इन दिनों मेरी हिन्दी के दो-दो धुरन्धर प्रकाशकों से ठनी पड़ी है। दोनों प्रकाशक बन्धु हिन्दी भाषा के बड़े ही प्रचलित और नामी प्रकाशक हैं। एक तो बकायदा बीस-बीस पुस्तकें एक साथ प्री-ऑर्डर में डाल देते हैं। दूसरा भी कुछ कम नहीं। उन्होंने तो हिन्दी को बचाने का तथाकथित बेड़ा ही उठा रखा है। इनके उपरी खोल को देखकर एकबारगी तो आप इनके चरणों में नतमस्तक़ भी हो लें। लेकिन बन्धु! गलती से आप लेखक-वेखक हैं तो आपको इनमें साक्षात खून चूसने वाले जोंक या पिस्सू ही नजर आयेंगे।
हिन्दी को बचाने का दम्भ भरने वाले ये तथाकथित प्रकाशक, प्रकाशन के आड़ में लेखकों से व्यापार करते हैं। मेरी पुस्तक छप रही है; के एक्साटमेंट में कई नवांकुरों को तो पता तक नहीं होता है कि उन्हे रॉयल्टी में कितने प्रतिशत की हिस्सेदारी मिलेगी। उनसे ली जाने वाली सहयोग राशि इतनी बड़ी क्यों है। और तो और मार्केटिंग-डिस्ट्रीब्युटिंग वगैरह में उनकी पकड़ कैसी है। कहानी एप्रूव होते ही नवांकुर बिना ढंग से नियम-शर्तें पढ़े ही आनन-फानन में दिये गये बैंक अकाउंट में रुपये जमा करा देते हैं। इस बात से पूरी तरह अंजान कि उनकी राशि का उपयोग कहाँ-कहाँ और कैसे होगा। दूसरी ओर प्रकाशक महोदय गद्दीदार आरामकुर्सी पर बैठे दाँत कुरेदते हुए सोच रहा होता है, कि फेमस होने की चाह में आ गया एक और मुर्गा। वैसे सच कहूँ तो सभी मुर्गे साबित नही होते। मैं कई लेखकों से परिचित हूँ। जो बेस्ट सेलर्स की सूची में हैं। कुछ तो निजी मित्र और कुछ व्यवसायिक रुप से जुड़े हुए हैं। उन्हे फर्क नही पड़ा कि उनसे प्रकाशन के नाम पर बड़ी रकम ऐंठी गयी। कह सकते हैं पाठकों ने उन्हे भरपूर प्रेम दिया और न केवल उनकी लागत वसूल करवा दी, बल्कि फायदा, नाम, फेम सबकुछ दिया। उन्होने पाठक़ों के मन को ताड़ा और नयी हिन्दी बोलकर रीड एन थ्रो टाइप पुस्तकें लिख दी। जिसे कम से कम मुझ जैसा पाठक साहित्य का दर्जा तो नही ही देगा। इससे इतर, ऐसे कई लेखक हैं जो फर्स्ट एडीशन में प्रकाशित (महज छः सौ प्रति या बारह सौ प्रति) पुस्तकों का स्टॉक खतम होने की बाट जोह रहे हैं।
फटाफट मजा लो और निकलो; के दौर में पाठक पुस्तकें भी ज्ञानहीन और क्षण में भरपूर मनोरंजन परोसने वाली पुस्तकों को ही तरजीह देते हैं। लेकिन अश्लीलता और गाली-गलौज युक्त बेबाक संवाद से भरे पुस्तकों को हम साहित्य का दर्जा दे भी कैसे सकते हैं। खैर। सबके अपने-अपने पाठक वर्ग हैं। कहना न होगा कि वे मुझे गाहे-बगाहे कहते रहते हैं, कि मैंने गलत प्रकाशक को अपनी मेहनत सौंप दी। अब बीस-बीस पुस्तकें एक साथ प्री-ऑर्डर में लगाने वाले प्रकाशक (मैं यहाँ नाम नहीं लूँगा।) आपके सालों के मेहनत को कहाँ आँक