रविवार, 31 मई 2020

बेगाने किसी महफ़िल में मैं नहीं होता तन्हा तुम नहीं होते भीड़ मैं नहीं होता.


वो, जो कभी तुमसे सतही मुहब्बत करती थी। आज तुम्हारे फोन करने पर शब्दों से खाली हो जाती है। वो जो एक दिन बात ना हो पाए तो बेचैनी से घुट कर मर जाए मानो, पर आज महीनों बात ना हो, तो भी उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वो जो तुम्हारे "कुछ नया सुनाओ" पर सैकड़ों मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़ कर तुम्हें सुनाती थी। आज तुम्हारे "और बताओ" मात्र कहने पर शून्य हो कर "बस! कट रही है।" कहती है। तुम्हें याद नहीं होगा, कि जब तुम उससे मिलते थे तो उसकी बक-बक सुुुुनतेे-सुनते कब बीच में ही सो जाते थे। यह तुम्हें भी पता न चलता था। फिर भी वो बक-बक करती रहती थी। लगातार। याद है? पता नहीं तुम्हें याद हो के ना हो; पर वो सिर्फ इसलिए ऐसा करती थी, कि कहीं बात ख़त्म ना हो जाए और तुम "चलो! अब वापस चलते हैं।" न कह दो। परन्तु जब तुम उसकी गोद में लुढ़क जाते, तब उसका ध्यान जाता तुम पर। फिर भी खीझ या गुस्सा नहीं करती। बल्कि प्यार से तुम्हारे बालों में हाथ फिरा कर कहती-'मैं भी ना; बस पकाने बैठ जाती हूँ। बिना रूचि जाने। फिर तुम्हें देखकर मुस्कुराती और बुदबुदाती-'बेचारा बोर हो रहा था। बोला भी नहीं। पर आज वो बक-बक तुम्हें सुनने को नहीं मिलती। तुम्हारी इच्छा होने के बावजूद। वो अलग बात है कि अब तुम वो बक-बक सुनने के लिए तरस रहे हो। याद है, जब वो कहती-"थोड़ी देर और बात करें?" और तुम कहते-"यार! अब सोते हैं। बहुत रात हो गयी है। सुबह उठना भी है। चलो; फोन रख रहा हूँ मैं।" और वो रिक्वेस्ट करके कहती-"अच्छा-अच्छा! अधिक नहीं, बस दस मिनट। पर तुम उस रिक्वेस्ट को भी ठुकरा देते। कह कर, कि-"यार! अब बस। बहुत हो गया। और उसके मुँह से स्वतः "अच्छा सॉरी; अब गुस्सा मत करो।" निकल जाता। उसकी गलती हो चाहे न हो। वो माफ़ी जरूर मांगती। क्योंकि तुम नाराज़ न हो जाओ। तुम उसकी ज़िन्दगी के एकमात्र सितारे थे। जिसे वो खोने से डरती थी। जो तुम मिलते, तो उस पल को ख़ास बनाने में कोई कसर न छोड़ती थी वो। वरना कौन अपने प्रेमी के लिए लाफिंग बुद्धा और टाइटन की घड़ी खरीदती है? तुम्हारे पसन्द की उपन्यास वो लेख़क से हस्ताक्षर करवा के तुम्हें भेंट करती थी। याद है? कभी-कभी उसे लेख़क की घुडकियाँ भी सुनने को मिलतीं; पर वो सबकुछ नज़रअंदाज कर जाती थी। क्योंकि तुम उसके साथ थे। भला और क्या चाहिए था उसे? तुम्हारे लिए वो सबकुछ बर्दाश्त करने को, सहने को तैयार थी। हर रिस्क उठाने को तैयार थी। ऐसा; कि तुम कहो तो हिहियाती गंगा में धौंस मार दे। दस मंजिला इमारत से छलांग लगा दे। यहाँ तक कि तुम कहो तो जहर भी पी ले। तरसती थी, कि तुमसे किसी भी बहाने मिले। मिलने के बाद फिर कभी न बिछड़े। बिछड़ती, तो तड़प उसकी आँखों से बाँध तोड़ कर बह निकलते। पर जाहिर वो फिर भी न होने देती थी। 
