गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025

सफ़ेद फूल




सफ़ेद फूल शान्ति के प्रतीक माने जाते हैं। शान्ति के दिनों के प्रतीक माने जाते हैं। किन्तु इन सफ़ेद फूलों को सबसे अधिक दुख़द दिनों में ही याद किया जाता है। श्यामली होतीं, तो शायद मेरी बातों के हाँ में हाँ मिलातीं। कि यही सबसे दुख़द दिन हैं इन दिनों। दुख़ती नसों में नमक घोलने के दिन हैं ये। और इन्हीं दिनों मुझे श्यामली की यादें टीसती हैं। कि ठीक इन्हीं दिनों सदाबहार भी खूब खिलखिलाते हैं। दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची से लगते हैं। या एक-दूसरे के पूरक। दुःख और शान्ति। शान्ति और दुःख। कि बिना दुःख शान्ति नहीं, न शान्ति है सुख़ के दिनों। कि सुख़ और शान्ति साथ नहीं रह सकतीं। जैसे नहीं रह सकते साथ दरिया के दो किनारे। धरती और अम्बर। क्षितिज और विकेन्द्र। वैसे ही, जैसे नहीं रह सकते साथ सैंय्याँ और सावन। वसन्त और बिरहा। मुस्कान और मौत। 

कभी-कभी सोचता हूँ; तुम्हें सफ़ेद फूलों से इतना प्रेम क्यों था? क्यों था इतना लगाव? फूलों की तासीर कब बदलती है जानां?



शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

"प्यार जहाँ पूरा नहीं होता, अमरता की ओर बढ़ जाता है।"


मौसम गरमी का था और हम दिल्ली में थे। बाराखंभा से मेरे डेरे की दूरी इतनी मामूली थी, कि आदमी आराम से पानी-बतासे खाते और चहल कदमी करते घर पहुँच जाए। उन्हीं दिनों मेरी एक मुँहबोली माँ जो उन दिनों दिल्ली में मेरी सबसे अजीज हुआ करती थी, ने उस दिन दोपहर मुझे भोजन पर बुलाया था। मुझे याद है, कि उस दिन मैं ऑफिस से जल्दी निकल गया था। दोपहर के तकरीबन दो बजे। बहुत अधिक थका न होने के बावजूद मैंने रिक्शा ले ली थी। क्योंकि खाने पर मेरी फ़ेवरेट डिशेष मेरा इंतज़ार कर रही थी। मेरे लिए वो दिन ऐतिहासिक था। मैंने ऐतिहासिक क्यों कहा, पूछने पर शायद उस दिन नहीं बता पाता। लेकिन आज बता सकता हूँ। 

हुआ यूँ, कि उस दिन ऑफिस से निकल रिक्शे पर बैठते ही मेरा फोन बजने लगा। स्क्रीन पर श्यामली दो का नम्बर देख मैंने फोन पिक कर ली। उधर से साँय-साँय की आवाज के बीच श्यामली दो चहकती हुई बोली-"आज दिल्ली में हूँ; तुम्हारे ऑफिस आ रही हूँ।" 

मैं चौंका, कि औरंगाबाद की अल्हड़ दिल्ली में कैसे? सो पूछ बैठा-"न डाक, न तार, न टेलीफोन; तुम दिल्ली कब पहुंची?" 

जवाब में आधे मिनट का मौन आया। लेकिन मैं साफ़-साफ़ महसूस कर रहा था, कि वो खीझी है। आदमी सैकड़ो किलोमीटर तय करके आपसे मिलने पहुँचे और आप इस तरह के सवाल करें तो खीझना लाजिमी भी है। वो बोली-"कहो तो बैरंग डाक की तरह लौट पडूँ?" 

