शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

"प्यार जहाँ पूरा नहीं होता, अमरता की ओर बढ़ जाता है।"


मौसम गरमी का था और हम दिल्ली में थे। बाराखंभा से मेरे डेरे की दूरी इतनी मामूली थी, कि आदमी आराम से पानी-बतासे खाते और चहल कदमी करते घर पहुँच जाए। उन्हीं दिनों मेरी एक मुँहबोली माँ जो उन दिनों दिल्ली में मेरी सबसे अजीज हुआ करती थी, ने उस दिन दोपहर मुझे भोजन पर बुलाया था। मुझे याद है, कि उस दिन मैं ऑफिस से जल्दी निकल गया था। दोपहर के तकरीबन दो बजे। बहुत अधिक थका न होने के बावजूद मैंने रिक्शा ले ली थी। क्योंकि खाने पर मेरी फ़ेवरेट डिशेष मेरा इंतज़ार कर रही थी। मेरे लिए वो दिन ऐतिहासिक था। मैंने ऐतिहासिक क्यों कहा, पूछने पर शायद उस दिन नहीं बता पाता। लेकिन आज बता सकता हूँ। 

हुआ यूँ, कि उस दिन ऑफिस से निकल रिक्शे पर बैठते ही मेरा फोन बजने लगा। स्क्रीन पर श्यामली दो का नम्बर देख मैंने फोन पिक कर ली। उधर से साँय-साँय की आवाज के बीच श्यामली दो चहकती हुई बोली-"आज दिल्ली में हूँ; तुम्हारे ऑफिस आ रही हूँ।" 

मैं चौंका, कि औरंगाबाद की अल्हड़ दिल्ली में कैसे? सो पूछ बैठा-"न डाक, न तार, न टेलीफोन; तुम दिल्ली कब पहुंची?" 

जवाब में आधे मिनट का मौन आया। लेकिन मैं साफ़-साफ़ महसूस कर रहा था, कि वो खीझी है। आदमी सैकड़ो किलोमीटर तय करके आपसे मिलने पहुँचे और आप इस तरह के सवाल करें तो खीझना लाजिमी भी है। वो बोली-"कहो तो बैरंग डाक की तरह लौट पडूँ?" 

मैंने उसे बताया कि मैं ऑफिस में नहीं हूँ। बल्कि खाने के लिए माँ के पास जा रहा हूँ। सुनकर वो व्यंग्यात्मक रुप से मुस्कुरायीं और जरा धीमे स्वर में बोली-"मैंने वापसी की फ्लाइट कैंसल कर दी और महाशय को माँ के हाथ से खाना खाने जाना है। वाह जी... मेरी तो कोई परवाह ही नहीं है।" 

"अरे नहीं-नहीं! ऐसी बात नहीं है। बताओ कहाँ आऊँ?" उसे नाराज न करने की गरज़ से मैंने लगभग तुरंत उत्तर दिया। 

"कहीं नहीं! जहाँ हो वहीं रहो। मैं आ रही हूँ तुम्हे लेने।" बोल कर वो इधर-उधर की बातें करने लगीं। 

आईजीआई रोड से बाराखंभा की दूरी बस पंद्रह मिनट तो है। सो मुझे पंद्रह मिनट इंतज़ार करना पड़ा। उसके बाद हम इकट्ठे डाबड़ी में एक फ्लैट देखने निकल पड़े। उसी टैक्सी से। 

बिल्डर हमें फ्लैट के कोने-कोने से वाकिफ़ करा ही रहा था, कि आसमान में क्या ही घने और काले बादलों ने अपना डेरा जमा लिया। आमतौर पर दिल्ली में काले बादलों के दर्शन दुर्लभ कहे जाते हैं। थोड़ी ही देर में पछिया के झोंकों के साथ बारिश भी होने लगी। बाल्कनी में जब झटास हद से ज्यादा मारने लगा तो वो अपने चेहरे पर पड़ी बूंदो को पसीने की तरह पोछते हुए बोली-"एक दिन आएगा, जब हम साथ होंगे। इसी घर में। एक अच्छे प्रेमी-प्रेमिका से एक कदम आगे बढ़ कर पति-पत्नी के रुप में। और गर्मियों में जब दोबारा बारिशें होंगी तो मैं यहाँ कुर्सी डाल कर बैठूंगी। झटास खाने।" बाल्कनी के एक कोने में कुर्सी डालने की जगह दिखा कर वो दो कदम पीछे हटी और मुस्कुराने लगी। 

ऐसी बातों से कौन नहीं रीझता? मैं भी रीझ गया। और इस बार मैंने उसके गालों को चूम लिया था। हौले से। कि उसकी ख़ुशी देखने लायक थी।

बुलबुल मस्त बहारों की 

जैसे फुदके बने-बसन्त 

और शायद मैंने उन्ही दिनों को याद करके यह नज़्म लिखी हो? 