आज तुम तड़प कर कहते हो, कि मिलोगी इस बार? और वो मना करके कहती है-"नहीं! समय नहीं है।" समय। हा हा! एक समय यही समय उसके पास खूब सारा था। पर अब नहीं है। क्यों? क्योंकि उसके घर में अब ढेर सारा काम होता है। थोड़ा बहुत समय बचता भी है, तो वह उसे अपने ऑफिस में बेच आती है। 
याद है? जब तुम उसे खीझकर कहते थे-"कितनी बार बोलूँ, कि हमारा कोई भविष्य नहीं? फिर भी तुम मुझसे दूर होने की कोशिश क्यों नहीं करती? तुम्हें पता है ना? मैं मरने वाला हूँ? क्यों नहीं समझती तुम? क्यों हर बार एक टॉपिक निकाल कर बैठ जाती हो? मुझे लगता है, कि अब हमें बात करना बंद कर देना चाहिए।" और वो हमेशा कि तरह माफी मांग कर कहती-"अच्छा! सॉरी। नहीं उठाऊँगी कोई टॉपिक। नहीं बंधाऊँगी हौसला। खुश? पर जब तक साथ हैं, अच्छे से रहते हैं। ओके?" पर आज भी वो तुमसे इरिटेट नहीं हुई। हाँ दूर हो गयी। तुम्हारे अथक प्रयासों के बाद ही सही। और उसके दूर होते ही आज तुम्हे दिक्कत होने लगी है? क्यों? अरे यही तो चाहते भी थे ना तुम? पर अब क्या हो गया अचानक? वो तो मिन्नतें करती थी ना? कि दूर नहीं हो पाएगी तुमसे? और तुम उसे दुनियादारी की रीति समझाते थे? अब, कि जब वो अपनी दुनियादारी में रम गयी है तो तुम्हारे पेट में मरोड़ उठ रही है? इतना, कि अफसोस मना रहे हो? क्यों? मैं पूछता हूँ आख़िर क्यों? कोई ठीक नहीं है, कि आज तुम इस हालत में उसके चरित्र के ऊपर भी ऊँगली उठा दो। क्योंकि सबसे आसान यही है। और अपने दिल तक ठण्डक पहुँचाने का सबसे आसान तरीका भी। बड़े महान बने फिरते थे ना? बाबू; महान बनना आसान है। पर बने रहना मुश्किल। तुमने उसे तो दुनियादारी समझा दी, पर अफ़सोस; ख़ुद उसी दुनियादारी में उलझे रह गये। वो अप्सरा; जिसकी चाहत ही थी किसी से टूट कर मुहब्बत करने की। आज उसके भीतर मुहब्बत का एक कतरा तक नहीं है। क्यों? क्योंकि उसकी मुहब्बत को तुमने अपने उसूलों तले रौंद डाला। बड़ी ही बेरहमी से। छीः! तुम पर तरस भी नहीं आता यार। 
उसमें अल्हड़पना था। मासूमियत थी। बेहद खुशमिज़ाज थी वो। ख़ुद की हँसी से मौसम को हँसा देने वाली। उसकी हँसी का हत्यारा कौन है जानते हो? तुम। तुमने उसकी हँसी का गला घोंट दिया। वो हँसी; जो अभी दूधमुँहा ही था। 
पता है, उसके ऑफिस के लोग क्या कहते हैं? कहते हैं-"आज मैम को फ़ाइल देने गया। पर पता नहीं था, कि मैम इतनी अच्छी स्माईल भी करती हैं।" फिर एक हँसी गूँजती है। जरा अश्लील हँसी। उसे दुनियादारी सिखाते थे ना? अब खुश हो जाओ। वो सीख गयी है दुनियादारी। वो, जो बोलना शुरू करे तो चुप ना हो। जिसकी आँखें उसके शब्दों से लय मिलाती हों। वो अब सिर्फ काम की बातें करती है। कोई बक-बक करे तो उठकर चल देती है। वहाँ, जहाँ थोड़ी खामोशी हो। कहाँ गए उसके सारे शब्द? उसके लब्बोलुआब? सहज़ अंदाज़? जो शांत रहती थी हमेशा। आज घमण्डी कैसे बन गयी? तुम्हारे ऊपर जान छिड़कने वाली वो लड़की आज तुम्हारे मोह से इतनी दूर कैसे हो गयी?  

