"वो भी तुमसे मुहब्बत करती है?"
"हाँ यार! करती तो है। बहुत ही अधिक।"
"तुमने अपनी प्रेमिका की आँखों में वात्सल्य उमड़ते देखा है?"
"वात्सल्य? ये क्या है?"
"तुम्हे कभी लगा, कि उसकी आँखों में तुम्हारे प्रति ममता उमड़ रही हो? जैसे एक माँ की आँखों में कभी-कभी सहज़ ही उमड़ पड़ती है?"
"नहीं यार! ऐसा तो बिलकुल भी नहीं लगा।"
"तो मेरे दोस्त! तुम्हे प्यार नहीं हुआ। बल्कि तुम उसके रुप और यौवन के मायाजाल में फँसे हुए हो। जो जल्दी ही शीश महल के सपने की भाँति चूर हो जायेगा।"
"लेकिन वो तो मुझसे प्रेम करती है?"
"नहीं दोस्त! वो प्रेम करती नहीं; बल्कि प्रेम करती हूँ, यह कहती है। एक लड़की झूठ बोल कर प्रेम जता तो सकती है; मगर उसकी आँखें सब बयाँ कर देती है।"
"तुम लेखकों की बातें अजीबोगरीब होती है। कैसे साबित करोगे इस बात को?"
"प्रेम को साबित करने के लिए सच्चे प्रेमी की जरूरत पड़ती है। जैसे माँ, उसकी आँखों में झाँकना तुम। जब मुसीबत में पड़ोगे। देखना एक वात्सल्य। कैसे उमड़ रहा होगा। उसे साबित नहीं किया जा सकता। सिर्फ महसूसा जा सकता है। वैसे ही तुम्हारी प्रेमिका जब तुमसे सच्ची मुहब्बत करने लगेगी; तो तुम्हे महसूस होगा, कि प्रेमिका की आँखों में माँ की एक परछाई उमड़ रही है। वही वात्सल्य। वही ममता लिए। अपने निश्छल भाव में। फिर तुम स्वयं कहोगे, सच्ची मुहब्बत बयाँ नहीं की जा सकती। महसूसी जा सकती है। फिर उसे स्वयं भी भूलना चाहो, तो आसान नहीं होगा। उसे कभी नहीं भूल पाओगे। न धोखा जैसे शब्द ही होंगे तुम्हारी ज़िन्दगी में। जिओगे उसी के लिए, मरोगे उसी के साथ।"
"तुमने महसूसा है?"
"मैंने? उसके साथ भर होने से मैं अपनी माँ को भूल जाता था।"
"सचमुच यार! कितनी रूहानी होगी तुम्हारी प्रेम-कथा।"
"रूह से मुहब्बत करो। इश्क़ रूहानी ही होती है।"
"मतलब कल ही ब्रेकअप करवाओगे।"
"इश्क़ रूहानी भली। न तो कल्ले होना भला।"

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