करीब चार या पाँच साल पहले महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले से महिलाओं के शनि मंदिर में प्रवेश को लेकर आँदोलन के कार्रवाइयों की सूचना मिली। स्त्री विमर्श के तमाम पैरोकार, लेखक, बुद्धिजीवी, कानूनविद, शिक्षाविद इस घटना को अपने-अपने नज़रिये से देख रहे थे। यह अपने आप में कोई अकेला केस नहीं था। केरल, जो भारत का सबसे प्रगतिशील राज्य है और जहाँ की महिलाएँ समूचे भारत की महिलाओं की तुलना में सबसे अधिक पढ़ी-लिखी हैं। वहाँ तकरीबन बीस वर्षों से ऐसा ही एक आँदोलन चल रहा है। जी हाँ! महिलाओं को मंदिर में प्रवेश को लेकर आँदोलन। इन मामलों पर क्या ही कहा जा सकता है। सिवाए इसके, कि परम्पराओं का हवाला देकर हम स्त्रियों को कलंकित कर रहे हैं? इस मामले में मुझे सबसे बड़ा मज़ाक तो यह लगता है, कि कुछ लोग इसे केवल मंदिर प्रवेश, रजोधर्म और पवित्रता का ही मामला समझते हैं। समर्थन के अभाव में ऐसे मामले सीमित होकर सिमट जाते हैं और अंततोगत्वा दम तोड़ देते हैं। संविधान पर यकीन रखने वाले लोग इसे कट्टर पुरूषवादी मानसिकता कह सकते हैं। जो कि लैंगिक पूर्वाग्रह से ग्रसित है।
लैंगिक पूर्वाग्रह। जहाँ महिलाएँ हर तरफ़ पिछड़ी है। सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी सोच के अनुसार इन्हें आज भी इज्जत नामक एक वस्तु मात्र माना जाता है। इसीलिए, किसी पुरुष को नीचा दिखाना हो या उसकी आन में बट्टा लगानी हो तो उसे गाली दे दो। गाली, जो पुरुषसूचक शब्दों से नहीं बनती। स्त्रीसूचक शब्दों से बनती है। गाली, जो पुरुषों का चीरहरण नहीं करती। बल्कि स्त्रियों का चीरहरण करती है। मौखिक चीरहरण। गलती पुरुष करे तो भी चीरहरण महिलाओं का किया जाता है। क्योंकि एक पुरुष से बदला लेने का सबसे आसान तरीका है, उसकी इज्जत को तार-तार कर देना। एक पुरुष की इज्जत। यानी एक स्त्री। और सदियों से आज तक सबसे आसान शिकार अगर कोई मिला है तो वह एक स्त्री रही है। वो अपनी ख़ूबसूरती पर नाज करती किसी कामुग्ध चित्त पुरुष के प्रेम को ठुकरा देती है तो बदले में पुरुष उसके नाज को ही जला कर राख कर देते हैं। तेज़ाब से। स्त्री दमन, स्त्री उत्पीड़न, स्त्री शोषण आज से नहीं सदियों से चली आ रही एक परम्परा जैसी है। जो इस बात की ओर इशारा करती है, कि स्त्रियाँ सदियों से पुरुषों के अधीन ही रही हैं। कहते हैं-
चाँद-सितारों में भी गुले गुलाब लिखता है
लहू जब खौलता है, इन्कलाब लिखता है
स्त्रियों का लहू अब खौल रहा है। एक विचारधारा ससक्त रूप से जन्म ले रही है। नारीवाद। नारीवाद दरअसल राजनैतिक आँदोलनों विचारधाराओं, सामाजिक आँदोलनों की एक ऐसी श्रेणी है, जो राजनीतिक, आर्थिक, लैंगिक और व्यक्तिगत समानता को परिभाषित करने के लक्ष्य को लेकर चलती है। महिलाओं को पुरुषों के बराबर शैक्षिक और पेशेवर अवसर उपलब्ध कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने वाली विचारधारा का नाम है- नारीवादी विचारधारा। नारीवादी सिद्धांतों के उद्देश्य अनेक हैं। जबकि मूल कथ्य एक। कि अधिकारों का आधार लिंग तो कतई ना बने।
