गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025

सफ़ेद फूल




सफ़ेद फूल शान्ति के प्रतीक माने जाते हैं। शान्ति के दिनों के प्रतीक माने जाते हैं। किन्तु इन सफ़ेद फूलों को सबसे अधिक दुख़द दिनों में ही याद किया जाता है। श्यामली होतीं, तो शायद मेरी बातों के हाँ में हाँ मिलातीं। कि यही सबसे दुख़द दिन हैं इन दिनों। दुख़ती नसों में नमक घोलने के दिन हैं ये। और इन्हीं दिनों मुझे श्यामली की यादें टीसती हैं। कि ठीक इन्हीं दिनों सदाबहार भी खूब खिलखिलाते हैं। दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची से लगते हैं। या एक-दूसरे के पूरक। दुःख और शान्ति। शान्ति और दुःख। कि बिना दुःख शान्ति नहीं, न शान्ति है सुख़ के दिनों। कि सुख़ और शान्ति साथ नहीं रह सकतीं। जैसे नहीं रह सकते साथ दरिया के दो किनारे। धरती और अम्बर। क्षितिज और विकेन्द्र। वैसे ही, जैसे नहीं रह सकते साथ सैंय्याँ और सावन। वसन्त और बिरहा। मुस्कान और मौत। 

कभी-कभी सोचता हूँ; तुम्हें सफ़ेद फूलों से इतना प्रेम क्यों था? क्यों था इतना लगाव? फूलों की तासीर कब बदलती है जानां?



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