इश्क में डूबी, मुहब्बत से भरी हुई लड़की।
मुस्कानों के अलंकारों से जड़ी हुई लड़की। 
भीतर से खाली और खोखली कैसे हो गयी 
जर्रे-जर्रे से तुम्हारे प्रेम में पड़ी हुई लड़की?

पता है; तुम जीत चुके हो। तुमने उसके भीतर से वो सब ख़त्म करने की ठानी थी; जिससे उसका वजूद था। खुश रहो। जो तुमसे प्यार करती थी; वो कभी किसी और की नहीं होगी। हो ही नहीं सकती। क्योंकि वो वहीं ख़त्म हो गयी थी। जहाँ तुमने उसे खत्म करने की ठानी थी। ये तो कोई और है। जो बस जी रही है। मुबारक हो। तुम्हारी कामयाबी पर। तुम जीत गये। तुमने उसे मार दिया यार।

महबूबा मुंबई।


कहते हैं; दिल्ली अगर दिलरुबा है, तो मुंबई महबूबा। और शायद यही वजह है, कि मुझे महबूबा मुंबई से बेहद प्रेम है। इसके खुलेपन से मैं बेइंतहाँ जुड़ाव महसूस करता हूँ। जब भी मुझे इस शहर की याद आती है; मैं अपने दोस्तों से फोन पर शहर के बारिशों की आवाजें सुनाने को कहता हूँ। बारिशों के दौर में समंदर की लहरें जब मचलती हैं, तो वे कहते हैं-“देखो! समंदर की लहरें बुला रही हैं। तुम्हें गले लगाने को उमड़ रही हैं। देखो। क्या तुम समंदर को घुमड़ते हुए देख पा रहे हो? और मैं अंतर्मन में सोचने लगता हूँ- हाँ! मैं देख पा रहा हूँ। देख पा रहा हूँ, कि लहरें मुझे बुला रही हैं। सचमुच। जानते हो क्यों? क्योंकि वो जानती हैं, कि मैं उनसे कितना अधिक प्रेम करता हूँ। इतना, कि लहरों में डूबकर मैं लहरें हो जाना चाहता हूँ। 

और जब बातें मुंबई की हो रही हों, तो केवल वहाँ की बारिशें ही नहीं; वरन् जुहू बिच, चौपाटी, एलीफेन्टा केव्स, सी-लिंक और नरीमन पॉइंट में जा बैठे मन को तृप्त करते दृश्यों के क्या ही कहने। अहा! अतुलनीय नजारा होता है। और जब इनके बारे में सोचो, तो सारे दृश्य जैसे आँख़ों के आगे घुमने लगते हैं।

जागती आँख़ें भी जहाँ देखती हैं सपने 
उस अलमस्त 'शहर' को मुंबई कहते हैं।' 

अगर भूख लग आयी हो, तो मशहूर ‘खाऊ गल्ली' है ना। भीड़ू! बोले तो येईच्च है खाऊ गल्ली। इधर कुच्छ भी खाने का। शेक-वेक पीने का। टेंशन नै लेने का। 

परहैप्स! कि खाने के मामले में मुंबई, दिल्ली से कहीं सस्ती पड़ती है। यहाँ आप थोड़े से पैसों में बड़ापाव खाकर पेट भर सकते हैं। शायद इसलिए इधर एक कहावत मशहूर है- ऊपर वाला भूखा जगाता जरुर है। मगर भूखा सुलाता नहीं। 

मुझे मुंबई की गगनचुंबी अट्टालिकाएँ बेहद लुभाती हैं। हमेशा से आकर्षित भी करती रही हैं। छलाँग लगाने के लिए। लेकिन फिर सोचता हूँ; कूद जाऊँगा तो क्या होगी मेरी दैहिक-दशा? मैं खील-खील होकर बिखर जाऊँगा या जमीन को चीरता हुआ सीधा धरती के भीतर समा जाऊँगा? क्या उसके बाद लोगों की कोई प्रतिक्रिया भी होगी? या किसी अखबार के एक छोटे से कोने में महज़ एक खबर मात्र बन कर रह जाऊँगा? जिसके हेडलाईन को पढ़कर लोग च्च.. च्च..च्च.. करते हुए अपनी नजरें किसी और खबर पर स्क्रॉल कर लेंगे। शायद यही होगा। शायद नहीं; पक्का। पक्का यही होगा। क्योंकि जहाँ लोगों के पास ठीक से मरने तक का समय न हो, वहाँ किसी 'लाश' की खबर पर कौन समय बर्बाद करे? 