मैंने उसे बताया कि मैं ऑफिस में नहीं हूँ। बल्कि खाने के लिए माँ के पास जा रहा हूँ। सुनकर वो व्यंग्यात्मक रुप से मुस्कुरायीं और जरा धीमे स्वर में बोली-"मैंने वापसी की फ्लाइट कैंसल कर दी और महाशय को माँ के हाथ से खाना खाने जाना है। वाह जी... मेरी तो कोई परवाह ही नहीं है।" 

"अरे नहीं-नहीं! ऐसी बात नहीं है। बताओ कहाँ आऊँ?" उसे नाराज न करने की गरज़ से मैंने लगभग तुरंत उत्तर दिया। 

"कहीं नहीं! जहाँ हो वहीं रहो। मैं आ रही हूँ तुम्हे लेने।" बोल कर वो इधर-उधर की बातें करने लगीं। 

आईजीआई रोड से बाराखंभा की दूरी बस पंद्रह मिनट तो है। सो मुझे पंद्रह मिनट इंतज़ार करना पड़ा। उसके बाद हम इकट्ठे डाबड़ी में एक फ्लैट देखने निकल पड़े। उसी टैक्सी से। 

बिल्डर हमें फ्लैट के कोने-कोने से वाकिफ़ करा ही रहा था, कि आसमान में क्या ही घने और काले बादलों ने अपना डेरा जमा लिया। आमतौर पर दिल्ली में काले बादलों के दर्शन दुर्लभ कहे जाते हैं। थोड़ी ही देर में पछिया के झोंकों के साथ बारिश भी होने लगी। बाल्कनी में जब झटास हद से ज्यादा मारने लगा तो वो अपने चेहरे पर पड़ी बूंदो को पसीने की तरह पोछते हुए बोली-"एक दिन आएगा, जब हम साथ होंगे। इसी घर में। एक अच्छे प्रेमी-प्रेमिका से एक कदम आगे बढ़ कर पति-पत्नी के रुप में। और गर्मियों में जब दोबारा बारिशें होंगी तो मैं यहाँ कुर्सी डाल कर बैठूंगी। झटास खाने।" बाल्कनी के एक कोने में कुर्सी डालने की जगह दिखा कर वो दो कदम पीछे हटी और मुस्कुराने लगी। 

ऐसी बातों से कौन नहीं रीझता? मैं भी रीझ गया। और इस बार मैंने उसके गालों को चूम लिया था। हौले से। कि उसकी ख़ुशी देखने लायक थी।

बुलबुल मस्त बहारों की 

जैसे फुदके बने-बसन्त 

और शायद मैंने उन्ही दिनों को याद करके यह नज़्म लिखी हो? 

कि....

मेरे दिल तक पहुँचने का 

बस एक ही रास्ता है... 

किसी बरसात की रात 

तुम झटास* बनकर आना... 

इस दौरान माँ ने मुझे पचासों फोन किये थे। मेसेज भी। कि कहाँ हो, पहुँचे क्यों नहीं? खाना ठंडा हो रहा है, आदि-आदि। पर मुझे उस दिन फुरसत नहीं थी। दिन भर की मौज-ठिठोली के बाद रात हमने साथ गुजारे। होटल में। और इसी दौरान मैंने माँ से कह दिया-"आपकी बहू आयी है। दिल्ली। बिना बताये। सो आज के लिए माफी चाहता हूँ।" माँ थीं। क्या कहतीं? माफ़ करना पड़ा। दिल में चोट लगी होगी, मैं समझ सकता हूँ। पर पत्थर दिल नहीं होती माँ। इस बात का हम लड़के कुछ ज्यादा ही फायदा उठाते हैं। माँ ने कहा-"वो मिलना चाहती हैं। श्यामली दो से। मैंने हामी भर दी। उससे बिना पूछे। लेकिन... 

सुबह श्यामली जल्दी उठ गयी। फ्लाइट थी उसकी। मुझे भी उठाकर वो बोली-"चलो! रास्ते में साथ ही चाय हो जाएगी।" मैंने कहा-"आज माँ तुमसे मिलना चाहती है। मिलोगी?" वो कुछ पल ठहर कर बोली-"नहीं! आज मीटिंग है। फिर कभी।" मैंने कहा-"मीटिंग कैंसल कर दो? क्या फ़रक पड़ता है?" वो नहीं मानी। लौट पड़ीं। 

उस दिन माँ बहुत गुस्से में थीं। उन्हें लगा, अब उनकी अहमियत खतम हो गयी है। जबकि ऐसा नहीं था। 


पछिया फिर चली थी। लेकिन इस बार वो मनोरंजक नहीं, हानिकारक साबित हो रही थी। उन दिनों मैं एक बड़ी बीमारी से जूझ रहा था। कि एक दिन श्यामली दो का फोन आया। वो बोली-"उसी अपार्टमेन्ट में खड़ी हूँ। आज गृहप्रवेश है। क्या अपार्टमेन्ट का मालिक नहीं आयेगा?" 


