शनिवार, 7 जुलाई 2018

किस्मत में जो है लिखा. उसे कोई नहीं टाल सका।

जाने कितने ही दिनों बाद मिला उससे। दक्षिण के किसी गुमनाम शहर के एक छोटे से बैंक में। बतौर फील्ड ऑफिसर तबादला लिया था उसने वहाँ। वही अदा, वही मुस्कान, वही तन्यमता और कानों में वही बड़े-बड़े झूमके। मगर रुप और रंग थोड़े और निखरे-निखरे से थे। कि शायद वैवाहिक जीवन का असर रहा हो। सच कहूँ तो प्यासे को पानी देख कर उतनी खुशी न हुई होगी, जितनी खुशी उसे देख कर मुझे हुई। उसे देखते ही, मैं अपने पुराने दिनों में कहीं खो-सा गया।  मैं उससे तब बिछड़ा था; जब लंग कैंसर नामक साक्षात मृत्युदेव मेरे सर पर विराजमान थे। और वो थी, कि सबकुछ जानने के बावजूद मुझसे विवाह करने के लिए उतावली हुई जा रही थी। मगर कहते हैं न; किस्मत में जो लिखा है उसे कोई नहीं टाल सका है। सो मैं भी न टाल सका।  मुझे पता चला, कि लंग कैंसर के रोगी के चांसेस ⅛ होते हैं। एक बटे आठ... हाह! महज़।  मैं जानता था, कि इस भवसागर में मैं चंद दिनों का मेहमान हूँ; सो गरज करके, जोर डालते हुए मैंने उसे कहीं और विवाह करने को मजबूर कर दिया। और वो चली गयी। रोती, कलपती, सचमुच। दूर। बहुत दूर। सबकुछ छोड़कर। सोशल मिडिया में नाम मिटाने से लेकर नंबर्स तक बदल कर। रह गयी तो उसकी यादें। चाहतें। किस्से। और वो अंतिम वाक्य... जो उसने जाते-जाते कहे थे।-“तुम मुझे बहुत ढूँढोगे; पुकारोगे, पर मैं कभी नहीं लौटूँगी। देख लेना तुम।"  और मैं ज़िन्दगी में वापस न केवल लौटा; बल्कि मौत को छकाकर लौटा। उसी के सरजमीं पर पटखनी देकर लौटा। जीत कर लौटा और उसे ढूँढ़ते हुए लौटा। उससे मिलने की शिद्दत और बेचैन मन उसे ढूँढ़ते हुए मुझे दक्षिण ले गयी। वहाँ; जहाँ उसके होने का अनुमान था। और अनुमान सही निकला। कि मैं देख रहा था उसे। एकटक। बैंक के कार्यों में तल्लीनता से रमी हुई। उसने भी मुझे देखा। नहीं देखा। या शायद देखकर इग्नोर कर गयी। कौन जाने। मुझे लगा; मैं उसे टोकूँ। कहूँ-“अरे मिस्टी! मैं हूँ। मैं.. तुम्हारा...!" (जाने ही कौन) :-) लेकिन उसके माथे पर चमकती सिंदूर की एक छोटी-सी लकीर और गले में लटकते सोने के मंगलसूत्र ने मेरे अंतर्मन में उमड़ते तमाम शब्दों को लगभग मन के भीतर ही कहीं बाँध-से दिये। यूँ, कि मैं मूक बना रहा। एकदम मूक। बोका। वो सिन्दूर दरअसल इशारा कर रही थी, कि अब वो किसी की धर्मपत्नी है। किसी की बहू है। और किसी दहलीज़ की इज्जत है।  खैर... मेरी तेईस सौ किलोमीटर की यात्रा मेरी सबसे बड़ी सजा साबित होने जा रही थी। कि बेवफा इग्नोर करे तो उतनी नहीं दुखती; जितनी किसी को देवता बनाकर चाहने के बाद इग्नोर करने पर दुखती है।  लौटते हुए मैं सोच रहा था, काश... यह धरती फट जाती, और मैं...  मैं उसमें समा जाता।  ~संजीव 

बेशर्म सरकार के बेशर्म कारिन्दे

हूल जोहार!

