बुधवार, 10 जून 2020

एक ख़त तुम्हारे नाम





मैं रोज सोचता हूँ, कि तुम्हे एक ख़त लिखूँ। वही ख़त, जिसे मैं अपने इश्क़ के पहले दिन से लिखना चाहता था। परन्तु कभी लिख नहीं पाया। सोच रहा हूँ, कि अब वो ख़त लिख ही दूँ। 
लेकिन लिख देने के बाद, क्या वो खत मैं तुम तक पहूँचा पाऊँगा? यदि नहीं; तो फिर लिखने का फ़ायदा क्या होगा? और चलो, कि मान लिया; किसी तरह तुम तक पहूँचा भी दूँ; तो क्या तुम पढ़ोगी उसे? तुम्हे याद होगी मेरी स्मृतियाँ? मेरा प्यार, मेरा समर्पण इत्यादी? पागल समझ कर हँसना मत, किन्तु कभी-कभी मन इन्हीं ख़यालों में डूबा जाने किस दुनिया के किस-किस 'सहर' भटकने लगता है। जिसका सार यही होता है, कि मानव मस्तिष्क एक निश्चित समय के बाद सहेजी गयी स्मृतियों को धुँधली कर देती है। ताकि वह घटने वाली लाइव घटनाओं को ठीक-ठीक ऑब्जर्व कर सके।
चलो मान लिया, कि मैं तुम्हें अब तक याद रहा होऊँगा; जिसका ठीक-ठीक कारण भी गिना दो तुम। कि तुम्हारा प्रेम भूल न सकी। भूलना आसान न था। और माना, कि तुम ख़त भी पढ़ोगी। लेकिन पढ़ने के बाद क्या महसूस सकोगी मेरे वर्षों के प्यासे मन को? महसूस सकोगी, कि कितना अकेला हो गया हूँ मैं इन दिनों? अगर मेरी इस लाईन को महसूस सकोगी; तो मुझे कहना न होगा, कि तुम्हारे बिना कितना ज्यादा अकेला हो गया हूँ मैं। 
जब जीवन लगने लगे अर्थविहीन 
एक शाम तुम मेरे नाम हो जाना। 
क्या कहा था तुमने, कि तुम्हारी तलाश सिर्फ मैं हूँ; इसे एक शायरी में समेट देने के बाद वो लाइन कैसी लगेगी, लिखकर बताना जरा? लो लिख दिया। बताओ; कैसी लगी? शायद तुम कह रही हो, हमेशा की तरह उम्दा। लेकिन मुझे सन्नाटों के अलावे और कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है। कतई यही फ़र्क हो सामान्य मौत और प्रेमियों के मौत में? बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ; लेकिन शब्द हैं, कि आँख-मिचौलियाँ खेलते-खेलते कहीं गुम से गये हैं। जिन्हें ढूंढने की ताब अब नहीं मुझमें। तुम जो गुमी; मेरे सारे हौसले गुम गये। दिन है, कि उदासियाँ लपेटे पड़ी रहती है। स्याह यामिनी चीखती हैं। जोरों से क्रंदन करती हैं। जिसके भय से इन दिनों जुग़नू तक नहीं टिमटिमाते। और इस साजिश में निशाचरी की मदद झींगुरों की टोलियाँ भी बराबर की भागीदारी निभाकर करती है। ऐसे में मुंडेर मेरा प्रिय मित्र बन गया है। कभी-कभी पूरी रात उसके साथ ही बैठा गुजार देता हूँ। पीने के लिए पानी नहीं रखता। उसकी जगह ब्लू लेबल स्कॉच व्हिस्की ने ले ली है। साँसें भी ऑक्सीजन की नहीं लेता; बल्कि ऑक्सीजन मार्लबोरो के धुएं में तलाशता हूँ। मुंडेर पर बैठे जब नज़र शहर के स्ट्रीट लाईटों पर पड़ती है, तो गुस्सा जोरों से आता है। मन करता है; उठाकर एक पत्थर फोड़ दूँ इन रौशनदानों को। कि अँधेरा कायम रहे। जी करता है, कि चीखूँ जोर से। इतने जोर से कि कुत्तों में अफरा-तफरी मच जाए। और शहर-शहर कोहराम। कभी-कभी मन करता है, सभी मुसाफ़िरों से बतियाता चलूँ। पूछूं उनसे हाल-ए-दिल। सुनाऊँ एक बढ़िया-सी शायरी। जिन्हें सुनकर वो करें वाहवाही। ठोकें पीठ पर शाबाशी के हाथ। और इसकी अनुभूति मुझमें यह अहसास जगाये, कि अभी ज़िन्दा हूँ मैं। फिर अचानक लगता है, कि खामोश हो जाऊँ। इतनी कि मुझे मेरी साँसें तक न सुनायी दे। ताकि उस सन्नाटे में सुन सकूँ नल से रिसती बूँदें। टप्प...! टप्प्प....! टप्प्प्पाक .........! घड़ी की टिक-टिक। मुंडेर पर बैठे कबूतरों के जोड़ों की किलोलें। उसके पंख फड़फड़ा कर एक-दूसरे के प्यार जताने के अंदाज़। और सुन सकूँ उस गूटर-गूँ में छिपी उनके प्रेम की हरेक आशनायी। 
लड़के नहीं रोते। क्या सचमुच? रुको हँसने दो। हा-हा-हा। कि लड़के नहीं रोते, के टैबू से आज़ाद होकर इन दिनों रो भी लेता हूँ मैं। सुना था कहीं, कि रोने से दिल हल्का हो जाता है। भक्क। वाहियात। एकदम झूठी ख़बर है। कोरी अफ़वाह उड़ा दी है किसी ने। आज तक दिल हलका न हुआ। अलबत्ता, सर जरुर भारी हो जाता है। आज-कल अकेलापन सारी हदें पार कर ब्लेड के तीखे धार को ताकता रहता है। जाने क्या ही इरादा है इस नासपीटे का। कि अब कौन-सा दिन है, जो देखना बाकी रह गया है? ईश्वर जाने। या अल्लाह! रहम। अलहमदुलिल्लाह! रहम। 
लिखने को तो बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ। लेकिन कलम है, कि अब साथ नहीं दे रही। मुझे मालूम है, तुम कभी नहीं लौट सकोगी। परन्तु एक आस, एक उम्मीद के साथ कहना चाहता हूँ; यदि संभव हो तो तुम लौट आओ। मैं ये तो नहीं कहता, कि तुम्हें दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार दूँगा। लेकिन ये वादा जरूर करता हूँ, कि मेरी दुनिया के सारे प्यार पर केवल और केवल तुम्हारा हक होगा। 
तुम्हारे इंतजार में-
तुम्हारा~संजीव 

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