और मैं उससे हजारों किलोमीटर दूर अस्पताल के एक सिंगल बेड पर पड़ा यह सोच रहा था, कि ये किस्मत बड़ी कम्बख्त चीज़ है। सबकुछ होते हुए भी पास कुछ भी नहीं रहने देती। कुछ भी नहीं। कि "प्यार जहाँ पूरा नहीं होता, अमरता की ओर बढ़ जाता है।"


*(झटास:- बारिश की वो नन्ही बूँदें, जो खुली खिड़की के रास्ते तेज हवाओं के संग भीतर आती हैं।) 


गुरुवार, 5 सितंबर 2024

"कजरा मोहब्बत वाला अँखियों में ऐसा डाला


चाँदनी रात थी। हर तरफ उजियासी फैली। चाँद के आस-पास ढेर सारे तारे टिमटिमा रहे थे। लग रहा था, जैसे सभी तारे मिलकर चाँद को छेड़ रहे हों और चाँद मारे शर्म के लाल हुई जा रही हो। 

मैं बारहवीं में था। अंतिम साल के चंद दिन बचे थे। और उस रात हम चार दोस्त गप्पे लड़ा रहे थे। बात बे-बात पाँच रुपए में खरीदी गयी शायरी की एक किताब को पढ़कर मैं सभी को शायरी भी सुनाता जा रहा था। शायरी किसकी थी, यह मैं न जानता था। बस जानता था, तो शायरी में छुपी गहरायी। जैसे एक शायरी थी- 

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

उम्र ही इतनी अल्हड़पन से भरी थी, कि क्या कहूँ। मैं मतलब नहीं जानता था। बस जानता था तो यह, कि कोई महबूब होती है। जिससे प्यार किया जाता है। लेकिन बस सोचता। उस रात से पहले तक। क्योंकि उस रात मेरे दोस्तों ने वो बात कही, जिसे आज तक मैं न कह सका। 

एक ने कहा, यार! एक बात बता, वो तुम्हे इतनी पसंद करती है, तेरे आसपास रहती है। तुमसे बात करने का एक बहाना ढूंढती है। वो नही कहती पर तुम तो उसे अपने दिल की बात कह सकते हो? 

मैंने कहा, कह तो दूँगा। लेकिन मुझे डर है कि वो मुझे छोड़ देगी। जाने मुझसे प्यार करती भी है या नहीं। 

सबने एक स्वर मे कहा, तू बोल तो सही। हमलोग हैं ना? नहीं छोडेगी यार। पक्का नही छोडेगी। 

मैं टाल गया। बारहवीं खतम हो गयी। दोस्त बिछड़ गये। किसी ने बगल वाले कॉलेज मे एडमिशन ली। कोई कलकत्ता चला गया। और वो भी चली गयी... जिसे खोने के डर से मैं वो न कह सका, जिसका अफसोस मुझे आज भी है। 

वो जहां गयी, वो शहर कलकत्ता था। सिटी ऑफ जॉय। ऐसे शहर में किसी को किसी से प्यार न हो, आप इसका दावा नही कर सकते। तब भी, जब आपको किसी से प्यार हो। 

वो भी प्यार में पड़ गयी। मैं नही जानता कौन था वो जादूगर। या कि है। पर सोचता हूँ तो दुखता है कुछ भीतर। दुखता है तो सिगरेट जला लेता हूँ। सिगरेट से भी राहत न हो तो शराब की इज्जत पर हाथ डाल देता हूँ। नेपथ्य में चित्रा साथ देती है। अपने कमाल के सुरों के साथ। और दिन बारिशों के हों तो क्या कहने। बारिश, शराब और चित्रा। बडा खतरनाक कॉम्बीनेशन होता है। कि कमबख्त ये शराब भी कहती होगी- बेवडों ने पटका मुझे नाली पर, और दिलजलों ने कव्वाली पर। 


वो घर लौटती है। कभी-कभी। सालों बाद। ज्यादा दिन नही रुकती। बस दो-एक दिन। और लौट जाती है। उसे देखता हूँ तो दिल से एक आह् निकलती है। लेकिन उसे टोकता नहीं। वो भी देखकर ऐसे अनदेखा करती है जैसे सामने मैं हूँ ही नहीं। हूँ? कि नहीं? 