कभी इर्तिजा निशाद साहब ने सरकार और सरकारी महकमों के लिए यह शेर अर्ज किया था-

कुर्सी है यह, तुम्हारा जनाजा तो नहीं है 
कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते 

फिलहाल मैं इस शेर को हमारे झारखंड के गोड्डा जिले में स्थित भू-अर्जन के अधिकारियों-पदाधिकारियों के लिए कहूँ तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। दुर्भाग्य है झारखंड राज्य का। दुर्भाग्य है गोड्डा जिले का। दुर्भाग्य है बिरसा मुंडा के आबोहवा के धरती का। कि आज यहाँ के किसानों की हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। एक छोटे से मसले पर भी यहाँ के निठल्ले सरकार की निठल्ली कार्रवाई होती है। तिस पर शासन-प्रशासन के अधिकारीगण भी निठल्ले साबित होते हैं। यानि कोढ़ और कोढ़ के ऊपर खाज वाली बात हो जाती है। मैं संजीव, उन लोगों के लिए बोलता हूँ जो बोल नहीं सकते। मैं उन लोगों के लिए लड़ता हूँ जो अपनी लड़ाई किसी कारणवश लड़ नहीं सकते। कुछ अपंगता के कारण। कुछ अनुभवहीनता के कारण। कुछ भय के कारण तो कुछ अज्ञानता के कारण। आप सबको जानकारी के लिए बता दूँ, कि 07/10/2017 को मैंने भू-अर्जन गोड्डा के पदाधिकारियों सहित डिप्टी कलेक्टर, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव झारखंड के अलावे रेलवे मुख्यालय के तमाम पदाधिकारीगणों (लैंड एण्ड एक्ट) को एक ईमेल भेजी थी, कि कैसे यहाँ के भू-अर्जन अधिकारीगण अपने सुस्त रवैये से किसानों को तंग कर रहे हैं। (स्क्रीनशॉट में देखें।) 

