हुआ क्या है, मालूम नहीं। बुख़ार, जुकाम, बेहोशी रह-रहकर आती है। यादाश्त भी छीन होती जा रही है। चंद दिनों पहले एक डॉक्टर ने मियाँदी बुख़ार होने की बात कही थी। दवा खा कर भी बुख़ार नहीं गया तो एक एमबीबीएस फ्रेंड से बात करनी पड़ी। उसने अपने पैथालॉजी में जाँच की तो नतीजा कुछ भी नहीं निकला। बाद में पता चला, कि पहले वाले डॉक्टर साहब पैथालॉजी से मिले हुए थे। माने उनकी अपनी ही पैथालॉजी थी। ऐसा नहीं है, कि मुझे कभी मियाँदी की शिकायत नहीं रही। पर जब भी यह बुख़ार आया, सोलह इंजेक्शन के बाद ही गया। इन्हीं सब के बीच आज सुबह थोड़ी उल्टियाँ हुई। मन में डर था, कि खून न निकल जाए। तीन महीने पहले ही तो खून बहा था। मुँह से। ऐसे ही। तुरंत मुम्बई भागना पड़ा था। टेस्ट के बाद जब रिपोर्ट निगेटिव निकली तो जान में जान आयी। तभी लॉकडाउन नहीं हुआ था। आने-जाने के सारे रास्ते खुले हुए थे। फ्लाइट्स की सुविधा थी। पर अब ये सारी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। जा तो सकता हूँ, पर डर लगता है, कि कोरोना ना लेता आऊँ। मुम्बई में रहने वाली एक माँ कहती है, मुम्बई मत आ। यहाँ की हालत बहुत खराब है। व्हाटस्अप से दवा मंगवा ले। लेकिन डॉक्टर साहब ने साफ कहा है, कि फिर से जाँच करनी होगी। और इसके लिए आप का आना जरूरी है। इसी सोच-विचार के कारण मानसिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है। फिर कुछ लोग हैं जो केवल दुख ही देना जानते हैं। इस बारे में डॉक्टर से कहता हूँ तो वे कहते हैं, संजीव! कुछ दिन लिखने-पढ़ने और मोबाइल फोन से दूरी बना लो। अब उन्हें कैसे कहूँ, कि दुख देने वाले बिना मोबाइल फोन के भी दुख देते हैं। फोन ना उठाओ तो सामने आ जाते हैं। झूठ-फूस का कहते हैं, कि मैं ठीक हूँ। ख़ुश हूँ। जबकि मेरी छठी इंद्रियाँ कहती हैं, भले ही ये झूठ बोल रही है पर तुम हँसना मत। हँसने से उसे दुख होगा। लगेगा, सच्चाई जानते हुए भी पूछता है। ढोंगी। परन्तु मुझे मालूम है, मैं क्यों नहीं कहता सच्चाई। क्योंकि उसके बाद की स्थिति संभालने लायक कूवत नहीं बची मेरे पास। अकेले में हँसता हूँ, ताकि बाद में हँसने का अफसोस ना रहे। कि जिस जीवन में सबसे ज्यादा कमीं हँसी की ही रही हो, कि उस जीवन में किसी के झूठ पर हँसना बनता भी नहीं है। कि जिस जीवन के पहले ढाई साल में ही माँ का साथ छूट जाए, कि उस जीवन में सुख़ का होना बनता भी नहीं है। खुशकिस्मत हैं वे लोग, कि जिनके जीवन में माँ की ममता लिखी होती है। खुशकिस्मत हैं वे लोग, कि जिनके ललाट पर काला टीका लिखा होता है।
जो प्रेम करती हैं, वो अच्छी लड़कियां नहीं होती। तुम अच्छी लड़की बनना, इसीलिए प्रेम मत करना।
गुरुवार, 30 जुलाई 2020
शुक्रवार, 24 जुलाई 2020
भेड़ियों का न्याय
भेड़ियों के आतंक से त्रस्त भेड़ों ने पंचायत बुलायी। विषय था, भेड़ हत्या जायज़ है या नहीं।
भेड़िये सरपंच बनकर आये। लकड़बग्घे पैरवी करने। फैसला सुनने के लिए जंगल के सारे जानवर इकट्ठे हो गये। लोमडियाँ चालाक थीं और शायद नतीजे से वाकिफ़ भी। इसीलिए उसने दूर से तमाशा देखना स्वीकार किया।
"हुजूर! हमारे चार-पाँच भाई-बंधु रोज लापता हो जाते हैं। उनकी खाल, हड्डियां भेड़ियों के डेरे से बरामद होती है। अगर यही हाल रहा तो एक दिन हम विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाएँगे। हमें न्याय दीजिए सरकार।" भेड़ों ने विनती की।
