रविवार, 21 जून 2020

इस शहर से इक़ शिक़ायत है मुझको, कि तिरे चेहरे से चेहरे हैं हर ओर।


कॉलेज पहूँचते ही उसने शुरुआत की थी मुहब्बत की। बड़े जोरों-शोरों से। इतना, कि पूरे कॉलेज में उन दोनों का प्रेम फुरक़तिया चर्चा का विषय था। जूनियर्स मुहब्बत की मिसालें देते तो लैला-मज़नूँ के साथ उन दोनों के प्रेम और तिश्नगी को भी तवज्जो देते। वे कहते-"प्यार हो तो ऐसे हो। वरना ना हो।" 
मगर ख़याल के नाम पर वो कब अपनी पसंद उस पर थोपने लगी; उसे पता ही न चला। लड़के को कब कौन-सी शर्ट या टी-शर्ट पहननी है; कौन से रंग की पहननी है; यहाँ तक कि उसने मैचिंग़ कलर की जुराबें पहनी है या नहीं; इस बात का भी ख़याल वो रखने लगी। लड़के ने एक-दो बार समझाने की कोशिश की। कहा-"यार, मैं कैजुअल नहीं हूँ। परंतु लड़की ने प्रेम का हवाला देकर उसकी बातें अनसुनी कर दी। लड़का प्रेम समझ कर सबकुछ सहता गया। सहता ही गया। 
लेकिन हर अति का अंत होता है। जब मुहब्बत पकने लगती है। धीरे-धीरे उसे यह सब जबरदस्ती लादे गये एक बोझ की तरह लगने लगा। फिर भी उसकी हिम्मत नही हुई, कि वो लड़की को खुल कर बोल सके। बोल सके, कि- "यार मेरी ज़िन्दगी है, तो मैं क्या पहनूँ, क्या नहीं; यह पसंद भी मेरी होनी चाहिए। क्या मुहब्बत का मतलब यही होता है, कि मैं दुनिया तुम्हारी नज़रों से देखूँ? अगर यही मुहब्बत है तो भाड़ में जाए। मुझे नहीं करनी मुहब्बत। लेकिन उसने ऐसा नहीं कहा। वो डरता था, कि लड़की इस बात से नाराज़ होकर उससे किनारा ना कर ले। उससे रिश्ते न तोड़ ले। 
लड़के में प्रेम की बहती नदी दिनोंदिन सूखती जा रही थी। इस बात से पूरी तरह अंजान लड़की जब भी उसके सामने आती, उसका उदास चेहरा जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश करता। फिर दोनों साथ बैठते और अपने भविष्य के सपने बुनते। भविष्य अपनी मुट्ठी में क्या छिपाये बैठा है, इससे अनभिज्ञ दोनों भविष्य के घोंसले में अपनी गंध तलाशते कॉलेज़ के अंतिम दिनों तक आ पहूँचे थे। 
विदाई की बेला में स्वर्ग की अप्सरा जैसी सजी-धजी लड़की की आँख़ें लड़के को पूरे कॉलेज़ परिसर में  तलाश रही थी। लड़का शायद अंतिम दिन कॉलेज आया ही नहीं था। वो उसे उसके दोस्तों के ग्रुप में तलाशती बेचैन इधर-उधर भाग रही थी। क्योंकि पीठ उसकी ओर किये हर लड़का उसे वही नजर आता था। पर सामने जाने पर वह न होता था। दूसरी ओर उसकी सख़ियाँ उसे अंतिम विदाई दे रही थीं। लेकिन हताश-निराश उसका मन कहीं और रम ही नहीं रहा था। लिहाज़ा वो कॉलेज से अपने कमरे में लौट आयीं और तकिये में मुँह छिपाये रोती रही। बस रोती ही रही। शहर छोड़ने से पहले उसने तय किया, कि वह उसके हॉस्टल में जाकर पता करेगी। पता करेगी, कि वह विदा कहने कॉलेज क्यों नहीं आया। 
दूसरे दिन जब वह लड़के के हॉस्टल पहूँची तो उसे पता चला, कि लड़का विदाई से एक दिन पहले ही शहर छोड़ चुका था। बिना किसी को बताये। यह सुनकर उसका दिल बैठ गया। रुआँसी होकर वह अपने रूम पहूँची और शहर छोड़ने से पहले कमरे की चाबी मकान मालकिन को सौंपती उसके गले से लिपटकर रो पड़ी। उसकी बिख़री हुई मुहब्बत से अंजान मकान मालकिन सोच रही थी, कि लड़की को कमरे से मोह हो आया है। शहर से मोह हो आया है। इसीलिए वह रो रही है। लिहाजा उन्होंने सांत्वना भरे शब्दों के साथ कहा-"दिल छोटा मत करो बेटी! एक न एक दिन शहर तुम्हें विदा करता ही। क्यूँकि शहर को तुमने अपनाया ही इतने दिनों के लिए था। जाओ! खुशी-खुशी अपनी नयी ज़िन्दगी की शुरुआत करो। 
वह सिसकते हुए मन-ही-मन सोच रही थी, कि आंटी सच कह रही है। मैंने ‘शहर' को अपनाया ही इतने दिनों के लिए था। मकान मालकिन के लिए शहर महज़ शहर था। लेकिन लड़की के लिए शहर का मतलब ही नहीं बल्कि शहर के मायने भी बदल गये थे। उसके लिए शहर अब वो लड़का था। ओस की बूँदों की तरह गुम चुका उसका प्रेम ही अब शहर था। शहर या कि 'सहर।'  
वह अपने घर लौट तो आयी लेकिन उसका मन वहीं-कहीं, उसी शहर में छूट गया। थोड़ा-थोड़ा बंटकर। कुछ हिस्सा कॉलेज के दोस्तों के पास रहा। कुछ शहर वाले कमरे के पास। और बाकी जो बचा; वो उस लड़के को दे आयी। आज जब वह उस शहर में जाती है तो चारों तरफ़ उस लड़के को तलाशती उसकी नज़रें एक आह भरकर कहती है-
इस शहर से इक़ शिक़ायत है मुझको
कि तिरे चेहरे से चेहरे हैं हर ओर।

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