पिता के नाम पर हासिल केवल वैमनस्यताएँ हैं। हम दो भाई और एक बहन थे, जब हमारी माँ गुज़र गयीं। ब्लड कैंसर था उन्हें। मुझे नहीं मालूम, किन्तु लोग कहते हैं- उन्हे बचाने के नाम पर केवल खानापूर्ति की गयी थी। माँ को गुजरे तीन वर्ष भी न बीते थे, कि बड़े भाई भी एक हादसे में चल बसे। पिता का स्नेह उन्ही से मिलता था मुझे। वह स्नेह भी जाता रहा। बड़ी बहन ब्याह दी गयी। मैं नयी माँ का नौकर हो गया। और उनकी जुबानी साँड़। गलती से कोई बात टाल देता तो भरपूर पिटायी होती। इसमें बाबूजी भी साथ देते। नयी माँ से मुझे तीन बहनें और एक छोटा भाई मिला। बाबूजी के अनुसार वो छोटा भाई नहीं, राजकुमार था। मुझे लगता था, राजकुमार का मतलब खूब अच्छा-सा नाम होता होगा। इसीलिए मैंने उसे राजकुमार ही पुकारना शुरू कर दिया। वो मुझे बहुत प्यारा लगता था। मासूम। तोतला। लेकिन जब वो बड़ा हो गया तो कहने लगा- तुम कुत्ते हो। मेरे छोड़े बिस्किट्स, चॉकलेट्स खाये हैं तुमने। सुनकर मुझे बुरा लगा। लेकिन अब मैं समझ चुका हूँ, कि राजकुमार खा-अघा कर जूठन छोड़ देने वाले को कहते हैं।
जब मैं लोगों को फादर्स डे की खुशियाँ मनाते देखता हूँ तो मन करता है; उनकी आस्तीनें नोच लूँ और कहूँ- तुम खुशनसीब हो, कि तुम्हारी माँ ज़िन्दा है। इस खुशी में तुम्हारे साथ है। जी करता है भर आये मन लिए उन पर बरसूँ और चीख-चीख कर कहूँ- सभी पिता अपने बच्चों की ऊँगलियाँ नहीं पकड़ते। कुछ बेरहमी से गला भी पकड़ते हैं। मुझे नफरत है आपसे पापा! आई हेट यू।"
लेखक के कहने पर नाम छिपाया गया है। अगर आप उनसे बातें करना चाहते हैं या उन्हें कोई सलाह देना चाहते हैं तो मेरे ई-मेल isanjeevgodda@gmail.com पर अपना संदेश छोड़ सकते हैं। संदेश उन्हें फॉरवर्ड कर दिया जायेगा।
Not all Father's are diamonds. My mom passed away when I was too little and left me with the worst abusive father.
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