मंगलवार, 2 जून 2020

लप्रेक

डीईओ ऑफ़िस में मेरी इन्टरव्यू चल रही थी। तीन अनुभवी और उम्रदराज़ अधेड़ों के बगल में वो अकेली और चौथी इन्टरव्यूवर थीं। चूँकि मैं उससे तकरीबन पाँच मीटर की दूरी पर बैठा था; फिर भी मेरे सिक्स्थ सेंस ने यह भाँप लिया, कि इसकी उम्र अधिक से अधिक पैंतीस होगी। मैं सत्ताईश वर्षीय गेहुँवन मुखारविन्द नवयुवक; और वो प्रातः काल की लता-वल्लरी। मुखड़े पर स्वर्णिक आभा का तेज। सन सिल्की केशों की उस मल्लिका के होंठों पर शबनम की लाली खूब शोभा पा रही थी। जिसके बीच सफेद मोतियों की लड़ियाँ रह-रहकर झिलमिला रही थीं। उसकी एक झलक पड़ते ही मेरे आँखों ने कहीं और देखने से इन्कार कर दिया। सम्मोहन क्या होता है; मुझे उसी दिन पता चला। 
मुझे मालूम था; यदि आज इससे नाम पता न पूछ सका; तो शायद जीवन में कभी न जान सकूँगा, कि यह आयी कहाँ से है। और मेरे पास केवल इन्टव्यू के दरम्यान भर का समय था। दिमाग में तैर रहे इन्टरव्यू से संबंधित सभी नियम-कायदे एकाएक कहीं गुम चुके थे। ख़याल था; तो बस एक ही! मुझे इसका नाम पता चाहिए। कैसे? यह मैं भी न जानता था। मतलब कैसे भी। 
मेरा नाम और शैक्षणिक योग्यता के मामूली सवालों के बाद इन्टरव्यू आगे चल पड़ी।
इन्टरव्यू के बीच में ही मैंने पूछा-“Can I ask you something? 
उसने ऊँगली अपने वक्षस्थल पर रखकर कहा-“Me? 
“Yeah...." मैंने झिझक कर कहा। 
वो मुस्कुराईं, और बोली-“Sure..." आप हिन्दी बहुत अच्छी बोलते हैं; तो मुझसे भी हिंदी में बातें कर सकते हैं। 
उसकी बातें, जैसे पुकार-पुकार कर कह रही थीं; मुद्दे पर आ जाओ। समय कम है। मुद्दे पर आ जाओ। 
मैं मुस्कुरा पड़ा। जमीन की ओर ताकने के बाद मैंने उसकी आँखों में अपनी नजरें गड़ा दी। और बोला-“आमतौर पर हिन्दी को सौतेली माई कहा जाता है। अतः नफरत व्यवहारिक हो जाती है। और इस समय मैं कतई नहीं चाहता; कि मेरा इंप्रेशन आप पर कुछ कम पड़े। शायद यही वजह है, कि मैंने आपसे हिन्दी में बातें नहीं की। 
“आप कुछ पूछना चाहते थे?" उसने कहा। 
“क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ?" मैंने स्पष्ट पूछ लिया। 
वो आहिस्ते से हँस पड़ी। साथ ही सामने बैठे तीनों इन्टरव्यूवर भी मुस्कुराने लगे। उसमें से एक ने कहा-“शायद आप गलत जगह पर बैठे हैं। ऐसा करते हैं, कि हमारा इन्टरव्यू आप ले लीजिए।"
“आप उपज हैं बीज गणित के; लंगड़ी टाँग मैं जानूँ ना। कैसे लूँ महोदय आपका इन्टरव्यू? मेरा नाम पूछना बुरा लगा हो; तो क्षमाप्रार्थी हूँ।" कह कर मैं चुप हो गया।
“मुस्कान सिंह।" वो धीमे स्वर में बोली। 
मेरे दिमाग ने असंख्य नसों को कलम बना कर उसमें रक्त की स्याही चढ़ायी और दिल के नोटबुक पर लिखा- मुस्कान सिंह।
आगे कुछ और पूछ सकूँ; इसकी हिम्मत नहीं पड़ी। और इन्टरव्यू खत्म करके मैं बाहर आ गया। सच कहूँ तो इन्टरव्यू बेहद बुरा गया। मगर जिस वजह से गया; वो मुझे रत्ती भर भी बुरा नहीं लगा। 
बाहर मैंने बहुत देर तक इंतजार किया। शायद वो बाहर निकले और मैं उससे कुछ बातें कर सकूँ। आगे की बातचीत के लिए कोई बहाना ढूंढ कर अपने प्रेम की गाड़ी को थोड़ा और आगे बढ़ा सकूँ। परंतु वो नहीं निकली। मैं मन ही मन निराश होने लगा। अब निकलेगी; तब निकलेगी; करते शाम हो गयी। 
पता चला कि चारों पिछले दरवाजे से वापस जा चुके हैं। मेरा दिल बैठ गया। 
मैंने पूछा-“आये कहाँ से थे?" 
“मैनेजमेंट ने कहा-“राँची से। 
वापस लौटते हुए मेरा अंतर्मन सोच रहा था; इतने बड़े शहर की आबादी में कहाँ-कहाँ खोजूँगा उसे.? 
अंततः मैंने मन को समझाया और कहा-"रे मनवा! चलल जाय। कि इश्क़ तोहार बूता में नईखे। 

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