रविवार, 31 मई 2020

महबूबा मुंबई।


कहते हैं; दिल्ली अगर दिलरुबा है, तो मुंबई महबूबा। और शायद यही वजह है, कि मुझे महबूबा मुंबई से बेहद प्रेम है। इसके खुलेपन से मैं बेइंतहाँ जुड़ाव महसूस करता हूँ। जब भी मुझे इस शहर की याद आती है; मैं अपने दोस्तों से फोन पर शहर के बारिशों की आवाजें सुनाने को कहता हूँ। बारिशों के दौर में समंदर की लहरें जब मचलती हैं, तो वे कहते हैं-“देखो! समंदर की लहरें बुला रही हैं। तुम्हें गले लगाने को उमड़ रही हैं। देखो। क्या तुम समंदर को घुमड़ते हुए देख पा रहे हो? और मैं अंतर्मन में सोचने लगता हूँ- हाँ! मैं देख पा रहा हूँ। देख पा रहा हूँ, कि लहरें मुझे बुला रही हैं। सचमुच। जानते हो क्यों? क्योंकि वो जानती हैं, कि मैं उनसे कितना अधिक प्रेम करता हूँ। इतना, कि लहरों में डूबकर मैं लहरें हो जाना चाहता हूँ। 

और जब बातें मुंबई की हो रही हों, तो केवल वहाँ की बारिशें ही नहीं; वरन् जुहू बिच, चौपाटी, एलीफेन्टा केव्स, सी-लिंक और नरीमन पॉइंट में जा बैठे मन को तृप्त करते दृश्यों के क्या ही कहने। अहा! अतुलनीय नजारा होता है। और जब इनके बारे में सोचो, तो सारे दृश्य जैसे आँख़ों के आगे घुमने लगते हैं।

जागती आँख़ें भी जहाँ देखती हैं सपने 
उस अलमस्त 'शहर' को मुंबई कहते हैं।' 

अगर भूख लग आयी हो, तो मशहूर ‘खाऊ गल्ली' है ना। भीड़ू! बोले तो येईच्च है खाऊ गल्ली। इधर कुच्छ भी खाने का। शेक-वेक पीने का। टेंशन नै लेने का। 

परहैप्स! कि खाने के मामले में मुंबई, दिल्ली से कहीं सस्ती पड़ती है। यहाँ आप थोड़े से पैसों में बड़ापाव खाकर पेट भर सकते हैं। शायद इसलिए इधर एक कहावत मशहूर है- ऊपर वाला भूखा जगाता जरुर है। मगर भूखा सुलाता नहीं। 

मुझे मुंबई की गगनचुंबी अट्टालिकाएँ बेहद लुभाती हैं। हमेशा से आकर्षित भी करती रही हैं। छलाँग लगाने के लिए। लेकिन फिर सोचता हूँ; कूद जाऊँगा तो क्या होगी मेरी दैहिक-दशा? मैं खील-खील होकर बिखर जाऊँगा या जमीन को चीरता हुआ सीधा धरती के भीतर समा जाऊँगा? क्या उसके बाद लोगों की कोई प्रतिक्रिया भी होगी? या किसी अखबार के एक छोटे से कोने में महज़ एक खबर मात्र बन कर रह जाऊँगा? जिसके हेडलाईन को पढ़कर लोग च्च.. च्च..च्च.. करते हुए अपनी नजरें किसी और खबर पर स्क्रॉल कर लेंगे। शायद यही होगा। शायद नहीं; पक्का। पक्का यही होगा। क्योंकि जहाँ लोगों के पास ठीक से मरने तक का समय न हो, वहाँ किसी 'लाश' की खबर पर कौन समय बर्बाद करे? 

अल्हड़पने से लबरेज़ मुंबई पूरी तरह से रहष्यमयी शहर है। यहाँ प्रेम ही प्रेम है। रोमांस ही रोमांस है। एक हाथ को दूसरे हाथ तक की ख़बर नहीं। सब इतने ही व्यस्त। किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। कोई लेना-देना नहीं। सब गाते हुए, मुस्कुराते हुए चले जा रहे हैं। दौड़े जा रहे हैं। मानों किसी और दुनिया में विचर रहे हों। मानों किसी रहस्यमयी दुनिया में खोये हुए हों। 

जब बारिशों का दौर हो, तो मुंबई बला की ख़ूबसूरत हो जाती है। ऐसे में मन गरमा-गरम भुट्टों का आनन्द लेने नरीमन पॉइंट जा पहुँचता है। नीचे उफनती समंदर की लहरें; ऊपर खुला आकाश। तिसपर समंदर बारिश की बूँदों को यूँ गले से लगातीं हैं; मानों दोनों में बरसों से गहरा प्रेम हो। दोनों में एक चुंबकीय आकर्षण, एक आत्मीय लगाव हो। 

इस ख़ूबसूरती को देखकर जब रहा नहीं जाता, तो मन एक बोट लेकर समंदर की गहरायी में उतर पड़ता है; और नन्ही बूँदों के संग भीगते हुए बीच स्वर्ग में जा पहुँचता है। अहा! अद्भुत! मनोरम। यूँ लगता है, मानों स्वर्ग की भ्रमित कल्पनाएँ एकाएक सच हो उठी हों। जिसके एक ओर समंदर की गोद में भीगती हुई इमारतें, इठलातीं हुई, झूमती हुई अठखेलियां करती हैं। तो दूसरी ओर अथाह सागर का मायाजाल फैला हुआ है। अनन्त तक। क्षितिज को चूमती हुईं। और जब बारिशें एकाएक थम जाती हैं; तो मुंबई नगर किसी कमसिन हिरोइन की तरह कशिशें बिखेरती उच्छृंखल हो उठती हैं। उद्वेलित हो उठती है। जिसका भरपूर साथ देती हैं समंदर में नहा कर नमकीन हो चुकी बहकी-बहकी हवाएँ। 

तुम कहती हो न, 
कि तुम्हारा शहर सबसे अलहदा सबसे जुदा शहर है? 
सुनो; यदि सम्भव हो, तो इक शाम मेरे नाम कर दो ना?

#MumbaiDiaries  #CityShots #TheBlackMagic #TheCityOfLove #TheCityOfRomance

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