अल्हड़पने से लबरेज़ मुंबई पूरी तरह से रहष्यमयी शहर है। यहाँ प्रेम ही प्रेम है। रोमांस ही रोमांस है। एक हाथ को दूसरे हाथ तक की ख़बर नहीं। सब इतने ही व्यस्त। किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। कोई लेना-देना नहीं। सब गाते हुए, मुस्कुराते हुए चले जा रहे हैं। दौड़े जा रहे हैं। मानों किसी और दुनिया में विचर रहे हों। मानों किसी रहस्यमयी दुनिया में खोये हुए हों। 

जब बारिशों का दौर हो, तो मुंबई बला की ख़ूबसूरत हो जाती है। ऐसे में मन गरमा-गरम भुट्टों का आनन्द लेने नरीमन पॉइंट जा पहुँचता है। नीचे उफनती समंदर की लहरें; ऊपर खुला आकाश। तिसपर समंदर बारिश की बूँदों को यूँ गले से लगातीं हैं; मानों दोनों में बरसों से गहरा प्रेम हो। दोनों में एक चुंबकीय आकर्षण, एक आत्मीय लगाव हो। 

इस ख़ूबसूरती को देखकर जब रहा नहीं जाता, तो मन एक बोट लेकर समंदर की गहरायी में उतर पड़ता है; और नन्ही बूँदों के संग भीगते हुए बीच स्वर्ग में जा पहुँचता है। अहा! अद्भुत! मनोरम। यूँ लगता है, मानों स्वर्ग की भ्रमित कल्पनाएँ एकाएक सच हो उठी हों। जिसके एक ओर समंदर की गोद में भीगती हुई इमारतें, इठलातीं हुई, झूमती हुई अठखेलियां करती हैं। तो दूसरी ओर अथाह सागर का मायाजाल फैला हुआ है। अनन्त तक। क्षितिज को चूमती हुईं। और जब बारिशें एकाएक थम जाती हैं; तो मुंबई नगर किसी कमसिन हिरोइन की तरह कशिशें बिखेरती उच्छृंखल हो उठती हैं। उद्वेलित हो उठती है। जिसका भरपूर साथ देती हैं समंदर में नहा कर नमकीन हो चुकी बहकी-बहकी हवाएँ। 

तुम कहती हो न, 
कि तुम्हारा शहर सबसे अलहदा सबसे जुदा शहर है? 
सुनो; यदि सम्भव हो, तो इक शाम मेरे नाम कर दो ना?

#MumbaiDiaries  #CityShots #TheBlackMagic #TheCityOfLove #TheCityOfRomance

शनिवार, 30 मई 2020

अण्डे का फण्डा


आइए, हम भारतीय राजनीति को आमलेट विधि द्वारा समझने की भूरी-भूरी चेष्टा करते हैं।

----------

एक सफेद अण्डा लीजिए।

आप कहेंगे; अमाँ क्या मजाक है, अण्डे तो सभी सफेद होते हैं। नहीं बरखुरदार, अथवा मोहतरमा। फलाने पक्षी के अण्डे लाल तथा ढिमकाने पक्षी के अण्डे पीले होते हैं। और तो और कुछ कीट-पतंगों के अण्डे तो काले भी होते हैं। जैसे मैना; नीले रंग का अण्डा देती है। जमीन में दिये गये अण्डों का रंग भूरा होता है। शाख-ए-खास पर दी जाने वाली अण्डों की रंगत चटख-हरी होती है। एवम कोटर अथवा खोह में दिये जाने वाले अण्डे सफेद होते हैं। ताकि अंधेरे में भी उस अण्डे की स्वामिनी उसका सही-सही अन्दाजा लगा सकें, और गलती से वह टूट ना जाए।

आप वो सब छोड़िये। अण्डे का फण्डा फिर कभी समझाऊँगा। फिलहाल आप आमलेट विधि द्वारा राजनीति समझ लीजिए। हाँ! तो कोई कुछ भी कहे; आपको अपना ध्यान नही भटकाना है। मने मुर्गी का अण्डा लेना है। या जो अण्डा आप खाते हैं; उसी को ले लीजिए। पता नहीं आप कौन-सा अण्डा खाते हैं। खैर। हमें क्या, आप कुछ भी खाइए।

चलिए, अब आगे बढ़ते हैं। नहीं-नहीं! कदम मत बढ़ाइए। आप किसी हॉलीडे पर घूमने-फिरने नहीं आये हैं। कि आगे बढ़ते हैं सुनकर फौरन सावधान हो कदम आगे बढ़ाने लगे। आप यहाँ आमलेट विधि द्वारा भारतीय राजनीति समझने आये हैं। समझे? पता नहीं, समझे भी या नहीं समझे। अगर नहीं भी समझे, तो मेरी बला से। मैं एक ही बात को सौ दफे समझा कर आपके खातिर उसी जगह अटका हुआ नहीं रह सकता। हमें और भी सौ काम हैं। हम आपकी तरह वेल्ले नहीं हैं। जो अंट-शंट समझने को भी लालायित रहें।