घूस लेने के लिए कभी उनसे टैक्स जमा करने को कहा जाता था तो कभी सक्सेशन सर्टिफिकेट। जबकि पूरे मामले को समझने के बाद मुझे पता चला, कि यह किसानों को परेशान करने की एक विधि भर है। सो मैंने आनन-फानन में रेलवे मुख्यालय को (सभी अधिकारियों के नम्बर सहित) इसकी जानकारी दी। नीचे पढ़ें। 
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गणमान्य ध्यान दें!
मैं सभी अधिकारियों सहित भू-अर्जन कार्यालय गोड्डा से अपील करता हूँ, कि वे रेलवे भूमि अधिग्रहण के किसान भुक्तभोगियों को अविलंब मुआवजा मुहैया करायें। पिछले दिनों ख़बर मिली है, कि वो किसान भाई जिनकी जमीनें रेलवे के अधीन जा रही है और भू-अर्जन द्वारा घोषित एवार्डी की अचानक मृत्यु हो जाती है तो उनके स्थान पर उनके बेटों से कोर्ट द्वारा जारी सक्सेशन सर्टिफिकेट (उत्तराधिकारी प्रमाण-पत्र) की मांग की जा रही है। जिसे बनवाने में बकायदा एक वर्ष से अधिक का समय लगता है और कोर्ट फीस के नाम पर अधिग्रहित भूमि के मुआवजा राशि का साढ़े पांच प्रतिशत हिस्सा कोर्ट में जमा करने को कहा जाता है। जबकि किसान भाईयों द्वारा तहसील स्तर पर उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र भू-अर्जन को मुहैया करायी जा रही है। तहसील स्तर का उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र लेने करने में भी किसान भाईयों को हद दर्जे की परेशानी का सामना करना पड़ता है। कोर्ट एफिडेविट, मुखिया का हस्ताक्षर, दस गणमान्य गवाहों का हस्ताक्षर मुहैया कराने के बाद तहसीलदार साहब विवाद निपटारा हेतु अधिसूचना जारी करते हैं। जिसकी कॉपी बकायदा नोटिस बोर्ड तक में चिपकायी जाती है और समय दिया जाता है, कि यदि किसी को इस उत्तराधिकारी प्रमाण-पत्र से समस्या हो अथवा विवाद हो तो दिये गये तारीखों के दरम्यान तहसीलदार के समक्ष अपना पक्ष रखें। जब कोई विवाद प्राप्त नहीं होता, तब जाकर उन्हे उत्तराधिकारी प्रमाण-पत्र मुहैया करायी जाती है। फिर भी आप उस प्रमाण-पत्र को तवज्जो नहीं देते हैं तो यह आश्चर्य की बात है। 
मैं पुछना चाहता हूँ अधिकारियों से, जो किसान कल क्या खायेंगे की सोच से परेशान है। वो कोर्ट फी के रुप में लाखों रुपये कहाँ से जमा करेंगे? यदि किसी किसान भाई को दस लाख की मुआवजा राशि मिलनी है तो उसका कोर्ट फी पचास से पचपन हजार का हो जाता है। वकील खर्च; दौड़-धूप और समय की बरबादी अलग से। कहाँ से लायेंगे ये गरीब किसान पचास हजार? क्या उनकी दीन-हीनता आप लोगों से छुपी है? आये दिन किसानों के परिवार का सामूहिक आत्मदाह कर लेने पर भी आप शर्मसार नहीं होते? क्यों आप लोगों को सताने के लिए सदियों से किसान ही मिलते आये हैं? क्यों आप सरकार द्वारा जारी एक चिट्ठी को दिखाकर अपने कर्तव्यों से पल्ला झाड़ लेते हैं? क्या आपलोगों को मालूम नहीं, कि सक्सेशन चल संपत्तियों के लिए होते हैं? वो भी तब, जब वारिसान में उत्तराधिकारी का जिक्र न हो। अचल संपत्तियों में बकायदा लैटर ऑफ एडमिनिस्ट्रैशन (Latter of administration) की मांग की जाती है। वो भी तब, जब रैयत में उनका नाम न हो। जब वो सुस्पष्ट दर्शा रहे हैं कि वो वैध रैयत हैं, फिर भी आप सरकार द्वारा जारी एक चिट्ठी पर अटके पड़े हैं? क्या नैतिकता कोई मायने नहीं रखती?  जब आप भी जान रहे हैं, कि जमीनें न तो विवादित है और न ही गैर रैयती। फिर भी सरकार द्वारा जारी चिट्ठी को पकड़ कर बैठे हैं। मानों वो सरकार नहीं, सवारी है। जिसके हाथ में लाठी से बंधी चिट्ठी नामक गाजर है। जो गधे के मुंह के सामने लटक रहा है। जिसे देखकर गधा उसे खाने के लिए आगे बढ़ता है और उसी जूनून में वो चलता ही जाता है। आगे बढ़ता ही जाता है। 
लेकिन आप तो इंसान हैं? आपको मालूम है कि क्या सही है और क्या गलत। बावजूद इसके आप मौन हैं? अधिकारी के तौर पर आप बंधे हो सकते है, इंसानी तौर पर बंधे नहीं होंगे? पुछिये उन हुक्मरानों से। सवाल कीजिए उनसे, जिन्होने चिट्ठी जारी की है। वगरना सरकारें बहुत चिट्ठी जारी करती है। जिसमें मुख्य “सत्यमेव जयते" नामक चिट्ठी होती है। जो हर सरकारी कार्यालयों में शोभा की वस्तु है। वैसे जानते तो आप भी होंगे, कि सत्यमेव जयते का कितना पालन किया जाता है। मैं नहीं कहता आप भ्रष्ट होंगे। लेकिन सरकार द्वारा किये जा रहे अन्यायों पर सवाल करना भी आपका काम है। नैतिकता है। क्योंकि इंसानियत और नैतिकता से बड़ा इस दुनिया में कुछ भी नहीं। 
वगरना कल के अख़बार में एक और किसान परिवार के सामूहिक आत्महत्या की खबर पढ़ते हुए कहेंगे; च्च.. च्च.. च्च.. इस देश में किसानों की स्थिति कभी नहीं सुधरेगी। आशा करता हूँ, आप सत्यमेव-जयते के राह पर चलते हुए अतिशीघ्र कार्रवाई करेंगे। और दर-दर भटक रहे किसान भाईयों को न्याय दिलवायेंगे। 
जय हिन्द जय भारत 
वन्दे मातरम्

