मंगलवार, 9 जून 2020

सच्चाई की आत्महत्या


मैंने एक शख़्स का क़त्ल किया है। बड़े मुहब्बत और क्या ही साफ़गोई से। यों कि मरते समय वह छटपटा तक न सका। उसने मेरी हड्डियाँ नहीं तोड़ी थी। ना ही मेरी चमड़ी ही उधेड़ी थी। उसने मेरे किसी अपने को भी नहीं छीना था। ना मेरे किसी अज़ीज़ का दिल ही दुखाया था। फिर भी मैंने उसके सीने में एक ज़हर बुझे ख़न्ज़र को पैवस्त कर दिया। और उसे तड़पता छोड़ आया। 
उस शख़्स ने मुझे ज़िन्दगी दी थी। रहने के लिए एक पिंज़रा दिया था। वो नीला पिंज़रा आसमान जितना बड़ा था। पैरों में बाँधकर नैतिकता की ज़ंज़ीरें, उसने खुले में रख छोड़ा था मुझे। अनन्त आकाश में उड़ने के लिए। एकदम आज़ाद। 
अपनी प्रेम भरी बातों से वो मेरे आँसुओं को पोंछता था। पोंछ कर आँसुओं को, वो मेरी आँखों में सत्य और अहिंसा के सूरमे लगाता था। जो चुभती थी मुझे। विष बुझे तीर की तरह। वो हज़ारोॆ मर्तबा मेरे ह्रदय को छेदता था। फिर सम्हालता भी वही था। किसी नुकीले क़ैक़्टस की तरह। ज़िस्म को छलनी-छलनी करके। 
उसने मुझे रास्ता दिखलाया था। एक नये नरक़ का। सच बोलने का नरक़। जो नरक़ों में सबसे ख़राब नरक़ था। सड़ा हुआ। घिनौना। बदबूदार। उससे मुझे नफ़रत नहीं थी। उसकी आँखों में छल-क़पट, मक़्क़ारी का कतरा अंश भी नहीं था। वो बहुत ही अच्छा इंसान था। फिर भी मैंने उसका क़त्ल कर दिया। कई कैरेट शुद्ध विष बुझे ख़न्ज़र से। यही कुछ देर पहले ही। यक़ीन न आये तो जाकर देख लीजिए उसकी लाश। उसकी लाश के सामने ही मैंने छोड़ दिया है उसके पिंज़रे को। उस ज़ंज़ीर को। उन बेड़ियों को। हथक़ड़ियों को। ज़हर की शीशी भी मैंने वहीं छोड़ दी है। ख़न्ज़र भी। 
वो मुझसे प्यार करता था। पर नहीं झेला गया वो क़ैक़्टस। मार दिया मैंने उसे। बेरहमी से।

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