रविवार, 14 जून 2020

ये प्रेम भी ना जानाँ, उफ्फ...

                                                    Pic credit: subir banarjee

याद नहीं, कि मुझे तुमसे इश्क़ कब हुआ था। याद नहीं, कि मुझे पहली बार इश्क़ कब हुआ था। प्रेम-व्रेम, इश्क़-विश्क़ उन दिनों इतने प्रचलित नहीं थे। या यूँ कहूँ, कि मुहब्बत की बातें लोग बेझिझक कह नहीं पाते थे। तो हो सकता है, मेरा तुम्हें मुस्कुराते हुए देखकर खो जाना ही इश्क़ रहा हो। चाहता तो एक अरसे से था, कि तुम्हारे माथे पर बोसा करुँ। हो सकता है, वही मेरी मुहब्बत रही हो। मुझे याद है, उन दिनों जब तुम एक दिन भी नहीं मिलती थी, तो मैं अपने रेंजर साईकिल से पैडल मारता तुम्हारे गलियों तक घूम आया करता था। तुम्हारी एक झलक देखता था, तब जाकर मुझे चैन पड़ता था। हो सकता है, तुमसे मिलना ही मेरा सुख-चैन रहा हो। 
कहते हैं; एक प्रेमी के ख़्वाब में कभी कुछ पूरा नही पड़ता। जाने ही क्यूँ। परन्तु मुझे लगता है, शायद यही अधूरापन आगे चल कर उत्कृष्ट रचनाओं में तब्दील होती हैं। ये प्रेम भी ना जानाँ, उफ्फ...

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