"सबको न्याय का हक है। सरपंचों की स्थापना इसीलिए की गयी है, ताकि किसी को अन्याय न सहना पड़े। भेड़िये ताकतवर हैं, इसका ये मतलब नहीं, कि वे निरीह प्राणियों की जान लेंगे। भेड़िये पक्ष की गलती पकड़े जाने पर हम उन्हें उचित सजा देंगे। हमारी भेड़िया सेना उन्हें गिरफ्तार करेगी। उन पर हत्या का मुकदमा चलाएगी।" सरपंच ने कहा।
भेड़ मण्डली खुश हो गयी। ताकतवर भेड़ियों पर हत्या का मुकदमा चलाया जाएगा। वाह। हम कमजोर हैं तो क्या हुआ? हमें भी न्याय का हक है। सभी एक स्वर में बोले-"सरपंचई की जय हो। सरकार सौ साल जिएँ। जैसी सरकार की आज्ञा होगी, हम करेंगे।"
"दयानिधान! ये खूँखार और हत्यारे भेड़िये मेरे मुवक्किल भेड़ मण्डली को चैन से जीने नहीं देते। जब-तब हमला कर उनके बच्चों को मारकर अपना निवाला बना लेते हैं। मैं चाहता हूँ, इन हत्यारों को ऐसी सज़ा दी जाए, कि इनकी आने वाली पीढ़ियाँ इससे सबक ले। और जंगल में सबको शाँति से जीने का अवसर प्राप्त हो।" लकड़बग्घों ने दलील दी।
लकड़बग्घों की दलील सुनकर भेड़ मण्डली खुशी से झूम उठी। क्या कहने...! कमजोरों की मदद हर कोई करता है। बस दिल बड़ा होना चाहिए। चाहे वह दिल उनके बिरादरी के लोगों के पास क्यों ना हों। लकड़बग्घों जैसे अन्य मजबूत पक्ष भी कमजोरों की क्या खूब मदद करते हैं। वाह। वनतंत्र की जय हो।
लकड़बग्घों की दलीलें सुनकर सरपंच बोले-"ठीक है। हम न्याय करेंगे। लेकिन हम जानना चाहते हैं, कि वे ऐसा क्यों करते हैं। इसीलिए सज़ा सुनाने से पहले हम उन भेड़ियों की भी दलीलें सुनेंगे। क्योंकि वनतंत्र में सबको अपना पक्ष रखने का अधिकार है। सबको न्याय पाने का हक है।" सरपंचों ने कहा।
हत्यारे भेड़ियों को नोटिस जारी किया गया। आनन-फानन में भेड़िया सेना उन हत्यारे भेड़ियों को पकड़ लायी। लाल-लाल और क्या ही बड़ी-बड़ी आँखों वाले हृष्ट-पुष्ट हत्यारे। छोटे जानवर उन्हें देखकर भय से इधर-उधर दुबकने लगे। भेड़ों में भय की एक लहर दौड़ पड़ी। किन्तु सरपंच के रूप में भेड़िया सरकार को सामने पाकर उन्होंने खुद को हिम्मत बंधायी और किसी तरह डटे रहे।
"आप सब पर इल्जाम है, कि आपने भेड़ों का जीना मुहाल कर रखा है। रोज चार-पाँच भेड़ें आप लोग मार डालते हैं। क्या यह इल्जाम सही है?" सरपंच ने पूछा।
"जी हुजूर! इल्जाम बिलकुल सही है।" भेड़िये बोले।
"क्या सरपंच जान सकती है, कि आप लोग यह निरीह हत्या क्यों करते हैं?" सरपंचों ने पुनः सवाल किया।
"हुजूर! हम बेबस और लाचार हैं। जब हमारे छोटे-छोटे बच्चे भूख से बिलखते हैं तो दिल हूकता है। हम सहन नहीं कर पाते और मजबूरन हमें निर्दोष भेड़ों को मारना पड़ता है। हम उन्हें ना मारें तो हमारे छोटे-छोटे बच्चे भूख से मर जाएँगे सरकार।" हत्यारे भेड़ियों ने गिड़गिड़ाते हुए कहा।
"हूँ...! चूंकि समस्या गंभीर है। पर हमें न्याय तो करना ही पड़ेगा। हम न्याय करेंगे; इसका मतलब यह नहीं, कि हम दूसरे पक्ष के साथ अन्याय करेंगे। भेड़ियों के छोटे-छोटे बच्चे हैं। सरपंच होने के नाते हमारा भी कर्तव्य बनता है, कि हम उनकी देखभाल करें। उन्हें गोश्त मुहैया करायें। इसीलिए हम पंचों ने बहुत सोच-विचार कर यह फैसला लिया है, कि आज के बाद भेड़िये अपनी ताकत का इस्तेमाल मजबूरों पर नहीं करेंगे। ना ही भेड़ों का शिकार करेंगे। उनके गोश्त का इंतजाम सरपंच करेगी। क्या इस फैसले से भेड़ पक्ष खुश है?" सरपंचों ने भेड़ों से पूछा।