कि....

मेरे दिल तक पहुँचने का 

बस एक ही रास्ता है... 

किसी बरसात की रात 

तुम झटास* बनकर आना... 

इस दौरान माँ ने मुझे पचासों फोन किये थे। मेसेज भी। कि कहाँ हो, पहुँचे क्यों नहीं? खाना ठंडा हो रहा है, आदि-आदि। पर मुझे उस दिन फुरसत नहीं थी। दिन भर की मौज-ठिठोली के बाद रात हमने साथ गुजारे। होटल में। और इसी दौरान मैंने माँ से कह दिया-"आपकी बहू आयी है। दिल्ली। बिना बताये। सो आज के लिए माफी चाहता हूँ।" माँ थीं। क्या कहतीं? माफ़ करना पड़ा। दिल में चोट लगी होगी, मैं समझ सकता हूँ। पर पत्थर दिल नहीं होती माँ। इस बात का हम लड़के कुछ ज्यादा ही फायदा उठाते हैं। माँ ने कहा-"वो मिलना चाहती हैं। श्यामली दो से। मैंने हामी भर दी। उससे बिना पूछे। लेकिन... 

सुबह श्यामली जल्दी उठ गयी। फ्लाइट थी उसकी। मुझे भी उठाकर वो बोली-"चलो! रास्ते में साथ ही चाय हो जाएगी।" मैंने कहा-"आज माँ तुमसे मिलना चाहती है। मिलोगी?" वो कुछ पल ठहर कर बोली-"नहीं! आज मीटिंग है। फिर कभी।" मैंने कहा-"मीटिंग कैंसल कर दो? क्या फ़रक पड़ता है?" वो नहीं मानी। लौट पड़ीं। 

उस दिन माँ बहुत गुस्से में थीं। उन्हें लगा, अब उनकी अहमियत खतम हो गयी है। जबकि ऐसा नहीं था। 


पछिया फिर चली थी। लेकिन इस बार वो मनोरंजक नहीं, हानिकारक साबित हो रही थी। उन दिनों मैं एक बड़ी बीमारी से जूझ रहा था। कि एक दिन श्यामली दो का फोन आया। वो बोली-"उसी अपार्टमेन्ट में खड़ी हूँ। आज गृहप्रवेश है। क्या अपार्टमेन्ट का मालिक नहीं आयेगा?" 


और मैं उससे हजारों किलोमीटर दूर अस्पताल के एक सिंगल बेड पर पड़ा यह सोच रहा था, कि ये किस्मत बड़ी कम्बख्त चीज़ है। सबकुछ होते हुए भी पास कुछ भी नहीं रहने देती। कुछ भी नहीं। कि "प्यार जहाँ पूरा नहीं होता, अमरता की ओर बढ़ जाता है।"


*(झटास:- बारिश की वो नन्ही बूँदें, जो खुली खिड़की के रास्ते तेज हवाओं के संग भीतर आती हैं।) 


गुरुवार, 5 सितंबर 2024

"कजरा मोहब्बत वाला अँखियों में ऐसा डाला


चाँदनी रात थी। हर तरफ उजियासी फैली। चाँद के आस-पास ढेर सारे तारे टिमटिमा रहे थे। लग रहा था, जैसे सभी तारे मिलकर चाँद को छेड़ रहे हों और चाँद मारे शर्म के लाल हुई जा रही हो। 

मैं बारहवीं में था। अंतिम साल के चंद दिन बचे थे। और उस रात हम चार दोस्त गप्पे लड़ा रहे थे। बात बे-बात पाँच रुपए में खरीदी गयी शायरी की एक किताब को पढ़कर मैं सभी को शायरी भी सुनाता जा रहा था। शायरी किसकी थी, यह मैं न जानता था। बस जानता था, तो शायरी में छुपी गहरायी। जैसे एक शायरी थी- 

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

उम्र ही इतनी अल्हड़पन से भरी थी, कि क्या कहूँ। मैं मतलब नहीं जानता था। बस जानता था तो यह, कि कोई महबूब होती है। जिससे प्यार किया जाता है। लेकिन बस सोचता। उस रात से पहले तक। क्योंकि उस रात मेरे दोस्तों ने वो बात कही, जिसे आज तक मैं न कह सका। 

एक ने कहा, यार! एक बात बता, वो तुम्हे इतनी पसंद करती है, तेरे आसपास रहती है। तुमसे बात करने का एक बहाना ढूंढती है। वो नही कहती पर तुम तो उसे अपने दिल की बात कह सकते हो? 