आज अट्ठारह साल हो गये उससे आखिरी बार बात किए। बुधवार का वो अंतिम स्कूल दिन। बस यही कह पाया था- फिर मिलेंगे। 


उसके बाद मैंने शहर छोड़ दी। एक बड़े शहर के बड़े कॉलेज में दाखिला लिया। इस उम्मीद में कि बडा अफसर बनूँगा। फिर उससे मिलकर सबकुछ बताऊँगा। और सीधे कहूँगा- हमसे शादी करोगी? 


सच कहूँ तो कॉलेज के दिनों ही असली जिंदगी से उठा-पटक शुरु हुई। आटे-दाल का भाव पता चला। फिर नौकरी मिली तो मालूम हुआ घरवालों की इच्छा भी कोई चीज होती है। बाहर बिरादरी में शादी नही कर सकते। शादी क्या, इसके बारे मे सोचना ही पाप था। तो हम यह पाप कैसे करते। नही कर पाए। सच कहूँ तो हौसला ही नही हुआ। इस कदर टूटा हौसला कि किसी से शादी ही न कर सका। चार कुटुंब आए। नमकीन-कचौरियां ठूंसी। कलम दवात की तमाम जानकारियों के बाद तनखा के उपर की कमाई पूछी। और तमाम की तमाम नौटंकियों के बाद सगाई तय हुई पर मैंने इंकार कर दिया। कई बार। लगा, वो लौटेगी। कहेगी आई लव यू। भटक गयी थी मैं। पर अब लौट आयी हूँ। जानते हैं? मैं सबको कहता फिरता हूँ, जाने वाले लौटा नही करते। पता नही क्यूँ खुद के दिल को यह आज तक समझा नही पाया। अब तो मान ले यार इतने दिनों की कोई पढ़ाई कोई कोर्स नहीं होता? पहले सोचता था सिविल सर्विसेस की तैयारी करती होगी। अब तो उसकी उम्र भी 35 के आसपास हो चली है। क्या इतने सालों में वो छः अटेम्पट नही कर पायी होगी? यह भी तो संभव है कि वो उधर ही ब्याह करके उधर ही बस गयी हो? हाँ यह संभव है। एकदम संभव है। और ऐसा ही हुआ भी है। कि उसके जिस्म के एक एक अंग इसकी गवाही दे रहे हैं, कि वह अब कुंवारी नही रही। वह अब कुंवारी नही रही।