हर्षित-पुलकित भेड़ों ने एक स्वर में कहा-"जी हुजूर! हम बहुत खुश हैं।"
"हमने एक के साथ न्याय किया। अब हमें दूसरे को भी न्याय देना होगा। अतः हम भेड़ पक्ष को यह निर्देश देते हैं, कि वे रोजाना दस भेड़ें भेड़ियों के गुफाओं में पहुँचा दिया करें। क्या इस फैसले से भेड़िया पक्ष खुश है?" सरपंचों ने भेड़ियों से पूछा।
अंधा क्या मांगे, दो आँखें? भेड़ियों ने कहा-"सरकार की जैसी आज्ञा होगी, हमें शिरोधार्य होगा।"
इस फैसले के फौरन बाद पंचायत समाप्त हो गयी। सो सब अपने-अपने घर चले। मगर जाते-जाते लकड़बग्घों ने अपनी दलील के लिए भेड़ों से पचास भेड़ें माँगी। वनतंत्र कानून के तहत भेड़ों को माँग पूरी करनी पड़ी। भेड़ों को यकीन था, कि भेड़िये अब उनके भाई-बंधुओं को नहीं मारेंगे। अगर मारेंगे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। उन पर हत्या का मुकदमा चलेगा। सभी खुश थे। लाजवाब न्याय हुआ था। मगर लोमड़ियाँ दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी। शायद इसीलिए, क्योंकि वनतंत्र ने उनके लिए बैठे-बिठाये हड्डियों का इंतजाम कर दिया था। हड्डियों के लिए अब उन्हें दूर-दूर भटकने की जरूरत नहीं थी। और एक बार वनतंत्र की जय गूँजी थी। बहुत जोर से। यह आह्वान लौटते हुए उन लोमड़ियों की थी।
दूसरे दिन लोमड़ियों ने देखा- सरपंच का एक आदमी हिस्से के पाँच भेड़ें घसीटे लिए जा रहा है।
सोमवार, 13 जुलाई 2020
और... मैं पागल ना हो जाऊँ।
पिछले कुछ महीनों से मैं एंग़्ज़ाइटी, मोशन सिकनेस, डिप्रेशन और स्लीप डिसऑर्डर से जूझ हूँ। डॉक्टर ने पढ़ाई-लिखायी सम्बन्धी क्रियाकलापों से दूर रहने की हिदायत दी थी पर चाह कर भी इन क्रियाकलापों से खुद को दूर नहीं रख पा रहा। जिसका नतीजा यह हुआ, कि इसके कारण जनरालाइज़्ड डिसऑर्डर के साथ ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर भी पड़ने लगे। मने एक अंजाना भय। बिना बात के ही। सुनने में यह थोड़ा अटपटा लगे, परन्तु पागलपन के शुरुआती लक्षण यहीं से शुरू होते हैं। जिसे बता पाना कम से कम आसान तो नहीं ही है।
यही नहीं, एंग़्ज़ाइटी के साथ मोशन सिकनेस भी हावी होता जा रहा है। जो पहले थोड़ा कम था। मोशन सिकनेस दरअसल गाड़ी, पानी के जहाज या हवाई यात्रा के दौरान ही असर नहीं दिखाते। बल्कि हर उस जगह असर दिखाते हैं, जहाँ दिमाग के संतुलन में नासमझी पैदा हो जाती है या दिमाग अस्थायी गड़बड़ी करने लगता है। तब, जब वो इंद्रियों के बेहूदे संघर्ष को कंट्रोल नहीं कर पाता। बेहूदे संघर्ष। वाहियात।
जब आपकी इंद्रियाँ एक-दूसरे के मेसेजेस को बिना समझे संघर्ष करती है तो उसे मोशन सिकनेस कहा जाता है। उदाहरणार्थ:- आपकी आँखे एक चीज देखती है। मांसपेशियां दूसरी चीज महसूस करती है और कान के भीतरी हिस्से इन दोनों को ही नकार रहे होते हैं। मस्तिष्क इन मिश्रित संकेतों को समझ नहीं पाता और माथा चकराने से लेकर पेट में मरोड़, उल्टियाँ करने जैसी स्थिति पैदा कर देता है। इसी अप्रिय स्थिति को मोशन सिकनेस कहा जाता है।
मुझ पर ऐसे सिकनेस का हावी हो जाना मेरे लिए खतरे की घण्टी जरूर बजा गया है। सम्भव है, कुछ दिन अस्पताल में काटने पड़ें। या सीधी भाषा में कहूँ तो शायद किसी पागलों के डॉक्टर के डिस्पैंशरी में।
शायद अलविदा कहने का समय आ गया है।
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