मैंने कहा, कह तो दूँगा। लेकिन मुझे डर है कि वो मुझे छोड़ देगी। जाने मुझसे प्यार करती भी है या नहीं। 

सबने एक स्वर मे कहा, तू बोल तो सही। हमलोग हैं ना? नहीं छोडेगी यार। पक्का नही छोडेगी। 

मैं टाल गया। बारहवीं खतम हो गयी। दोस्त बिछड़ गये। किसी ने बगल वाले कॉलेज मे एडमिशन ली। कोई कलकत्ता चला गया। और वो भी चली गयी... जिसे खोने के डर से मैं वो न कह सका, जिसका अफसोस मुझे आज भी है। 

वो जहां गयी, वो शहर कलकत्ता था। सिटी ऑफ जॉय। ऐसे शहर में किसी को किसी से प्यार न हो, आप इसका दावा नही कर सकते। तब भी, जब आपको किसी से प्यार हो। 

वो भी प्यार में पड़ गयी। मैं नही जानता कौन था वो जादूगर। या कि है। पर सोचता हूँ तो दुखता है कुछ भीतर। दुखता है तो सिगरेट जला लेता हूँ। सिगरेट से भी राहत न हो तो शराब की इज्जत पर हाथ डाल देता हूँ। नेपथ्य में चित्रा साथ देती है। अपने कमाल के सुरों के साथ। और दिन बारिशों के हों तो क्या कहने। बारिश, शराब और चित्रा। बडा खतरनाक कॉम्बीनेशन होता है। कि कमबख्त ये शराब भी कहती होगी- बेवडों ने पटका मुझे नाली पर, और दिलजलों ने कव्वाली पर। 


वो घर लौटती है। कभी-कभी। सालों बाद। ज्यादा दिन नही रुकती। बस दो-एक दिन। और लौट जाती है। उसे देखता हूँ तो दिल से एक आह् निकलती है। लेकिन उसे टोकता नहीं। वो भी देखकर ऐसे अनदेखा करती है जैसे सामने मैं हूँ ही नहीं। हूँ? कि नहीं? 


आज अट्ठारह साल हो गये उससे आखिरी बार बात किए। बुधवार का वो अंतिम स्कूल दिन। बस यही कह पाया था- फिर मिलेंगे। 


उसके बाद मैंने शहर छोड़ दी। एक बड़े शहर के बड़े कॉलेज में दाखिला लिया। इस उम्मीद में कि बडा अफसर बनूँगा। फिर उससे मिलकर सबकुछ बताऊँगा। और सीधे कहूँगा- हमसे शादी करोगी? 


सच कहूँ तो कॉलेज के दिनों ही असली जिंदगी से उठा-पटक शुरु हुई। आटे-दाल का भाव पता चला। फिर नौकरी मिली तो मालूम हुआ घरवालों की इच्छा भी कोई चीज होती है। बाहर बिरादरी में शादी नही कर सकते। शादी क्या, इसके बारे मे सोचना ही पाप था। तो हम यह पाप कैसे करते। नही कर पाए। सच कहूँ तो हौसला ही नही हुआ। इस कदर टूटा हौसला कि किसी से शादी ही न कर सका। चार कुटुंब आए। नमकीन-कचौरियां ठूंसी। कलम दवात की तमाम जानकारियों के बाद तनखा के उपर की कमाई पूछी। और तमाम की तमाम नौटंकियों के बाद सगाई तय हुई पर मैंने इंकार कर दिया। कई बार। लगा, वो लौटेगी। कहेगी आई लव यू। भटक गयी थी मैं। पर अब लौट आयी हूँ। जानते हैं? मैं सबको कहता फिरता हूँ, जाने वाले लौटा नही करते। पता नही क्यूँ खुद के दिल को यह आज तक समझा नही पाया। अब तो मान ले यार इतने दिनों की कोई पढ़ाई कोई कोर्स नहीं होता? पहले सोचता था सिविल सर्विसेस की तैयारी करती होगी। अब तो उसकी उम्र भी 35 के आसपास हो चली है। क्या इतने सालों में वो छः अटेम्पट नही कर पायी होगी? यह भी तो संभव है कि वो उधर ही ब्याह करके उधर ही बस गयी हो? हाँ यह संभव है। एकदम संभव है। और ऐसा ही हुआ भी है। कि उसके जिस्म के एक एक अंग इसकी गवाही दे रहे हैं, कि वह अब कुंवारी नही रही। वह अब कुंवारी नही रही।


सफ़ेद फूल

सफ़ेद फूल शान्ति के प्रतीक माने जाते हैं। शान्ति के दिनों के प्रतीक माने जाते हैं। किन्तु इन सफ़ेद फूलों को सबसे अधिक दुख़द दिनों में ही याद...