वोदका मिलेगी कहीं? नहीं? रम? ब्राँण्डी भी नहीं? नहीं भाई साहब; वो बात नहीं है। पीने का आदी होता तो ठेकों का पता नहीं पूछता फिरता। बल्कि दारु के दुकानदारों का फोन नम्बर नोट करके रखता। आप कैसी बातें करते हैं? मैं तो शराब इसीलिए ढूँढ रहा हूँ, कि कई रातों से सोया नहीं। कुछ याद नहीं रहता आजकल। हर वक़्त बस नींद के सपने देखता हूँ। अभी दो महीने पहले ही एक किलो प्याज़ ली थी। पच्चीस रुपये लगे थे। आज रैक में से कोई पत्रिका ढूँढ रहा था। पत्रिका तो नहीं मिली पर रैक में से सड़े हुए प्याज़ की बदबू आ रही थी। अचानक याद आया, मेरे पच्चीस रुपये सड़ गये। आप ही बताइए; रुपये कभी सड़ते हैं? जानता, कि ये रुपये सड़ने वाले हैं तो किसी ज़रूरतमंद को नहीं दे देता? ख़ैर। आपके इस पैग के लिए शुक्रिया। देखिए न, आसमान है, कि घनी सुन्दरता बिखेरते नहीं थकता। और हम भुलक्कड़ इतने बुद्धू हैं, कि साधारण कैमरे से भी इसको कैद नहीं कर पा रहे। नहीं-नहीं! आप घबराइए मत। मैं कहीं का जेलर नहीं हूँ। वो तो तस्वीरों को कैद, मेरा मतलब है, कि कैप्चर करने का आदी रहा हूँ। इसीलिए। कैप्चर तो समझते ही होंगे? टेक? हैव? टेक ऑन? कुछ नहीं? अच्छा छोड़िए। घर में सब ठीक है? अच्छा! ठीक होना भी चाहिए। नहीं तो डॉक्टर फलाने-ढिमकाने क्लिनिकों और जाँच-घरों के दरम्यान ही जीवन खपवा दे। नहीं? हा-हा-हा। क्या कहा? मेरा घर? मेरा कोई घर है ही कहाँ? अच्छा, जहाँ बचपन बीता? पर्मानेंटली वो घर छोड़े क़रीब छः से सात महीने हो गये। जबकि उससे मोह छूटे बारह बरस। हाँ! इस दौरान शहर हमने खूब बदले। नहीं, केवल शहर नहीं; पते भी खूब बदले। अजी साहब बदले क्या, जबरिया बदलवाए गये। अब दिल्ली को ही ले लीजिए। क्या नाम था? पूजा। एक ही बेटा था उसका। पति का पता नहीं। छोड़िए ना, क्या कीजिएगा उसके पति के बारे में जानकार। मैंने बिना जाने ही उसके बेटे से प्रेम करने की ज़ुर्रत की थी। अकेलापन रह-रह कर कचोटता था तो उस बच्चे के साथ पार्क वगैरह घूम आता था। उसे पिता की जरूरत महसूस होती थी शायद और मुझे हमेशा की तरह एक अदद साथी की। हम दोनों ने बड़ी मुश्किल से एक-दूसरे को ढूँढा था। पंद्रह-बीस दिन सब ठीक रहे। एक दिन अचानक उसकी माँ बोली-"लोग शक करते हैं संजीव बाबू! आप मत आइए इधर। नहीं-नहीं! आप ही बताइए, मैं कोई गे हूँ? और लोग शक करते ही क्यों हैं? उसकी बेटी से खुसुर-फुसुर तो नहीं कर रहा? साले जाहिलियत से भरे हुए नंगे लोग। सच कहता हूँ साहब; यही वो नीच सोसायटी वाले हैं, जिन्हें ख़ुद के पाजामे में बत्तीस छेद नहीं दिखते। जब कि पड़ोसन के भारी नितम्ब दिख जाते हैं। मैं तो कहता हूँ इन सोसायटी वालों पर बिना बात केस दर्ज करवा देनी चाहिए। नहीं-नहीं, मैं कोई गे हूँ? बताइए भला? हद नहीं हो गयी शक की? और ये महाराष्ट्र के नाँदेड़ को ही ले लीजिए। सरदारनी साहिबा हाईकोर्ट में वकील थीं और विदेशी पीती थीं। औरतें विदेशी नहीं पी सकतीं या वो औरतें हैं, केवल इसीलिए उन्हें पीनी ही नहीं चाहिए? हैं जी? एक औरत से जलन? वो तो उनके घर में रहना मुझे इसलिए भी भला लगता था, क्योंकि आलसपने के बावजूद घर कभी गंदा नहीं रहता था। धूप में सूख रहे कपड़े उठा देती थीं। अकेलेपन का दर्द समझती थीं वो। इसी की मारी भी थीं। यूँ किसी सरदार से इश्क़ हो गयी थी उसे। मने कहती थी तो मैं सुनता था। कम्बख्त छोड़ कर लंदन चला गया। बस तब से पी रही थीं। कभी-कभी मैं छिन लेता बोतल। हद होती है पीने की? अजी साहब, सोसायटी के लोग भड़दारों को ऐसे घूरते थे, मानों निर्भया के न पकड़े जा सके रेपिस्ट हों सभी। नहीं, आप ही बताइए; नीचता की हद क्या होती होगी इन सोसायटी वालों के लिए? मैं तो कहता हूँ इन सोसायटी वालों पर बिना बात केस दर्ज करवा देनी चाहिए। नीच कहीं के। इन्हीं दिनों की ले लीजिए। तीन मकान बदल चुका हूँ। छः महीने में ही। मगर ये सोसायटी वाले कहीं पीछा ही नहीं छोड़ते? ख़ैर, आपके इस पैग के लिए आपका फिर से शुक्रिया। एक आप हैं और एक ये सोसायटी वाले... साले नीच लोग।
#TheOldDiaries

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