वैसे तो नारीवाद के कई रूप और कई प्रकार हैं। लेकिन जो सबसे प्रचलित है, वो है- नारीवाद और नारीवादी समर्थक। नारीवाद और नारीवादी समर्थक में फ़र्क है। बहुत बड़ा फ़र्क। वो ये, कि नारीवादी विचारधारा समानता के लिए सड़कों पर उतर आते हैं। जबकि नारीवाद के समर्थक दूर से समर्थन कर देते हैं। उसके सदस्य नहीं बनते। नारीवाद के प्रकार- सांस्कृतिक नारीवाद। पर्यावरणीय नारीवाद। समतामूलक नारीवाद। समलैंगिक नारीवाद। उदारवादी नारीवाद। वैयक्तिक नारीवाद। मार्क्सवादी/समाजवादी नारीवाद। भौतिक नारीवाद। विखंडनवादी नारीवाद। आध्यात्मिक नारीवाद। इत्यादि। ख़ैर। इनके कितने भी प्रकार क्यों ना हों, इनका सिद्धांत एक होता है। भेदभाव, रूढ़िवादिता, वस्तुनिष्ठता, उत्पीड़न, यौन हिंसा और पितृसत्ता के खिलाफ पुरजोर विरोध करना।
ये तो थी नारीवाद पर बातचीत। अब आते हैं मुद्दे पर। यानी स्फोटवाद की ओर। जिसके रचयिता हैं- महर्षि पतंजलि।
कुछ समय पहले मैंने एक कहानी लिखी थी। आस्तित्व की तलाश । कुछ लोगों ने इस कहानी को आध्यात्मिक स्फोटवाद का नाम दिया तो कुछ ने कहा- मैं स्फोटवादी हूँ। स्फोटवाद के समर्थक यानी नित्य या नित्यवाद के समर्थक। हो सकता है, मैं नित्यवाद का समर्थक रहा होऊँ और मुझे मालूम ना हो? पर मैं स्वयं को जितना जानता हूँ, उतना किसी और को नहीं जानता। स्फोटवाद को भी नहीं। मैं जानता हूँ, कि मैं नास्तिक हूँ। और अगर कोई नास्तिक है तो वह स्फोटवाद का समर्थक कैसे हो सकता है? और अगर कोई स्फोटवाद का समर्थक है तो वह नास्तिक कैसे हो सकता है? ख़ैर। मेरी कहानी का सार आध्यात्मिक स्फोटवाद थी ही नहीं। जैसा, कि लोगों ने समझा।
पर मैं कैसे समझाता? किस-किस को समझाता? और सबसे बड़ी बात, क्यों ही समझाता? फिर मुझे लगा, कि इस पर कुछ लिखूँ। लिखूँ, कि मैं स्फोटवादी नहीं हूँ। और आध्यात्मिक स्फोटवादी तो कतई नहीं हूँ। मैं लिखता गया। लिखता ही गया। 363 पन्ने लगे। यह समझाने में, कि मैं स्फोटवादी नहीं हूँ। मैंने लिखा- क्या हो, जब अपने बच्चे से खूब सारा प्यार करने वाली माँ को पता चले, कि वो अब तक प्रेम के रूप में अपने बच्चे को जहर परोसती आयी है? क्या वो स्फोटवाद का समर्थन करेगी? या फिर नारीवाद का समर्थन करेगी? आप कहेंगे- निःसंदेह वो स्फोटवाद का समर्थन करेगी। लेकिन यह यकीन करना कठिन है, कि एक माँ अपने बच्चे को प्रेम के रूप में ज़हर परोसेगी।
यकीन कीजिए, एक माँ ऐसा कर सकती है। प्रेम की थाली पर ज़हर परोस सकती है। कैसे? जानने के लिए जिमी-कन्द पढ़िए।

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