पायेंगे? उन्होने प्री-ऑर्डर लगा दी और प्रकाशन सम्बन्धी अपनी घोषणा भी कर दी। बिके न बिके। सही पाठकों तक पहूँचे न पहूँचे। उससे उन्हे क्या मतलब। आप उन्हे मोटी रकम तो दे ही चुके हैं, जिससे वो स्वीफ्ट डिजायर खरीद कर बाजू में “बड़े प्रकाशक" का तमगा लगाये बड़ी-बड़ी फंक्शनों में बतौर अतिथि मंच सज्जा करते फिरते हैं। चाहे लेखक उसके बाद लिखना छोड़कर प्राइवेट सिक्योरिटी गॉर्ड की नौकरी ही क्यों न करने लगे। मैं तो उस दिन की कल्पना में रोमाँचित हो उठता हूँ, जिस दिन प्रकाशक बन्धु किसी फंक्शन में जायें और उन्हे पता चले कि स्वागत द्वार पर खड़ा गार्ड और कोई नहीं बल्कि उनके प्रकाशन से प्रकाशित अमुक पुस्तक का लेखक है। क्या होगा उस समय? प्रकाशक बन्धु नजरें चुरायेंगे या गॉर्ड रुपी उस लेखक से नजरें मिलाकर हँसते हुए गुजर जायेंगे? मुझे लगता है दूसरा ऑप्शन ही अपनायेंगे। क्यूँकि शर्म बोलकर उनमें कुछ होती भी कहाँ है। एक बात तो मैं बताना भूल ही गया। वो ये, कि आपने सम्पादक शब्द को खूब मिस किया होगा। आपको लग होगा, कि शायद मैं सम्पादक शब्द लिखना भूल गया होऊँ। जी नहीं! मैंने सम्पादक शब्द इसीलिए नहीं लिखा, क्योंकि मैं इन्हें सम्पादक नहीं मानता।
तो भईया ये हालत है सेल्फ पब्लिकेशन का। ऐसा नहीं है कि सिर्फ यही हिन्दी लेखकों के साथ अन्याय करते हैं। बड़े-बड़े अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशक भी इससे अछूते नहीं रह गये हैं। आज हिन्दी के लेखकों की दशा ऐसी है कि वो सड़क चलते दिख जायेंगे. फिर भी आप उन्हे पहचान नही पायेंगे।
अभी पिछले ही दिनों एक धुरन्धर लेखिका (पेंग्विन पेपरबुक्स से प्रकाशित) ने मुझसे बातें की। तमाम चर्चाओं के बीच प्रकाशन का मुद्दा भी छिड़ा। उन्हे जानकर बेहद तकलीफ हुई कि मैंने दो-दो प्रकाशकों से पहले कहानी एप्रूव करवायी। फिर उनके द्वारा ऑफर किये गये पैकेज (सहयोग राशि सहित नियम और शर्तें) को ठुकरा दिया। उन्होने स्पष्ट किया कि बड़े प्रकाशक (राजकमल, पेंग्विन आदी) अमूमन देर से जवाब देते हैं। या तो इंतजार करो या इन्ही प्रकाशकों से प्रकाशित करवा लो। मैंने स्पष्ट कर दिया कि चाहे जो हो। इन ठगों के चंगुल में नहीं फँसना मुझे। पुस्तक से रोजी कमाने की इच्छा नही है। न रोजी-रोटी की चिंता है। इसीलिए अब करुँगा तो बड़ा ही। ढिबरी तले घात लगाये इन प्रकाशकों के हाथों विलुप्त लेखकों की बिरादरी में मुझे शामिल नही होना। उन्होने मुझे शाबाशी दी और भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ भी।
अंत में! सावधान हो जाइये। हिन्दी को बचाने की आपकी यह कोशिश कहीं हिन्दी का गला ही न घोंट दे।

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