हाँ! तो अब उस अण्डे को तवे पर रख दीजिए। आं-आं; अण्डे को तोड़िएगा मत। बिलकुल मत तोड़िएगा। राजनीति में अण्डे को तोड़ना न सिर्फ सख़्त रुप से मना है; बल्कि राजनीतिज्ञों के विचार से गैरकानूनी भी है।

हाँ तो चलिए; आगे बढ़ते हैं। अमाँ मियाँ; तुम बार-बार आगे बढ़ते हैं, सुनकर फौरन उठा मत करो। हम बार-बार तुमको पकड़ कर बिठा नहीं सकते। हमारे घुटनों में दर्द रहता है, समझा करो। आगे बढ़ने से मेरा मतलब अण्डे को तवे पर रखने से था। कमज़र्फ़ इंसान। रख दिये? हाँ! दैट्स गुड। भेरी गुड।

अब तवे को एलपीजी चूल्हे पर रखिए। वैसे लकड़ी के चूल्हे पर भी रख सकते हैं। या कोयले के चूल्हे पर भी। मने सीधे शब्दों में चूल्हा होना चाहिए। जिसमें आग लगायी जा सके। वो आग नहीं। जो कुछेक नेता-गण हिन्दू-मुस्लिम-दलित-इसाई कहकर लगाते हैं। उसे राजनैतिक आग कहते हैं। जिसमें राजनीति की खिचड़ी पकती है। आपको वो वाली आग नहीं लगानी। ईंधन वाली आग लगानी है।

तवे को चूल्हे पर रख दिये.? गुड... अगेन भेरी गुड। चलिए; अब चूल्हे के ईंधन को जलाइए। ध्यान रहे, चूल्हे को नहीं जलाना, चूल्हे के ईंधन को जलाना है।

अब दस मिनट तवे को यूँ ही छोड़ दीजिए। तब तक या तो फ़ेसबुक चला लीजिए या कोई खेल जो आप मोबाइल आदि में खेलते होंगे; वो खेल लीजिए। चाहें तो फ़ेसबुक में स्टेटस भी अपडेट किया जा सकता है। जी हाँ! अण्डों को पकाने की खुशी में खुद को फ़ेसबुकिया मास्टर सेफ घोषित कर सकते हैं। भले आपको चीनी और नमक में पहचान करनी न आती हो। फिर भी कम से कम बीस-पचास अंगूठे तो बटोर ही लेंगे। वो क्या है ना; फ़ेसबुक में मरी हुई आत्माएँ भटकती हैं; जिन्हें धरातल की बुनियादी सच्चाई से कोई मतलब नहीं होता। वो तो इस बात पर भी माँ-बहनों की गालियाँ बकते हुए कुकुरझामर करने लगते हैं, कि उनके पसन्द के नेता को ढिमकाने ने अनपढ़ कैसे कहा। वो गालियाँ देते हुए कहेंगे- तू अनपढ़। तेरा बाप अनपढ़। तेरा पूरा खानदान अनपढ़। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से डिग्री ले आया तो तू पढ़ा-लिखा हो गया क्या रे #$%&? और मेरे वाले ने लोकल डिग्री भी नहीं ली, तो वह अनपढ़ हो गया? कमाल की लॉजिक देते हो बे? साले देशद्रोही? अगर देश से इतनी नफ़रत है, तो छोड़ क्यों नहीं देते देश? चाहो तो;

सीरिया चले जाओ, इराक चले जाओ।

सऊदी चले जाओ, या पाक चले जाओ।

भक्क। क्या हम भी अंधों की कथा सुनाने लगे। जरा आप घड़ी देखिए, हो गए दस मिनट?

हाँ, तो अब अण्डे को ध्यान से देखिए। आपका अण्डा (आपके अण्डे से मेरा तात्पर्य उस मुर्गी के अण्डे से है। यहाँ खुद को मुर्गी समझने की भूल न कीजिएगा।) एक तरफ से गरम हो चुका होगा। हो गया है? हाँ तो बरखुरदार! लीजिए। आपका गरमा-गरम राजनैतिक आमलेट तैयार हो चुका है। इसे ही राजनीति कहते हैं।

कैसे? क्यों भाई? समझ नही आयी पूरी प्रक्रिया? इतने अच्छे से तो समझाया?

अमाँ यार, जब इतनी सरल प्रक्रिया समझ नही आयी, तो भारतीय राजनीति क्या घण्टा समझ आयेगी?

~संजीव

सफ़ेद फूल

सफ़ेद फूल शान्ति के प्रतीक माने जाते हैं। शान्ति के दिनों के प्रतीक माने जाते हैं। किन्तु इन सफ़ेद फूलों को सबसे अधिक दुख़द दिनों में ही याद...