गुरुवार, 28 जनवरी 2021

वे दिन... और

हुआ क्या है, मालूम नहीं। बुख़ार, जुकाम, बेहोशी रह-रहकर आती है। यादाश्त भी छीन होती जा रही है। चंद दिनों पहले एक डॉक्टर ने मियाँदी बुख़ार होने की बात कही थी। दवा खा कर भी बुख़ार नहीं गया तो एक एमबीबीएस फ्रेंड से बात करनी पड़ी। उसने अपने पैथालॉजी में जाँच की तो नतीजा कुछ भी नहीं निकला। बाद में पता चला, कि पहले वाले डॉक्टर साहब पैथालॉजी से मिले हुए थे। माने उनकी अपनी ही पैथालॉजी थी। ऐसा नहीं है, कि मुझे कभी मियाँदी की शिकायत नहीं रही। पर जब भी यह बुख़ार आया, सोलह इंजेक्शन के बाद ही गया। इन्हीं सब के बीच आज सुबह थोड़ी उल्टियाँ हुई। मन में डर था, कि खून न निकल जाए। तीन महीने पहले ही तो खून बहा था। मुँह से। ऐसे ही। तुरंत मुम्बई भागना पड़ा था। टेस्ट के बाद जब रिपोर्ट निगेटिव निकली तो जान में जान आयी। तभी लॉकडाउन नहीं हुआ था। आने-जाने के सारे रास्ते खुले हुए थे। फ्लाइट्स की सुविधा थी। पर अब ये सारी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। जा तो सकता हूँ, पर डर लगता है, कि कोरोना ना लेता आऊँ। मुम्बई में रहने वाली एक माँ कहती है, मुम्बई मत आ। यहाँ की हालत बहुत खराब है। व्हाटस्अप से दवा मंगवा ले। लेकिन डॉक्टर साहब ने साफ कहा है, कि फिर से जाँच करनी होगी। और इसके लिए आप का आना जरूरी है। इसी सोच-विचार के कारण मानसिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है। फिर कुछ लोग हैं जो केवल दुख ही देना जानते हैं। इस बारे में डॉक्टर से कहता हूँ तो वे कहते हैं, संजीव! कुछ दिन लिखने-पढ़ने और मोबाइल फोन से दूरी बना लो। अब उन्हें कैसे कहूँ, कि दुख देने वाले बिना मोबाइल फोन के भी दुख देते हैं। फोन ना उठाओ तो सामने आ जाते हैं। झूठ-फूस का कहते हैं, कि मैं ठीक हूँ। ख़ुश हूँ। जबकि मेरी छठी इंद्रियाँ कहती हैं, भले ही ये झूठ बोल रही है पर तुम हँसना मत। हँसने से उसे दुख होगा। लगेगा, सच्चाई जानते हुए भी पूछता है। ढोंगी। परन्तु मुझे मालूम है, मैं क्यों नहीं कहता सच्चाई। क्योंकि उसके बाद की स्थिति संभालने लायक कूवत नहीं बची मेरे पास। अकेले में हँसता हूँ, ताकि बाद में हँसने का अफसोस ना रहे। कि जिस जीवन में सबसे ज्यादा कमीं हँसी की ही रही हो, कि उस जीवन में किसी के झूठ पर हँसना बनता भी नहीं है। कि जिस जीवन के पहले ढाई साल में ही माँ का साथ छूट जाए, कि उस जीवन में सुख़ का होना बनता भी नहीं है। खुशकिस्मत हैं वे लोग, कि जिनके जीवन में माँ की ममता लिखी होती है। खुशकिस्मत हैं वे लोग, कि जिनके ललाट पर काला टीका लिखा होता है।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

बुद्धिजीवी बनाम कुबुद्धिजीवी



उन लोगों के लिए दो शब्द; जो मुझ जैसे विचार रखने वालों को भीड़ बनकर बस गालियाँ देना जानते हैं।

बच्चों; तुम लोग जानते हो, कि मेरे या मुझ जैसे तथाकथित बुद्धिजीवियों के पास केवल ज्ञान ही नहीं बल्कि मृगमरीचिकाई शब्दों का भण्डार भी होता है। सोचो, तुम जो उन्हें गालियाँ देते हो, अगर वापस पलट कर वो भी तुम लोगों को गाली दे तो? क्या तुम उसके अथाह शाब्दिक भण्डार का थाह ले सकोगे? उसके अर्थातों को समझ सकोगे? कदाचित् मुझे ऐसा नहीं लगता कि तुम लोगों में इतनी बुद्धि है। खैर, वो गाली कभी नहीं देंगे। जानते हो क्यों? बताता हूँ। वो गाली इसीलिए नहीं देंगे, क्योंकि गाली कुंठित और बीमार मानसिकता की निशानी होती है। भले तुम लोग कुंठित हो या बना दिये गये हो, जिसका तुम्हें भान नहीं है। पर यह तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग कुंठित नहीं है। बच्चों, ये बुद्धिजीवी वर्ग जो है न, वो तुम्हारी माँ-बहनों को अपनी माँ-बहन मानता है। इसलिए वो तुम जैसे झंडूबाम और चिरकूट लोगों को हँस कर इग्नोर कर देता है। तुम सब उनके लिए बस जोकर जैसे हो और कुछ नहीं। 

