आइए, हम भारतीय राजनीति को आमलेट विधि द्वारा समझने की भूरी-भूरी चेष्टा करते हैं।
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एक सफेद अण्डा लीजिए।
आप कहेंगे; अमाँ क्या मजाक
है, अण्डे तो सभी सफेद होते हैं। नहीं बरखुरदार, अथवा मोहतरमा। फलाने पक्षी के
अण्डे लाल तथा ढिमकाने पक्षी के अण्डे पीले होते हैं। और तो और कुछ कीट-पतंगों के
अण्डे तो काले भी होते हैं। जैसे मैना; नीले रंग का अण्डा देती है। जमीन में दिये
गये अण्डों का रंग भूरा होता है। शाख-ए-खास पर दी जाने वाली अण्डों की रंगत
चटख-हरी होती है। एवम कोटर अथवा खोह में दिये जाने वाले अण्डे सफेद होते हैं। ताकि
अंधेरे में भी उस अण्डे की स्वामिनी उसका सही-सही अन्दाजा लगा सकें, और गलती से वह
टूट ना जाए।
आप वो सब छोड़िये। अण्डे
का फण्डा फिर कभी समझाऊँगा। फिलहाल आप आमलेट विधि द्वारा राजनीति समझ लीजिए। हाँ!
तो कोई कुछ भी कहे; आपको अपना ध्यान नही भटकाना है। मने मुर्गी का अण्डा लेना है।
या जो अण्डा आप खाते हैं; उसी को ले लीजिए। पता नहीं आप कौन-सा अण्डा खाते हैं। खैर।
हमें क्या, आप कुछ भी खाइए।
चलिए, अब आगे बढ़ते हैं।
नहीं-नहीं! कदम मत बढ़ाइए। आप किसी हॉलीडे पर घूमने-फिरने नहीं आये हैं। कि आगे
बढ़ते हैं सुनकर फौरन सावधान हो कदम आगे बढ़ाने लगे। आप यहाँ आमलेट विधि द्वारा
भारतीय राजनीति समझने आये हैं। समझे? पता नहीं, समझे भी या नहीं समझे। अगर नहीं भी
समझे, तो मेरी बला से। मैं एक ही बात को सौ दफे समझा कर आपके खातिर उसी जगह अटका
हुआ नहीं रह सकता। हमें और भी सौ काम हैं। हम आपकी तरह वेल्ले नहीं हैं। जो
अंट-शंट समझने को भी लालायित रहें।
हाँ! तो अब उस अण्डे को तवे पर रख दीजिए। आं-आं; अण्डे को तोड़िएगा मत। बिलकुल मत तोड़िएगा। राजनीति में अण्डे को तोड़ना न सिर्फ सख़्त रुप से मना है; बल्कि राजनीतिज्ञों के विचार से गैरकानूनी भी है।
हाँ तो चलिए; आगे बढ़ते हैं। अमाँ मियाँ; तुम बार-बार आगे बढ़ते हैं, सुनकर फौरन उठा मत करो। हम बार-बार तुमको पकड़ कर बिठा नहीं सकते। हमारे घुटनों में दर्द रहता है, समझा करो। आगे बढ़ने से मेरा मतलब अण्डे को तवे पर रखने से था। कमज़र्फ़ इंसान। रख दिये? हाँ! दैट्स गुड। भेरी गुड।
अब तवे को एलपीजी चूल्हे पर रखिए। वैसे लकड़ी के चूल्हे पर भी रख सकते हैं। या कोयले के चूल्हे पर भी। मने सीधे शब्दों में चूल्हा होना चाहिए। जिसमें आग लगायी जा सके। वो आग नहीं। जो कुछेक नेता-गण हिन्दू-मुस्लिम-दलित-इसाई कहकर लगाते हैं। उसे राजनैतिक आग कहते हैं। जिसमें राजनीति की खिचड़ी पकती है। आपको वो वाली आग नहीं लगानी। ईंधन वाली आग लगानी है।
तवे को चूल्हे पर रख दिये.? गुड... अगेन भेरी गुड। चलिए; अब चूल्हे के ईंधन को जलाइए। ध्यान रहे, चूल्हे को नहीं जलाना, चूल्हे के ईंधन को जलाना है।
अब दस मिनट तवे को यूँ ही छोड़ दीजिए। तब तक या तो फ़ेसबुक चला लीजिए या कोई खेल जो आप मोबाइल आदि में खेलते होंगे; वो खेल लीजिए। चाहें तो फ़ेसबुक में स्टेटस भी अपडेट किया जा सकता है। जी हाँ! अण्डों को पकाने की खुशी में खुद को फ़ेसबुकिया मास्टर सेफ घोषित कर सकते हैं। भले आपको चीनी और नमक में पहचान करनी न आती हो। फिर भी कम से कम बीस-पचास अंगूठे तो बटोर ही लेंगे। वो क्या है ना; फ़ेसबुक में मरी हुई आत्माएँ भटकती हैं; जिन्हें धरातल की बुनियादी सच्चाई से कोई मतलब नहीं होता। वो तो इस बात पर भी माँ-बहनों की गालियाँ बकते हुए कुकुरझामर करने लगते हैं, कि उनके पसन्द के नेता को ढिमकाने ने अनपढ़ कैसे कहा। वो गालियाँ देते हुए कहेंगे- तू अनपढ़। तेरा बाप अनपढ़। तेरा पूरा खानदान अनपढ़। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से डिग्री ले आया तो तू पढ़ा-लिखा हो गया क्या रे #$%&? और मेरे वाले ने लोकल डिग्री भी नहीं ली, तो वह अनपढ़ हो गया? कमाल की लॉजिक देते हो बे? साले देशद्रोही? अगर देश से इतनी नफ़रत है, तो छोड़ क्यों नहीं देते देश? चाहो तो;
सीरिया चले जाओ, इराक चले
जाओ।
सऊदी चले जाओ, या पाक चले जाओ।
भक्क। क्या हम भी अंधों की
कथा सुनाने लगे। जरा आप घड़ी देखिए, हो गए दस मिनट?
हाँ, तो अब अण्डे को ध्यान से देखिए। आपका अण्डा (आपके अण्डे से मेरा तात्पर्य उस मुर्गी के अण्डे से है। यहाँ खुद को मुर्गी समझने की भूल न कीजिएगा।) एक तरफ से गरम हो चुका होगा। हो गया है? हाँ तो बरखुरदार! लीजिए। आपका गरमा-गरम राजनैतिक आमलेट तैयार हो चुका है। इसे ही राजनीति कहते हैं।
कैसे? क्यों भाई? समझ नही आयी पूरी प्रक्रिया? इतने अच्छे से तो समझाया?
अमाँ यार, जब इतनी सरल प्रक्रिया समझ नही आयी, तो भारतीय राजनीति क्या घण्टा समझ आयेगी?
~संजीव

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