“कहाँ हो बे.?"
“बेड पर! तुम्हे ही सोच रहे हैं। यहाँ का मौसम बड़ा खराब है। ठण्ड से हथेलियाँ काँप रही है। हाथ से गिर कर अभी-अभी काँच का गिलास टूटा है मुझसे।"
“काँच के ग़्लास को कत्तई मेरा दिल बना रहे हो बेट्टा। ढंग से थाम ही नहीं रहे। देख लेना। टूटे तो चुभ जायेंगे। गहरे।"
“जख़्म खाये वो आशिक़ क्या कराहे, उम्र भर जो शीशों पर चले। वैसे भी मुझे स्पोर्ट्स शूउज़ की पुरानी लत है।"
“वा बेट्टा! कि घाव लगने से बचने को इंतज़ामात अच्छे हैं। मगर हम भी वो शीशे हैं जो पैरहन को चूम कर घायल कर देते हैं। कहो, लगी बाजी?"
“इश्क़ की बाज़ियाँ हम नहीं खेलते। सौदा मौत से जो करे, शैशव बाज़ियाँ उन्हें कहाँ भाये।"
“प्रेम का रोग भी सौदा कम नहीं मौत से बाबू। कभी हो यदि प्रेम तो बताना, मरना आसान क्यों है।"
“बउरा गयी हो। हाँ। और का कहें। इश्क़ में मरना? रुको हँसने दो। हाऽहाऽहाऽहाऽ.. कहीं डूब मरो। कह रहे हैं। बड़े आये प्रेम-रोगी।"
“डूब मरेंगे बे! डूब मरेंगे। तुम जरा समंदर तो हो जाओ।"

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