क्या तुम लोगों में इतनी साहस है, कि तुम दूसरों की माँ, बहनों के लिए आवाज बुलंद कर सको? नहीं। क्योंकि वो तुम्ही लोग हो, जिसके कारण भारत में कोई भी महिला खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती। वो तुम्ही लोग हो, जिसके लिए महिलाएँ सिर्फ एक गोश्त का टुकड़ा होती हैं। फिर वो महिला तुम्हारे मोहल्ले की हो या फिर कश्मीर की। मेरे बुद्धिहीन बंधुओं, यह तथाकथित बुद्धिजीवी ही है, जो कठुआ, उन्नाव जैसे एक असहाय बलात्कार पीड़िता के लिए अपनी आवाज उठाता है। उसे न्याय दिलाने के लिए लड़ता है। और यकीन रखो, यदि कल तुम जैसा कोई मानसिक दिवालियापन से पीड़ित रईश आततायी तुम्हारी माँ या बहन का बलात्कार कर दे और कानून उस पर अपनी आँखें मूँद ले तो यही बुद्धिजीवी वर्ग होगा, जो उसके लिए अपनी आवाज़ बुलंद करेगा। और हाँ! तुम भेड़ बकरियों की फौज तब भी हिन्दू-मुस्लिम और दलित करने के लिए आ जाना। गाली देने आ जाना। वो फिर हँस कर इग्नोर कर देंगे। तब तक के लिए, अपनी माताजी को मेरा प्रणाम कहना और बहन को स्नेह 😊

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

तू है कैसा निर्मोही, कैसा हरजाईया...

हुआ क्या है, मालूम नहीं। बुख़ार, जुकाम, बेहोशी रह-रहकर आती है। यादाश्त भी छीन होती जा रही है। चंद दिनों पहले एक डॉक्टर ने मियाँदी बुख़ार होने की बात कही थी। दवा खा कर भी बुख़ार नहीं गया तो एक एमबीबीएस फ्रेंड से बात करनी पड़ी। उसने अपने पैथालॉजी में जाँच की तो नतीजा कुछ भी नहीं निकला। बाद में पता चला, कि पहले वाले डॉक्टर साहब पैथालॉजी से मिले हुए थे। माने उनकी अपनी ही पैथालॉजी थी। ऐसा नहीं है, कि मुझे कभी मियाँदी की शिकायत नहीं रही। पर जब भी यह बुख़ार आया, सोलह इंजेक्शन के बाद ही गया। इन्हीं सब के बीच आज सुबह थोड़ी उल्टियाँ हुई। मन में डर था, कि खून न निकल जाए। तीन महीने पहले ही तो खून बहा था। मुँह से। ऐसे ही। तुरंत मुम्बई भागना पड़ा था। टेस्ट के बाद जब रिपोर्ट निगेटिव निकली तो जान में जान आयी। तभी लॉकडाउन नहीं हुआ था। आने-जाने के सारे रास्ते खुले हुए थे। फ्लाइट्स की सुविधा थी। पर अब ये सारी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। जा तो सकता हूँ, पर डर लगता है, कि कोरोना ना लेता आऊँ। मुम्बई में रहने वाली एक माँ कहती है, मुम्बई मत आ। यहाँ की हालत बहुत खराब है। व्हाटस्अप से दवा मंगवा ले। लेकिन डॉक्टर साहब ने साफ कहा है, कि फिर से जाँच करनी होगी। और इसके लिए आप का आना जरूरी है। इसी सोच-विचार के कारण मानसिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है। फिर कुछ लोग हैं जो केवल दुख ही देना जानते हैं। इस बारे में डॉक्टर से कहता हूँ तो वे कहते हैं, संजीव! कुछ दिन लिखने-पढ़ने और मोबाइल फोन से दूरी बना लो। अब उन्हें कैसे कहूँ, कि दुख देने वाले बिना मोबाइल फोन के भी दुख देते हैं। फोन ना उठाओ तो सामने आ जाते हैं। झूठ-फूस का कहते हैं, कि मैं ठीक हूँ। ख़ुश हूँ। जबकि मेरी छठी इंद्रियाँ कहती हैं, भले ही ये झूठ बोल रही है पर तुम हँसना मत। हँसने से उसे दुख होगा। लगेगा, सच्चाई जानते हुए भी पूछता है। ढोंगी। परन्तु मुझे मालूम है, मैं क्यों नहीं कहता सच्चाई। क्योंकि उसके बाद की स्थिति संभालने लायक कूवत नहीं बची मेरे पास। अकेले में हँसता हूँ, ताकि बाद में हँसने का अफसोस ना रहे। कि जिस जीवन में सबसे ज्यादा कमीं हँसी की ही रही हो, कि उस जीवन में किसी के झूठ पर हँसना बनता भी नहीं है। कि जिस जीवन के पहले ढाई साल में ही माँ का साथ छूट जाए, कि उस जीवन में सुख़ का होना बनता भी नहीं है। खुशकिस्मत हैं वे लोग, कि जिनके जीवन में माँ की ममता लिखी होती है। खुशकिस्मत हैं वे लोग, कि जिनके ललाट पर काला टीका लिखा होता है।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

