत्महत्या कर ले रहे हैं।
मुखौटों के संसार में झूठ का पुतला हूँ 'जानिब'
आँखों में लहू है बेशक़, मगर होठों पर हँसी है।

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