~संजीव
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इस मेल के करीब-करीब एक साल बाद रेलवे अधिकारियों ने यह नियम लागू कर दिया, कि रेलवे से पचास लाख रुपये तक का मुआवजा पाने वाले किसानों को तहसील स्तर के सक्सेशन की जरूरत पड़ेगी। (जिसकी मान्यता पहले दस लाख से नीचे तक थी।) उससे ऊपर मुआवजा पाने वालों को कोर्ट फीस जमा करनी ही होगी। क्योंकि यह भू-एक्ट 1994/13/14/15 का एक नियम है। एक कानून है। मगर यह नियम बनाने से पहले भू-अर्जन कार्यालय गोड्डा में एक बड़ा बदलाव कर दिया गया था। सारे अधिकारी ट्रांसफर हो गये थे। कुछ को घूस लेने के आरोप में डिमोसन भी कर दिया गया था। इसके लिए डिप्टी कलेक्टर साहब को शुक्रिया कहना तो बनता था। मगर घूसखोरों को बर्खास्त न करने पर मैंने चुप्पी ही साधे रखी। अब जबकि पचास लाख रुपये तक का मुआवजा पाने वाले किसानों को तहसील स्तर के सक्सेशन पर अनुमति दे दी गयी है, बावजूद इसके भू-अर्जन के अधिकारीगण अपनी बेशर्मी दिखाने से बाज नहीं आ रहे हैं। ये अब किसानो को जाँच-प्रतिवेदन के नाम पर घुमा रहे हैं। वो जाँच प्रतिवेदन, जो विभिन्न तहसील के कर्मचारियों ने दो साल पहले ही तैयार करके भू-अर्जन को सौंप दिया था। इस बाबत जब मैंने भू-अर्जन के DLAO से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने मुझसे बात करने में रुचि ही नहीं दिखलायी। (शायद रुष्ट हो कर।) यहाँ तक, कि सामने जाने पर काम का बहाना करके वो कार्यालय से भाग खड़े हुए। 
साहब; यूँ भागकर या चुप्पी साध कर आप कब तक छिपेंगे? याद रखिए, दुआओं से अधिक ताक़त बददुआओं में होती है। इनकी हाय मत लीजिए। वरना याद रखिएगा; अभी एक संजीव है। कल ऐसा न हो कि समूचा झारखंड संजीव बन जाए। अगर ऐसा हुआ तो यकीन मानिए; आप सबको अपनी कुर्सी बचाने का भी समय नहीं मिलेगा। भगवान बिरसा मुंडा की कसम

नोट:- लेखक अभद्र भाषा, धमकी, शारीरिक या किसी भी अन्य हिंसा का सख्ती से विरोध करता है।

सफ़ेद फूल

सफ़ेद फूल शान्ति के प्रतीक माने जाते हैं। शान्ति के दिनों के प्रतीक माने जाते हैं। किन्तु इन सफ़ेद फूलों को सबसे अधिक दुख़द दिनों में ही याद...