भेड़ियों का न्याय


भेड़ियों के आतंक से त्रस्त भेड़ों ने पंचायत बुलायी। विषय था, भेड़ हत्या जायज़ है या नहीं। 

भेड़िये सरपंच बनकर आये। लकड़बग्घे पैरवी करने। फैसला सुनने के लिए जंगल के सारे जानवर इकट्ठे हो गये। लोमडियाँ चालाक थीं और शायद नतीजे से वाकिफ़ भी। इसीलिए उसने दूर से तमाशा देखना स्वीकार किया। 

"हुजूर! हमारे चार-पाँच भाई-बंधु रोज लापता हो जाते हैं। उनकी खाल, हड्डियां भेड़ियों के डेरे से बरामद होती है। अगर यही हाल रहा तो एक दिन हम विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाएँगे। हमें न्याय दीजिए सरकार।" भेड़ों ने विनती की। 

"सबको न्याय का हक है। सरपंचों की स्थापना इसीलिए की गयी है, ताकि किसी को अन्याय न सहना पड़े। भेड़िये ताकतवर हैं, इसका ये मतलब नहीं, कि वे निरीह प्राणियों की जान लेंगे। भेड़िये पक्ष की गलती पकड़े जाने पर हम उन्हें उचित सजा देंगे। हमारी भेड़िया सेना उन्हें गिरफ्तार करेगी। उन पर हत्या का मुकदमा चलाएगी।" सरपंच ने कहा। 

भेड़ मण्डली खुश हो गयी। ताकतवर भेड़ियों पर हत्या का मुकदमा चलाया जाएगा। वाह। हम कमजोर हैं तो क्या हुआ? हमें भी न्याय का हक है। सभी एक स्वर में बोले-"सरपंचई की जय हो। सरकार सौ साल जिएँ। जैसी सरकार की आज्ञा होगी, हम करेंगे।" 

"दयानिधान! ये खूँखार और हत्यारे भेड़िये मेरे मुवक्किल भेड़ मण्डली को चैन से जीने नहीं देते। जब-तब हमला कर उनके बच्चों को मारकर अपना निवाला बना लेते हैं। मैं चाहता हूँ, इन हत्यारों को ऐसी सज़ा दी जाए, कि इनकी आने वाली पीढ़ियाँ इससे सबक ले। और जंगल में सबको शाँति से जीने का अवसर प्राप्त हो।" लकड़बग्घों ने दलील दी। 

लकड़बग्घों की दलील सुनकर भेड़ मण्डली खुशी से झूम उठी। क्या कहने...! कमजोरों की मदद हर कोई करता है। बस दिल बड़ा होना चाहिए। चाहे वह दिल उनके बिरादरी के लोगों के पास क्यों ना हों। लकड़बग्घों जैसे अन्य मजबूत पक्ष भी कमजोरों की क्या खूब मदद करते हैं। वाह। वनतंत्र की जय हो। 

लकड़बग्घों की दलीलें सुनकर सरपंच बोले-"ठीक है। हम न्याय करेंगे। लेकिन हम जानना चाहते हैं, कि वे ऐसा क्यों करते हैं। इसीलिए सज़ा सुनाने से पहले हम उन भेड़ियों की भी दलीलें सुनेंगे। क्योंकि वनतंत्र में सबको अपना पक्ष रखने का अधिकार है। सबको न्याय पाने का हक है।" सरपंचों ने कहा। 

हत्यारे भेड़ियों को नोटिस जारी किया गया। आनन-फानन में भेड़िया सेना उन हत्यारे भेड़ियों को पकड़ लायी। लाल-लाल और क्या ही बड़ी-बड़ी आँखों वाले हृष्ट-पुष्ट हत्यारे। छोटे जानवर उन्हें देखकर भय से इधर-उधर दुबकने लगे। भेड़ों में भय की एक लहर दौड़ पड़ी। किन्तु सरपंच के रूप में भेड़िया सरकार को सामने पाकर उन्होंने खुद को हिम्मत बंधायी और किसी तरह डटे रहे।

