जाने कितने ही दिनों बाद मिला उससे। दक्षिण के किसी गुमनाम शहर के एक छोटे से बैंक में। बतौर फील्ड ऑफिसर तबादला लिया था उसने वहाँ। वही अदा, वही मुस्कान, वही तन्यमता और कानों में वही बड़े-बड़े झूमके। मगर रुप और रंग थोड़े और निखरे-निखरे से थे। कि शायद वैवाहिक जीवन का असर रहा हो। सच कहूँ तो प्यासे को पानी देख कर उतनी खुशी न हुई होगी, जितनी खुशी उसे देख कर मुझे हुई। उसे देखते ही, मैं अपने पुराने दिनों में कहीं खो-सा गया। मैं उससे तब बिछड़ा था; जब लंग कैंसर नामक साक्षात मृत्युदेव मेरे सर पर विराजमान थे। और वो थी, कि सबकुछ जानने के बावजूद मुझसे विवाह करने के लिए उतावली हुई जा रही थी। मगर कहते हैं न; किस्मत में जो लिखा है उसे कोई नहीं टाल सका है। सो मैं भी न टाल सका। मुझे पता चला, कि लंग कैंसर के रोगी के चांसेस ⅛ होते हैं। एक बटे आठ... हाह! महज़। मैं जानता था, कि इस भवसागर में मैं चंद दिनों का मेहमान हूँ; सो गरज करके, जोर डालते हुए मैंने उसे कहीं और विवाह करने को मजबूर कर दिया। और वो चली गयी। रोती, कलपती, सचमुच। दूर। बहुत दूर। सबकुछ छोड़कर। सोशल मिडिया में नाम मिटाने से लेकर नंबर्स तक बदल कर। रह गयी तो उसकी यादें। चाहतें। किस्से। और वो अंतिम वाक्य... जो उसने जाते-जाते कहे थे।-“तुम मुझे बहुत ढूँढोगे; पुकारोगे, पर मैं कभी नहीं लौटूँगी। देख लेना तुम।" और मैं ज़िन्दगी में वापस न केवल लौटा; बल्कि मौत को छकाकर लौटा। उसी के सरजमीं पर पटखनी देकर लौटा। जीत कर लौटा और उसे ढूँढ़ते हुए लौटा। उससे मिलने की शिद्दत और बेचैन मन उसे ढूँढ़ते हुए मुझे दक्षिण ले गयी। वहाँ; जहाँ उसके होने का अनुमान था। और अनुमान सही निकला। कि मैं देख रहा था उसे। एकटक। बैंक के कार्यों में तल्लीनता से रमी हुई। उसने भी मुझे देखा। नहीं देखा। या शायद देखकर इग्नोर कर गयी। कौन जाने। मुझे लगा; मैं उसे टोकूँ। कहूँ-“अरे मिस्टी! मैं हूँ। मैं.. तुम्हारा...!" (जाने ही कौन) :-) लेकिन उसके माथे पर चमकती सिंदूर की एक छोटी-सी लकीर और गले में लटकते सोने के मंगलसूत्र ने मेरे अंतर्मन में उमड़ते तमाम शब्दों को लगभग मन के भीतर ही कहीं बाँध-से दिये। यूँ, कि मैं मूक बना रहा। एकदम मूक। बोका। वो सिन्दूर दरअसल इशारा कर रही थी, कि अब वो किसी की धर्मपत्नी है। किसी की बहू है। और किसी दहलीज़ की इज्जत है। खैर... मेरी तेईस सौ किलोमीटर की यात्रा मेरी सबसे बड़ी सजा साबित होने जा रही थी। कि बेवफा इग्नोर करे तो उतनी नहीं दुखती; जितनी किसी को देवता बनाकर चाहने के बाद इग्नोर करने पर दुखती है। लौटते हुए मैं सोच रहा था, काश... यह धरती फट जाती, और मैं... मैं उसमें समा जाता। ~संजीव

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें