चाँदनी रात थी। हर तरफ उजियासी फैली। चाँद के आस-पास ढेर सारे तारे टिमटिमा रहे थे। लग रहा था, जैसे सभी तारे मिलकर चाँद को छेड़ रहे हों और चाँद मारे शर्म के लाल हुई जा रही हो।
मैं बारहवीं में था। अंतिम साल के चंद दिन बचे थे। और उस रात हम चार दोस्त गप्पे लड़ा रहे थे। बात बे-बात पाँच रुपए में खरीदी गयी शायरी की एक किताब को पढ़कर मैं सभी को शायरी भी सुनाता जा रहा था। शायरी किसकी थी, यह मैं न जानता था। बस जानता था, तो शायरी में छुपी गहरायी। जैसे एक शायरी थी-
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
उम्र ही इतनी अल्हड़पन से भरी थी, कि क्या कहूँ। मैं मतलब नहीं जानता था। बस जानता था तो यह, कि कोई महबूब होती है। जिससे प्यार किया जाता है। लेकिन बस सोचता। उस रात से पहले तक। क्योंकि उस रात मेरे दोस्तों ने वो बात कही, जिसे आज तक मैं न कह सका।
एक ने कहा, यार! एक बात बता, वो तुम्हे इतनी पसंद करती है, तेरे आसपास रहती है। तुमसे बात करने का एक बहाना ढूंढती है। वो नही कहती पर तुम तो उसे अपने दिल की बात कह सकते हो?
मैंने कहा, कह तो दूँगा। लेकिन मुझे डर है कि वो मुझे छोड़ देगी। जाने मुझसे प्यार करती भी है या नहीं।
सबने एक स्वर मे कहा, तू बोल तो सही। हमलोग हैं ना? नहीं छोडेगी यार। पक्का नही छोडेगी।
मैं टाल गया। बारहवीं खतम हो गयी। दोस्त बिछड़ गये। किसी ने बगल वाले कॉलेज मे एडमिशन ली। कोई कलकत्ता चला गया। और वो भी चली गयी... जिसे खोने के डर से मैं वो न कह सका, जिसका अफसोस मुझे आज भी है।
वो जहां गयी, वो शहर कलकत्ता था। सिटी ऑफ जॉय। ऐसे शहर में किसी को किसी से प्यार न हो, आप इसका दावा नही कर सकते। तब भी, जब आपको किसी से प्यार हो।
वो भी प्यार में पड़ गयी। मैं नही जानता कौन था वो जादूगर। या कि है। पर सोचता हूँ तो दुखता है कुछ भीतर। दुखता है तो सिगरेट जला लेता हूँ। सिगरेट से भी राहत न हो तो शराब की इज्जत पर हाथ डाल देता हूँ। नेपथ्य में चित्रा साथ देती है। अपने कमाल के सुरों के साथ। और दिन बारिशों के हों तो क्या कहने। बारिश, शराब और चित्रा। बडा खतरनाक कॉम्बीनेशन होता है। कि कमबख्त ये शराब भी कहती होगी- बेवडों ने पटका मुझे नाली पर, और दिलजलों ने कव्वाली पर।
वो घर लौटती है। कभी-कभी। सालों बाद। ज्यादा दिन नही रुकती। बस दो-एक दिन। और लौट जाती है। उसे देखता हूँ तो दिल से एक आह् निकलती है। लेकिन उसे टोकता नहीं। वो भी देखकर ऐसे अनदेखा करती है जैसे सामने मैं हूँ ही नहीं। हूँ? कि नहीं?
आज अट्ठारह साल हो गये उससे आखिरी बार बात किए। बुधवार का वो अंतिम स्कूल दिन। बस यही कह पाया था- फिर मिलेंगे।
उसके बाद मैंने शहर छोड़ दी। एक बड़े शहर के बड़े कॉलेज में दाखिला लिया। इस उम्मीद में कि बडा अफसर बनूँगा। फिर उससे मिलकर सबकुछ बताऊँगा। और सीधे कहूँगा- हमसे शादी करोगी?
सच कहूँ तो कॉलेज के दिनों ही असली जिंदगी से उठा-पटक शुरु हुई। आटे-दाल का भाव पता चला। फिर नौकरी मिली तो मालूम हुआ घरवालों की इच्छा भी कोई चीज होती है। बाहर बिरादरी में शादी नही कर सकते। शादी क्या, इसके बारे मे सोचना ही पाप था। तो हम यह पाप कैसे करते। नही कर पाए। सच कहूँ तो हौसला ही नही हुआ। इस कदर टूटा हौसला कि किसी से शादी ही न कर सका। चार कुटुंब आए। नमकीन-कचौरियां ठूंसी। कलम दवात की तमाम जानकारियों के बाद तनखा के उपर की कमाई पूछी। और तमाम की तमाम नौटंकियों के बाद सगाई तय हुई पर मैंने इंकार कर दिया। कई बार। लगा, वो लौटेगी। कहेगी आई लव यू। भटक गयी थी मैं। पर अब लौट आयी हूँ। जानते हैं? मैं सबको कहता फिरता हूँ, जाने वाले लौटा नही करते। पता नही क्यूँ खुद के दिल को यह आज तक समझा नही पाया। अब तो मान ले यार इतने दिनों की कोई पढ़ाई कोई कोर्स नहीं होता? पहले सोचता था सिविल सर्विसेस की तैयारी करती होगी। अब तो उसकी उम्र भी 35 के आसपास हो चली है। क्या इतने सालों में वो छः अटेम्पट नही कर पायी होगी? यह भी तो संभव है कि वो उधर ही ब्याह करके उधर ही बस गयी हो? हाँ यह संभव है। एकदम संभव है। और ऐसा ही हुआ भी है। कि उसके जिस्म के एक एक अंग इसकी गवाही दे रहे हैं, कि वह अब कुंवारी नही रही। वह अब कुंवारी नही रही।

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