"आप सब पर इल्जाम है, कि आपने भेड़ों का जीना मुहाल कर रखा है। रोज चार-पाँच भेड़ें आप लोग मार डालते हैं। क्या यह इल्जाम सही है?" सरपंच ने पूछा।

"जी हुजूर! इल्जाम बिलकुल सही है।" भेड़िये बोले।

"क्या सरपंच जान सकती है, कि आप लोग यह निरीह हत्या क्यों करते हैं?" सरपंचों ने पुनः सवाल किया।

"हुजूर! हम बेबस और लाचार हैं। जब हमारे छोटे-छोटे बच्चे भूख से बिलखते हैं तो दिल हूकता है। हम सहन नहीं कर पाते और मजबूरन हमें निर्दोष भेड़ों को मारना पड़ता है। हम उन्हें ना मारें तो हमारे छोटे-छोटे बच्चे भूख से मर जाएँगे सरकार।" हत्यारे भेड़ियों ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। 

"हूँ...! चूंकि समस्या गंभीर है। पर हमें न्याय तो करना ही पड़ेगा। हम न्याय करेंगे; इसका मतलब यह नहीं, कि हम दूसरे पक्ष के साथ अन्याय करेंगे। भेड़ियों के छोटे-छोटे बच्चे हैं। सरपंच होने के नाते हमारा भी कर्तव्य बनता है, कि हम उनकी देखभाल करें। उन्हें गोश्त मुहैया करायें। इसीलिए हम पंचों ने बहुत सोच-विचार कर यह फैसला लिया है, कि आज के बाद भेड़िये अपनी ताकत का इस्तेमाल मजबूरों पर नहीं करेंगे। ना ही भेड़ों का शिकार करेंगे। उनके गोश्त का इंतजाम सरपंच करेगी। क्या इस फैसले से भेड़ पक्ष खुश है?" सरपंचों ने भेड़ों से पूछा।

हर्षित-पुलकित भेड़ों ने एक स्वर में कहा-"जी हुजूर! हम बहुत खुश हैं।" 

"हमने एक के साथ न्याय किया। अब हमें दूसरे को भी न्याय देना होगा। अतः हम भेड़ पक्ष को यह निर्देश देते हैं, कि वे रोजाना दस भेड़ें भेड़ियों के गुफाओं में पहुँचा दिया करें। क्या इस फैसले से भेड़िया पक्ष खुश है?" सरपंचों ने भेड़ियों से पूछा। 

अंधा क्या मांगे, दो आँखें? भेड़ियों ने कहा-"सरकार की जैसी आज्ञा होगी, हमें शिरोधार्य होगा।"

इस फैसले के फौरन बाद पंचायत समाप्त हो गयी। सो सब अपने-अपने घर चले। मगर जाते-जाते लकड़बग्घों ने अपनी दलील के लिए भेड़ों से पचास भेड़ें माँगी। वनतंत्र कानून के तहत भेड़ों को माँग पूरी करनी पड़ी। भेड़ों को यकीन था, कि भेड़िये अब उनके भाई-बंधुओं को नहीं मारेंगे। अगर मारेंगे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। उन पर हत्या का मुकदमा चलेगा। सभी खुश थे। लाजवाब न्याय हुआ था। मगर लोमड़ियाँ दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी। शायद इसीलिए, क्योंकि वनतंत्र ने उनके लिए बैठे-बिठाये हड्डियों का इंतजाम कर दिया था। हड्डियों के लिए अब उन्हें दूर-दूर भटकने की जरूरत नहीं थी। और एक बार वनतंत्र की जय गूँजी थी। बहुत जोर से। यह आह्वान लौटते हुए उन लोमड़ियों की थी। 
दूसरे दिन लोमड़ियों ने देखा-  सरपंच का एक आदमी हिस्से के पाँच भेड़ें घसीटे लिए जा रहा है। 

सफ़ेद फूल

सफ़ेद फूल शान्ति के प्रतीक माने जाते हैं। शान्ति के दिनों के प्रतीक माने जाते हैं। किन्तु इन सफ़ेद फूलों को सबसे अधिक दुख़द दिनों में ही याद...