मंगलवार, 23 जून 2020

कहीं दूर एक मज़दूर मरता है, तब जाकर हमारी बिल्डिंगों की नीवें मज़बूत होती हैं।


हम मज़दूर लड़के, मज़दूर नहीं थे। मज़दूर हमें हमारी गरीबी ने बनाया था। वो गरीबी, जिससे हम दुखी थे। दुःख हमें श्राप में मिला था। श्राप हमें हमारी फूटी किस्मत ने दी थी। फूटी किस्मत हमें जन्म से मिला था। जन्म हमें बाबा ने दिया था। बाबा जो दुनिया के सबसे मज़बूर व्यक्ति थे। मज़बूरी जो गरीबी का दूसरा नाम था। यानी बाबा दुनिया के सबसे गरीब व्यक्ति थे।

अगर कहूँ, कि हमारे जन्म से लेकर फूटी किस्मत, फूटी किस्मत का श्राप, श्राप का दुःख, दुःख की गरीबी और गरीबी के कारण मज़दूरी हमें हमारी विरासत में मिली थी तो गलत नहीं होगा। हम मज़दूर लड़के छैनी-हथौड़ी लेकर पैदा नहीं हुए थे। हम आसमान से भी नहीं टपके थे। ना हमारा दुःख ही आसमानी था। हम यहीं पैदा हुए थे। दुख़ों की गठरी भी हमें यहीं सौंपी गयी थी। जिसे ढोते-ढोते हम मरने लगे। मरने के बाद हमारा दूसरा जन्म हुआ। और इस जन्म में हम मज़दूर कहलाये। 

हम खबरें बनते थे। बारहवीं मंज़िल से भर-भरा कर गिरते हुए। गिर कर मर जाते हुए। सड़कों पर चलते हुए। चल-चल कर मर जाते हुए। क्योंकि, बारहवीं मंज़िल से गिर कर मरते हुए और सड़क पर चल-चल कर मर जाते हुए मज़दूरों की खबरें सुनने की हमारी हैसियत नहीं थी। ना ही हमारी औकात थी, मज़दूर रह कर मरते मज़दूरों की ख़बरें सुन पाने की। 

खबरें, जो नफ़रत से भरी होती थीं। खबरें, जो हमारी नहीं होती थीं। खबरें, जो हमारे लिए नहीं होतीं थीं। पर हम खबरों के लिए होते थे। हम, खबरों में होते थे। खबरें, जो जीते-जी हमारी नहीं होती थीं। वो होती थीं, किसी पैसे वाले बिल्डर्स की। खबरें, जो हमारी होती थीं, वो हमारी ही मौत की खबरें होती थीं। खबरें हमारे लिए नहीं होती थीं, हम खबरों के लिए होते थे। 

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