एक सपना; जो मैं बार-बार देखता हूँ। देखता हूँ, कि मैं स्टेशन पर हूँ और मेरी ट्रेन छूट गयी है। स्टेशन कहाँ का है, ट्रेन कौन-सी है, कहाँ छोड़ती है, छूट कैसे गयी, इसके बारे में कुछ पता नहीं होता। मैं खुद को ऐसी जगह पाता हूँ, जहाँ चारों तरफ ट्रेनें दौड़ रही है। फुल स्पीड से। लग्ज़री बसों जैसी बोगियाँ। बड़ी-बड़ी। मगर यात्रियों से खचाखच भरी हुई। और मैं उन ट्रेनों से घिरा हुआ। ना तो मुझे भागने की जगह मिलती है और ना निकलने की। मैं इस दौरान बदहवास और बेहद डरा हुआ होता हूँ। मैं उस जगह से निकल कैसे पाता हूँ, नहीं जानता। लेकिन दिमाग में जोर डालने पर याद आता है, कि कोई तंग गली है। अंधेरों से भरी। उसी पर चलते हुए मैं बाहर निकलता हूँ। वो तंग गली शुरू कहाँ से होती है और ख़तम कहाँ, मैं यह भी नहीं जान पाता। मगर हाँ! उसके बाद का दृश्य एकदम बदल जाता है और मैं खुद को किसी पहाड़ियों वाले इलाके में पाता हूँ। वो इलाका, जो कभी हरी -भरी और संपन्न रही हो। परन्तु मानवों ने विकास के नाम पर उसे उजाड़ डाला हो। मैं बार बार देखता हूँ, कि पहाड़ियों के नीचे एक मैदान है। मरजीत्ता मैदान। कहीं-कही आम के पेड़ लगे हैं। कटहल के पेड़ लगे हैं। बाँस लगे हैं। और कभी-कभी अमलतास के दर्शन भी होते हैं। लेकिन अमलतास हर सपने में नहीं दिखते। मानों वो भूलने की सजा भूलने से दे रही हो। ख़ैर जैसे-तैसे मैं पहाड़ पर चढ़ता हूँ। कभी-कभी उतरता भी हूँ। लेकिन चढ़ने के मुकाबले उतरना कम होता है। पहाड़ के उस पार मुझे एक जंगल दिखता है। जंगली जानवरों और पक्षियों से रहित जंगल। उस जंगल के सूनेपन पर मैं रोना चाहता हूँ लेकिन रो नहीं पाता। मैं बदहवास-सा फिर भागने लगता हूँ और अचानक जंगल के बीचों-बीच चार-पाँच लोगों द्वारा घेर लिया जाता हूँ। वे मुझे पकड़ने की कोशिश करते हैं। उनके पास बंदूकें होती हैं। सपना टूटने पर मैं सोचता हूँ, कि वे जान लेना चाहते तो झट ले सकते थे। पर वे नहीं लेते। वे सभी लड़के देखने में जंगली जानवरों से लगते हैं। उनके बिखरे हुए बाल मुझे और भयभीत करती है। उनकी उम्र बीस से तीस के बीच की होगी। बड़े भद्दे दिखते हैं वे। पतले-दुबले। उनकी आंखों से क्रूरता टपकती है।
उसके बाद मैं बेहोश होने का नाटक करता हूँ। और चालाकी से उनके चंगुल से भाग खड़ा होता हूँ। इस दौरान मेरी सांसें फूली हुई होती है। और आश्चर्य इस बात पर होती है, कि जिस तेजी से मैं रियल लाईफ में दौड़ता हूँ, सपने में स्पीड उसकी आधी भी नहीं होती। मैं इतना घबराया हुआ होता हूँ, कि मेरी सांसें अब-तब में ठहर जाएगी; मुझे ऐसा लगता है। मैं और कितना दूर भागता हूँ पता नहीं। क्योंकि उसके बाद के दृश्य में मैं ख़ुद को ऐसी जगह पाता हूँ, जहाँ एक पेड़ के नीचे पंद्रह-बीस लोग ताश खेल रहे होते हैं। मैं उनके पैरों पर गिर पड़ता हूँ। उनसे मदद मांगता हूँ। वे कुछ नहीं होने देने का भरोसा देते हैं। और वे लड़के, जो मुझे ढूंढ रहे होते हैं, भीड़ को देख कर वहीं के बने मकानों में जा घुसते हैं। मकान, जो थोड़ी देर पहले तक वहाँ नहीं होते। और उन लड़कों को देखकर लगता है, कि वो घर उन्हीं के हों। मैं फिर भागता हूँ। वहाँ से उठ कर नहीं। बल्कि मुझे याद भी नहीं रहता, कि मैं वहाँ से कैसे भागता हूँ। पर भागता हूँ। लगातार। और भागते-भागते अपने आप को एक पहाड़ की चोटी पर पाता हूँ। पहाड़ की वो चोटी जानी-पहचानी-सी लगती है। लगता है, वो मेरे गांव के पास वाला पहाड़ है। सालगाह पहाड़। मैं पहाड़ की चोटी पर बैठ ही रहा होता हूँ, कि वे लड़के फिर आ जाते हैं। अचानक। और एका-एक मुझ पर गोलियां बरसाने लगते हैं। कुल सात गोलियां लगती है मुझे। हर-बार। केवल सात गोलियां। और सपना ख़तम हो जाता है।

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