मौसम गरमी का था और हम दिल्ली में थे। बाराखंभा से मेरे डेरे की दूरी इतनी मामूली थी, कि आदमी आराम से पानी-बतासे खाते और चहल कदमी करते घर पहुँच जाए। उन्हीं दिनों मेरी एक मुँहबोली माँ जो उन दिनों दिल्ली में मेरी सबसे अजीज हुआ करती थी, ने उस दिन दोपहर मुझे भोजन पर बुलाया था। मुझे याद है, कि उस दिन मैं ऑफिस से जल्दी निकल गया था। दोपहर के तकरीबन दो बजे। बहुत अधिक थका न होने के बावजूद मैंने रिक्शा ले ली थी। क्योंकि खाने पर मेरी फ़ेवरेट डिशेष मेरा इंतज़ार कर रही थी। मेरे लिए वो दिन ऐतिहासिक था। मैंने ऐतिहासिक क्यों कहा, पूछने पर शायद उस दिन नहीं बता पाता। लेकिन आज बता सकता हूँ।
हुआ यूँ, कि उस दिन ऑफिस से निकल रिक्शे पर बैठते ही मेरा फोन बजने लगा। स्क्रीन पर श्यामली दो का नम्बर देख मैंने फोन पिक कर ली। उधर से साँय-साँय की आवाज के बीच श्यामली दो चहकती हुई बोली-"आज दिल्ली में हूँ; तुम्हारे ऑफिस आ रही हूँ।"
मैं चौंका, कि औरंगाबाद की अल्हड़ दिल्ली में कैसे? सो पूछ बैठा-"न डाक, न तार, न टेलीफोन; तुम दिल्ली कब पहुंची?"
जवाब में आधे मिनट का मौन आया। लेकिन मैं साफ़-साफ़ महसूस कर रहा था, कि वो खीझी है। आदमी सैकड़ो किलोमीटर तय करके आपसे मिलने पहुँचे और आप इस तरह के सवाल करें तो खीझना लाजिमी भी है। वो बोली-"कहो तो बैरंग डाक की तरह लौट पडूँ?"
मैंने उसे बताया कि मैं ऑफिस में नहीं हूँ। बल्कि खाने के लिए माँ के पास जा रहा हूँ। सुनकर वो व्यंग्यात्मक रुप से मुस्कुरायीं और जरा धीमे स्वर में बोली-"मैंने वापसी की फ्लाइट कैंसल कर दी और महाशय को माँ के हाथ से खाना खाने जाना है। वाह जी... मेरी तो कोई परवाह ही नहीं है।"
"अरे नहीं-नहीं! ऐसी बात नहीं है। बताओ कहाँ आऊँ?" उसे नाराज न करने की गरज़ से मैंने लगभग तुरंत उत्तर दिया।
"कहीं नहीं! जहाँ हो वहीं रहो। मैं आ रही हूँ तुम्हे लेने।" बोल कर वो इधर-उधर की बातें करने लगीं।
आईजीआई रोड से बाराखंभा की दूरी बस पंद्रह मिनट तो है। सो मुझे पंद्रह मिनट इंतज़ार करना पड़ा। उसके बाद हम इकट्ठे डाबड़ी में एक फ्लैट देखने निकल पड़े। उसी टैक्सी से।
बिल्डर हमें फ्लैट के कोने-कोने से वाकिफ़ करा ही रहा था, कि आसमान में क्या ही घने और काले बादलों ने अपना डेरा जमा लिया। आमतौर पर दिल्ली में काले बादलों के दर्शन दुर्लभ कहे जाते हैं। थोड़ी ही देर में पछिया के झोंकों के साथ बारिश भी होने लगी। बाल्कनी में जब झटास हद से ज्यादा मारने लगा तो वो अपने चेहरे पर पड़ी बूंदो को पसीने की तरह पोछते हुए बोली-"एक दिन आएगा, जब हम साथ होंगे। इसी घर में। एक अच्छे प्रेमी-प्रेमिका से एक कदम आगे बढ़ कर पति-पत्नी के रुप में। और गर्मियों में जब दोबारा बारिशें होंगी तो मैं यहाँ कुर्सी डाल कर बैठूंगी। झटास खाने।" बाल्कनी के एक कोने में कुर्सी डालने की जगह दिखा कर वो दो कदम पीछे हटी और मुस्कुराने लगी।
ऐसी बातों से कौन नहीं रीझता? मैं भी रीझ गया। और इस बार मैंने उसके गालों को चूम लिया था। हौले से। कि उसकी ख़ुशी देखने लायक थी।
जैसे फुदके बने-बसन्त
और शायद मैंने उन्ही दिनों को याद करके यह नज़्म लिखी हो?
कि....
मेरे दिल तक पहुँचने का
बस एक ही रास्ता है...
किसी बरसात की रात
तुम झटास* बनकर आना...
इस दौरान माँ ने मुझे पचासों फोन किये थे। मेसेज भी। कि कहाँ हो, पहुँचे क्यों नहीं? खाना ठंडा हो रहा है, आदि-आदि। पर मुझे उस दिन फुरसत नहीं थी। दिन भर की मौज-ठिठोली के बाद रात हमने साथ गुजारे। होटल में। और इसी दौरान मैंने माँ से कह दिया-"आपकी बहू आयी है। दिल्ली। बिना बताये। सो आज के लिए माफी चाहता हूँ।" माँ थीं। क्या कहतीं? माफ़ करना पड़ा। दिल में चोट लगी होगी, मैं समझ सकता हूँ। पर पत्थर दिल नहीं होती माँ। इस बात का हम लड़के कुछ ज्यादा ही फायदा उठाते हैं। माँ ने कहा-"वो मिलना चाहती हैं। श्यामली दो से। मैंने हामी भर दी। उससे बिना पूछे। लेकिन...
सुबह श्यामली जल्दी उठ गयी। फ्लाइट थी उसकी। मुझे भी उठाकर वो बोली-"चलो! रास्ते में साथ ही चाय हो जाएगी।" मैंने कहा-"आज माँ तुमसे मिलना चाहती है। मिलोगी?" वो कुछ पल ठहर कर बोली-"नहीं! आज मीटिंग है। फिर कभी।" मैंने कहा-"मीटिंग कैंसल कर दो? क्या फ़रक पड़ता है?" वो नहीं मानी। लौट पड़ीं।
उस दिन माँ बहुत गुस्से में थीं। उन्हें लगा, अब उनकी अहमियत खतम हो गयी है। जबकि ऐसा नहीं था।
पछिया फिर चली थी। लेकिन इस बार वो मनोरंजक नहीं, हानिकारक साबित हो रही थी। उन दिनों मैं एक बड़ी बीमारी से जूझ रहा था। कि एक दिन श्यामली दो का फोन आया। वो बोली-"उसी अपार्टमेन्ट में खड़ी हूँ। आज गृहप्रवेश है। क्या अपार्टमेन्ट का मालिक नहीं आयेगा?"
और मैं उससे हजारों किलोमीटर दूर अस्पताल के एक सिंगल बेड पर पड़ा यह सोच रहा था, कि ये किस्मत बड़ी कम्बख्त चीज़ है। सबकुछ होते हुए भी पास कुछ भी नहीं रहने देती। कुछ भी नहीं। कि "प्यार जहाँ पूरा नहीं होता, अमरता की ओर बढ़ जाता है।"

